बहुत हल्की बारिश, जिसकी बूँदें 0.5 mm से छोटी होती हैं और नीचे टिके परतदार स्ट्रेटस बादल से धीरे-धीरे उतरती हैं। दक्षिण एशिया में यह हिल स्टेशनों पर और सर्दियों के पश्चिमी विक्षोभ के पीछे आम है।
मूल बातेंबूंदाबांदी क्या है: छोटी बूँद, धीमी चाल
पहले कमीज के कंधे गीले लगने लगते हैं, और उसके बाद ही समझ आता है कि बारिश हो रही है — बूंदाबांदी अक्सर इसी तरह पहचान में आती है। यह पानी की बेहद छोटी बूँदों से बनी वर्षा है, जिनका व्यास परंपरागत रूप से लगभग 0.5 mm से कम माना जाता है। बूँदें इतनी धीमी और इतनी पास-पास उतरती हैं कि हवा में लटकी-सी लगती हैं।
बारिश से इसका फर्क पानी की कुल मात्रा में नहीं, बूँद के आकार और गिरने की रफ्तार में है। मानसून के कपासी वर्षा मेघ से गिरी बूँद कई मिलीमीटर चौड़ी हो सकती है, और ऐसी हर बूँद त्वचा पर अलग से टकराती महसूस होती है। फुहार की बूँदें अलग-अलग महसूस ही नहीं होतीं; वे कपड़ों पर एक गीली परत की तरह बैठ जाती हैं।
दक्षिण एशिया का ज्यादातर पानी दक्षिण-पश्चिम मानसून की संवहनी मूसलाधार बारिश से आता है, और उसके सामने बूंदाबांदी का हिस्सा छोटा है। फिर भी इसके अपने मौसम और अपने ठिकाने हैं, जहाँ यह कई-कई दिन तक मौसम पर हावी रहती है।
इलाके की भाषाएँ यह भेद पहले से जानती हैं। हिंदी महीन छींटों वाली फुहार को बारिश और बौछार से अलग रखती है। उर्दू फुवार को इसी अर्थ में बरतती है। बांग्ला में इलशे गुड़ि कहते हैं — वह महीन बूंदाबांदी जिसे लोक-प्रयोग हिलसा मछली के मौसम से जोड़ता है। अलग शब्द इसलिए बने कि अनुभव अलग है: मूसलाधार बारिश से लोग छिपते हैं, फुहार के बीच अपना दिन जीते रहते हैं।
उथला बादल, कमजोर उठान: फुहार की बूँद छोटी क्यों रह जाती है
बारिश और बूंदाबांदी दो अलग किस्म के बादलों में तैयार होती हैं। असली बारिश को आमतौर पर गहरा संवहन चाहिए: तेज उठती हवा बूँदों को बहुत ऊपर ले जाती है, वे वहाँ बढ़ती रहती हैं और वजन उठान के बस से बाहर होते ही भारी बूँदों के रूप में नीचे आती हैं।
फुहार का कारखाना उथला, परतदार बादल है — स्ट्रेटस और स्ट्रेटोक्यूमुलस। ऐसे बादल में ऊपर की ओर हवा का धक्का बहुत कमजोर होता है; उसे मीटर प्रति सेकंड में नहीं, सेंटीमीटर प्रति सेकंड में नापा जाता है। बूँदें यहाँ सिर्फ आपस में टकराकर और जुड़कर बढ़ पाती हैं। इस धीमी प्रक्रिया को गर्म वर्षा का रास्ता कहा जाता है, क्योंकि इसमें बर्फ का कोई चरण शामिल नहीं होता। नम बादल में पर्याप्त समय मिले तो बूँदें फुहार के आकार तक पहुँचकर नीचे बैठने लगती हैं, पर बारिश की बूँद के आसपास भी नहीं पहुँचतीं।
बादल के नीचे की हवा भी उतना ही मायने रखती है। छोटी बूँद का सतही क्षेत्रफल उसके आयतन के मुकाबले बड़ा होता है, इसलिए उसका वाष्पीकरण जल्दी होता है। तले की परत सूखी हो तो फुहार जमीन तक पहुँचती ही नहीं, रास्ते में उड़ जाती है। अधूरी रह गई इस वर्षा को विर्गा कहते हैं, और इसी वजह से रडार या पूर्वानुमान में वर्षा दिख सकती है जबकि जमीन पर किसी को एक बूँद भी महसूस नहीं होती।
ऊपर ढक्कन की तरह बैठा तापमान व्युत्क्रमण भी मदद करता है: वह बादल को उथला रखता है और नमी को अपने नीचे कैद कर लेता है। उत्तरी मैदान के धूसर सर्द दिन में ठीक यही व्यवस्था बनती है।
