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भूस्खलन

ढलान पर टिकी चट्टान, मिट्टी या मलबे का गुरुत्व के ज़ोर से नीचे खिसक आना। भारी बारिश, भूकंप या इंसानी छेड़छाड़ इसकी शुरुआत करते हैं, और हिमालय तथा पश्चिमी घाट में यह मानसून का एक बड़ा ख़तरा है।

घटनाएँ

भूस्खलन क्या है?

गुरुत्व के ज़ोर से ढलान पर टिकी चट्टान, मिट्टी या मलबे का नीचे सरक आना ही भूस्खलन है। इस एक शब्द में कई घटनाएँ आती हैं, जिनकी रफ़्तार में ज़मीन-आसमान का अंतर है:

दक्षिण एशिया में सबसे ज़्यादा जानें मलबा-प्रवाह लेता है। मानसून की बौछारें खड़ी पहाड़ी को भीतर तक भिगो देती हैं, मिट्टी की पकड़ छूटती है, और कीचड़, पत्थर और उखड़े पेड़ एक उफनती धारा बनकर नीचे दौड़ पड़ते हैं। अक्सर पूरे के पूरे गाँव कुछ ही मिनटों में दब जाते हैं।

तर ढलान, ढीली पकड़: बारिश पहाड़ को कैसे गिराती है

ढलान को आख़िरी धक्का अक्सर भारी या लंबी खिंचती बारिश ही देती है: 2004–2016 के बीच दुनिया भर में भूकंप के अलावा दूसरे कारणों से हुए जानलेवा भूस्खलनों में से 79% बारिश से शुरू हुए। पानी मिट्टी के कणों के बीच के छिद्र भरता है, वहाँ दबाव चढ़ता है और कण एक-दूसरे को थामे नहीं रह पाते। जिन सतहों पर ढलान टूटकर खिसकती है, उन पर पानी चिकनाई का काम करता है।

ढाल, मिट्टी और हरियाली मिलकर तय करते हैं कि कितना पानी काफ़ी है। मोटे तौर पर 24 घंटे में 70–100 मिमी, या पहले से भीगी ज़मीन पर 1 घंटे में 30–50 मिमी बारिश ख़तरे का निशान है। सूखे मौसम का अकेला तूफ़ान शायद ही ढलान गिराता है; असली बोझ लगातार जमा होती मानसूनी वर्षा का है।

बादल फटना एक घंटे में 100 मिमी से ज़्यादा पानी उतारकर अचानक बाढ़ और मलबा-प्रवाह साथ-साथ ला सकता है। वसंत में पिघलती बर्फ़ बारिश के साथ मिट्टी को दोहरा भिगोती है, और उष्णकटिबंधीय चक्रवात की बारिश तट से सैकड़ों किलोमीटर भीतर की पहाड़ियाँ भी गिरा सकती है।

हर बार दोषी मौसम नहीं होता। नेपाल में 2015, सिक्किम में 2011 और पाकिस्तान में 2005 के भूकंपों ने हज़ारों ढलानें एक साथ गिरा दीं। इंसानी काम भी भूस्खलन की वजह बनते हैं: सड़क के लिए पहाड़ काटना, निर्माण के लिए ढलान का निचला सिरा खोदना, जंगल साफ़ करना और बेतरतीब सीढ़ीदार खेत बनाना। ज्वालामुखी गतिविधि भी भूस्खलन ला सकती है, हालाँकि दक्षिण एशिया की मुख्य भूमि पर यह दुर्लभ है।