पहाड़ी ढलान से तमिलनाडु तट तक: फुहार के पाँच ठिकाने
पहाड़ी कस्बे। जहाँ बादल सीधे ढलान पर टिका हो, वहाँ बूंदाबांदी और धुंध अलग चीजें नहीं रह जातीं। शिलांग, दार्जिलिंग, मसूरी, मुन्नार और ऊटी में गीले मौसम के दौरान कई दिन ऐसे बीतते हैं जब बादल उठता ही नहीं। हर चीज सीली रहती है, बारिश गिनती में आने लायक भारी नहीं होती, और सूखा अंतराल भी नहीं मिलता।
पश्चिमी विक्षोभ के आगे-पीछे। दिसंबर से मार्च के बीच पूरब की ओर बढ़ने वाली ये द्रोणियाँ पाकिस्तान और उत्तर भारत में सर्दियों की बारिश लाती हैं, पर साफ-सुथरे ढंग से आती-जाती कम ही हैं। मुख्य वर्षा-पट्टी से पहले और बाद में अक्सर घंटों हल्की फुहार पड़ती है, जब आसमान नीचे झुके बादलों से पूरी तरह ढका रहता है, यानी बादल छाए हुए रहते हैं — पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में।
पूर्वोत्तर मानसून। अक्टूबर से दिसंबर तक तटीय तमिलनाडु और दक्षिण-पूर्वी आंध्र प्रदेश पर धूसर दौर आते हैं, जिनमें लगातार हल्की बारिश होती रहती है। पर इस मौसम की बारिश में बंगाल की खाड़ी से आने वाले अवदाबों और चक्रवातों का भी बड़ा योगदान होता है, और भारी बारिश अक्सर होती है।
मानसून के सिरे। कोंकण और केरल के तटों पर मानसून की शुरुआत और वापसी के आसपास के दिन, और सक्रिय दौरों के बीच के विराम, अक्सर फुहार लाते हैं। गहरा संवहन थमने के बाद जो नीचा बादल पीछे छूटता है, बूँदें उसी से टपकती हैं।
पूर्वी मैदानों की सर्दी। बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में रात में बने मजबूत व्युत्क्रमण उथला स्ट्रेटस बादल बना देते हैं, जिससे कभी-कभी सुबह के घने कोहरे के साथ हल्की बूंदाबांदी भी होती है। तटीय सिंध में अरब सागर से भीतर बहकर आया नीचा बादल कुछ ऐसा ही दृश्य रचता है।
कम पानी, बड़ा असर: फिसलती सड़क, भारी हवा और भीगा अनाज
सड़क। दक्षिण एशियाई सड़क पर सबसे खतरनाक बारिश अक्सर सबसे हल्की होती है। हफ्तों के सूखे के बाद सतह पर तेल, रबर और धूल की परत जम जाती है। हल्की बारिश इस परत को उठा तो देती है, पर बहा नहीं पाती, और सड़क उस भारी बौछार से भी ज्यादा फिसलन भरी हो जाती है जो उसे धोकर साफ कर देती। दोपहिया चलाने वाले इसे सबसे पहले महसूस करते हैं।
हवा की गुणवत्ता। तेज बौछार हवा से कणों को अच्छी तरह धो देती है। फुहार अक्सर यह काम नहीं कर पाती। उल्टे, बहुत ऊँची नमी के साथ हल्की बारिश प्रदूषण वाली धुंध को घटाने के बजाय और गाढ़ा कर सकती है, क्योंकि प्रदूषण के बहुत से कण पानी सोखकर फूल जाते हैं और सूखी हालत से ज्यादा रोशनी बिखेरते हैं। सिंधु-गंगा के मैदान की फुहार वाली सर्द सुबह में दृश्यता और AQI, दोनों, पिछले सूखे दिन से बदतर हो सकते हैं — बारिश हुई तो हवा धुल गई होगी, यह धारणा ऐसी सुबह पर लागू नहीं होती।
खेती। लंबी सीलन भारी बारिश से अलग किस्म की मुसीबत है। पंजाब, हरियाणा और सिंध में रबी की कटाई के आसपास कई दिन की बूंदाबांदी खड़े गेहूँ और कटे अनाज को सूखने नहीं देती, फफूंद वाले रोगों को बढ़ावा देती है और गहाई का काम उलझा देती है। वर्षा के आँकड़े में इनमें से कुछ भी ध्यान देने लायक संख्या बनकर दर्ज नहीं होता।
वर्षामापी में शून्य, रडार पर सन्नाटा: फुहार का हिसाब कौन रखे