पीर पंजाल से चटगाँव की पहाड़ियों तक: खिसकती ढलानों का नक़्शा

भारतीय हिमालय में भूस्खलन सबसे बार-बार होते हैं। उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग में यह लगभग सालाना ख़बर है। 2013 में केदारनाथ में बादल फटा और हिमनद का छोड़ा मलबा, यानी मोरेन, ढह गया; 5,700 से ज़्यादा लोग मारे गए। 2021 में चमोली का हिमनद-चट्टान हिमस्खलन 200 से अधिक जानें ले गया। हिमाचल के कुल्लू, मनाली और मंडी 2023 की मानसूनी आपदा की चपेट में आए; राज्य के अस्थायी आँकड़ों के अनुसार 2023-24 में पूरे हिमाचल में जल-मौसम संबंधी आपदाओं में 556 लोगों की जान गई। 2023 में ही सिक्किम में दक्षिण ल्होनक हिमनद झील फटने (GLOF) से कम से कम 55 लोगों की मौत हुई। जम्मू-कश्मीर की पीर पंजाल श्रेणी और अरुणाचल में भारत-चीन सीमा की सड़कें भी इसी चाप में हैं। 2010 में लेह में बादल फटने के बाद उतरे मलबा-प्रवाह 200 से ज़्यादा लोगों को बहा ले गए।

पश्चिमी घाट भी एक बड़ा मोर्चा है। केरल में 2018 की बाढ़ ने 483 जानें लीं, जिनमें बहुत-सी भूस्खलनों से गईं, और 2024 में वायनाड का एक अकेला मलबा-प्रवाह लगभग 400 लोगों को निगल गया। कर्नाटक के कोडगु और मडिकेरी, तमिलनाडु की नीलगिरि और कुन्नूर, और महाराष्ट्र की कोंकण ढलानें इसी पट्टी में हैं। महाराष्ट्र का माळीण गाँव 2014 में नक़्शे से मिट गया और 151 लोग मारे गए; 2021 में रायगढ़ का तळिये इस सूची में जुड़ा। पूर्वोत्तर में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिज़ोरम हर मानसून यही झेलते हैं।

आबादी के अनुपात में नेपाल दक्षिण एशिया का सबसे भूस्खलन-प्रवण देश है। पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा और गिलगित-बाल्तिस्तान में काराकोरम राजमार्ग बार-बार मलबे से बंद होता है, और उत्तरी पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा में फैले मरी और गलियात के इलाक़ों में भी भारी बारिश के दौरान ढलानें गिरती हैं। 2010 में अत्ताबाद में चट्टान खिसकने से 20 लोग मारे गए और एक झील बन गई, जिसमें आईनाबाद और निचला शिश्कट डूब गए। बांग्लादेश के चटगाँव पहाड़ी क्षेत्र — रंगामाटी और बंदरबन — में हर मानसून जानलेवा भूस्खलन होते हैं; 2017 में भारी बारिश के बाद अकेले रंगामाटी ज़िले में 118 लोग मारे गए, और पाँच ज़िलों में कुल मिलाकर 162।

कालिम्पोंग से वायनाड तक: पुराने सबक

आज की सूची नई नहीं है। अक्टूबर 1968 की शुरुआत में हुई अत्यधिक बारिश के बाद कालिम्पोंग में भूस्खलन हुए। उसके बाद की बड़ी घटनाएँ ऊपर के नक़्शे में दर्ज हैं — लेह, केदारनाथ, माळीण, रंगामाटी, चमोली और वायनाड।

ढलान गिरने के बाद

खिसकी ढलान से दूर रहिए, क्योंकि उसी जगह दोबारा भूस्खलन होना आम है। फँसे लोगों को ढूँढने में मदद तभी कीजिए जब ऐसा करना सुरक्षित हो। गैस, पानी और बिजली की टूटी लाइनों की सूचना दीजिए, और हुए नुकसान को दर्ज कर लीजिए, ताकि मुआवज़े में काम आए।

दरार, झुका खंभा, गँदला सोता: ढलान की चेतावनी पढ़िए

बरसात में पहाड़ पर हों तो इन संकेतों पर नज़र रखिए:

इनमें से कुछ भी दिखे तो फ़ौरन ऊँची, स्थिर ज़मीन की ओर निकल जाइए। सरकारी चेतावनी का इंतज़ार मत कीजिए; तब तक देर हो चुकी हो सकती है।

तैयारी बरसात से पहले की चीज़ है: अपने इलाक़े में पहले हुए भूस्खलनों के बारे में जानिए, ढीली मिट्टी वाली खड़ी ढलान के ठीक नीचे बसने से बचिए और आसपास की ढलान थामने के लिए गहरी जड़ों वाले पौधे लगाइए। भारी बारिश के दिनों में मौसम बुलेटिन और सरकारी चेतावनियाँ सुनते रहिए। बारिश घंटों से तेज़ हो तो ऊँची, समतल जगह चले जाइए, और पानी भरी घाटी पार मत कीजिए — उसी रास्ते मलबा-प्रवाह आ सकता है।

भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) राष्ट्रीय भूस्खलन पूर्वानुमान केंद्र चलाता है, और यही केंद्र ऊँचे जोखिम वाले ज़िलों के लिए भूस्खलन-पूर्वानुमान बुलेटिन जारी करता है। उपग्रह का InSAR ज़मीन की धीमी सरकन नापता है, डॉप्लर रडार की बारिश-सीमाएँ तत्काल पूर्वानुमान को आधार देती हैं, और सिक्किम तथा उत्तराखंड में भूस्खलन-अलर्ट वाले फ़ोन ऐप चल रहे हैं।

पिघलते हिमनद, तीखी बौछारें: आगे बढ़ता जोखिम

जलवायु परिवर्तन कई रास्तों से जोखिम बढ़ा रहा है। गरम वायुमंडल हर 1 °C पर लगभग 7% ज़्यादा नमी थामता है (क्लॉसियस-क्लैपेरॉन संबंध), जो तीखी बौछारों में उतरती है। पीछे हटते हिमनद नंगी ढलानें और फटने को तैयार झीलें छोड़ जाते हैं। ऊँचे हिमालय में पिघलती पर्माफ़्रॉस्ट, यानी सदा जमी ज़मीन, चट्टान-बर्फ़ की ढलानें ढीली कर रही है। इन सबके ऊपर बढ़ती आबादी बसावट को खड़ी, कमज़ोर ज़मीन पर धकेल रही है। जलवायु मॉडलों के अनुसार हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन शुरू करने लायक़ बारिश की घटनाएँ बढ़ेंगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भूस्खलन और कीचड़ की धारा क्या एक ही चीज़ हैं? पूरी तरह नहीं। भूस्खलन बड़ा नाम है, जिसमें चट्टान, मिट्टी या मलबा, कुछ भी गिर सकता है; कीचड़ की धारा (यानी मलबा-प्रवाह) उसकी वह क़िस्म है जिसमें पानी से तर महीन मिट्टी तेज़ी से बहती है। दक्षिण एशिया के ज़्यादातर जानलेवा “भूस्खलन” तकनीकी रूप से यही होते हैं।

क्या भूस्खलन की भविष्यवाणी हो सकती है? आंशिक रूप से। रडार वाला तत्काल पूर्वानुमान और ढलानों पर लगे सेंसर बताने लगे हैं कि ख़तरनाक बारिश कब आएगी, पर कौन-सी ढलान किस घड़ी गिरेगी, यह अब भी कठिन है। इसीलिए ज़्यादातर चेतावनियाँ किसी एक गाँव की नहीं, पूरे इलाक़े की होती हैं।

जंगल कटने से सचमुच फ़र्क़ पड़ता है? हाँ। जड़ें मिट्टी को जाल की तरह बाँधती हैं, और खड़ी ढलान से पेड़ हटने पर भूस्खलन का जोखिम बढ़ जाता है। 2024 का वायनाड हादसा भी ऐसे इलाक़े में हुआ जहाँ बागानों के लिए जंगल साफ़ किए गए थे।

अपने इलाक़े का भूस्खलन-ख़तरा कहाँ देखूँ? भूस्खलन-ख़तरे के नक़्शे GSI प्रकाशित करता है। मौसम ऑनलाइन हर शहर-पन्ने पर बारिश का पूर्वानुमान दिखाता है, जो मानसून में आने वाले ख़तरे का शुरुआती संकेत देता है। मिसाल के तौर पर शिमला, देहरादून, कोहिमा और मुन्नार के पन्ने देखिए।

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