यंत्रों के लिए फुहार सबसे कठिन बारिश है। आम टिपिंग-बकेट वर्षामापी तब तक कुछ दर्ज नहीं करता जब तक इतना पानी जमा न हो जाए कि उसकी छोटी बाल्टी पलट जाए। इसलिए घंटों की बूंदाबांदी या तो शून्य लिखी जाती है या नाममात्र (ट्रेस) के रूप में — वह श्रेणी जो मौसम सेवाएँ एक मिलीमीटर के दसवें हिस्से से कम, यानी नापने लायक न होने वाली मात्राओं के लिए रखती हैं।
रडार भी यहाँ हार जाता है। कोई बूँद रडार को जितनी ऊर्जा लौटाती है, वह मोटे तौर पर उसके व्यास की छठी घात के अनुपात में बदलती है। व्यास थोड़ा भी घटे तो लौटने वाली गूँज बहुत तेजी से गिरती है, इसलिए फुहार की बूँद बड़ी बूँद के मुकाबले नगण्य अंश ही वापस भेजती है। पूरा शहर भीग रहा हो और मौसम रडार की तस्वीर पर मुश्किल से कुछ उभरे — धूसर, सीले दिनों में ऐप का पूर्वानुमान और खिड़की के बाहर का अनुभव सबसे ज्यादा इसी कारण टकराते हैं।
ज्यादातर पूर्वानुमान-प्रदर्शनों के पीछे WMO के मौसम कोड काम करते हैं, इस साइट पर दिखने वाले कोड भी। उनमें बूंदाबांदी की अपनी अलग पट्टी है:
- 51 — हल्की बूंदाबांदी
- 53 — मध्यम बूंदाबांदी
- 55 — घनी बूंदाबांदी
- 56 और 57 — जमने वाली बूंदाबांदी
घंटेवार सूची में यही पट्टी लगातार कई घंटे दिखे, तो वह दिन किसी गुजरती बौछार का नहीं, टिकी हुई फुहार का है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बूंदाबांदी और हल्की बारिश में क्या फर्क है? बूँद का आकार और उसका स्रोत। फुहार की बूँदें लगभग 0.5 mm से छोटी होती हैं और उथले स्ट्रेटस बादल से आती हैं। हल्की बारिश की बूँदें बड़ी और ज्यादा दूर-दूर होती हैं, और वह आमतौर पर किसी गहरे बादल से गिरती है।
क्या फुहार से बाढ़ आ सकती है? अकेले शायद ही कभी, पर यह जमीन तैयार कर देती है। कई घंटे चली बूंदाबांदी मिट्टी को तर रखती है, इसलिए उसके बाद असली मूसलाधार बारिश आए तो पानी तेजी से बहता है और अचानक बाढ़ की आशंका बढ़ जाती है। पहाड़ों में कई दिन की फुहार बिना किसी एक तेज झड़ी के भी भूस्खलन का खतरा बढ़ा देती है।
ऐप बारिश दिखा रहा है, पर बाहर कुछ गिरता नहीं दिखता — ऐसा क्यों? या तो वर्षा जमीन तक पहुँचने से पहले ही विर्गा बनकर उड़ रही है, या सचमुच फुहार पड़ रही है, पर इतनी धीमी कि कुछ मिनट बाहर रहने के बाद ही समझ आती है।
क्या मानसून में बूंदाबांदी आम है? लोगों के अंदाजे से कम। मानसून की बारिश ज्यादातर संवहनी और भारी होती है। फुहार उसके शांत दौर की चीज है — शुरुआत और वापसी के आसपास, बारिश के विराम के दिनों में, और पहाड़ों में लगातार, जहाँ बादल ढलानों पर ही टिका रहता है।
किन जगहों पर फुहार बार-बार लौटती है, और वहाँ का हाल कहाँ दिखेगा? पहाड़ों में शिलांग, दार्जिलिंग, मसूरी और मुन्नार, जहाँ बादल ढलान पर बैठ जाए तो कई दिन नहीं उठता। उत्तरी मैदान में दिल्ली, जहाँ सर्दियों के पश्चिमी विक्षोभ के आगे-पीछे घंटों हल्की फुहार पड़ती है। तट पर चेन्नई, जहाँ अक्टूबर से दिसंबर के बीच पूर्वोत्तर मानसून लंबी, नरम बारिश लाता है। इन दोनों शहरों के पन्नों पर, और साइट के बाकी शहरों के पन्नों पर भी, घंटेवार वर्षा के साथ उसके पीछे का मौसम कोड भी दिखता है, जिससे टिकी हुई फुहार और गुजरती बौछार को अलग पहचाना जा सकता है।