हवाओं का मौसमी उलटाव, जो ज़मीन और समुद्र के तापमान के फ़र्क़ से चलता है और दक्षिण एशिया की साल भर की बारिश का बड़ा हिस्सा चंद महीनों में गिरा देता है।
घटनाएँमानसून क्या है?
“मानसून” शब्द अरबी के मौसिम से आया है, जिसका मतलब ही ऋतु होता है — और नाम सटीक बैठता है, क्योंकि मानसून कोई एक तूफ़ान नहीं, पूरी हवाओं की दिशा का मौसमी उलटाव है। साल के एक हिस्से में हवाएँ समुद्र से ज़मीन की ओर बहती हैं, दूसरे हिस्से में ज़मीन से समुद्र की ओर; इसी उलटाव के साथ बारिश आती है और इसी के साथ चली जाती है। दक्षिण एशिया के अलावा दक्षिण-पूर्व एशिया, पूर्वी अफ़्रीका और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों में भी यही तंत्र चलता है, और कुल मिलाकर यह धरती का सबसे बड़ा मौसमी पैटर्न है — तीन अरब से ज़्यादा लोगों की ज़िंदगी इसकी चाल से बँधी है।
उपमहाद्वीप के लिए इसका मतलब बहुत सीधा है। भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और श्रीलंका में साल भर की कुल बारिश का बड़ा हिस्सा इन्हीं कुछ महीनों में गिरता है। खेती, पीने के पानी की आपूर्ति, नदी-तंत्र, पनबिजली और पूरे इलाक़े की अर्थव्यवस्था हर साल इसी बात पर टिकी रहती है कि मानसून कब आया और कितना बरसा। कमज़ोर मानसून का अर्थ है सूखा और अनाज की किल्लत; हद से ज़्यादा बरसने वाला मानसून बाढ़ और भूस्खलन लाता है।
हवा का रुख़ पलटने के पीछे का नियम
पूरा तंत्र एक साधारण भौतिक तथ्य पर खड़ा है: ज़मीन समुद्र के मुक़ाबले जल्दी गरम होती है और जल्दी ठंडी भी। मार्च से मई के बीच उपमहाद्वीप तेज़ी से तपता है और उत्तरी मैदानों में सतह का तापमान अक्सर 45 डिग्री सेल्सियस के पार चला जाता है। तपती ज़मीन सिंधु-गंगा के मैदान के ऊपर कम दबाव का क्षेत्र बना देती है, जबकि अपेक्षाकृत ठंडा हिंद महासागर उससे ऊँचा दबाव बनाए रखता है।
दबाव का यही फ़र्क़ दक्षिण-पश्चिम से नमी से लदी हवा को महाद्वीप की ओर खींचता है — इसी को दक्षिण-पश्चिम मानसून कहते हैं। पश्चिमी घाट और हिमालय इस नम हवा को ऊपर उठने पर मजबूर करते हैं; ऊपर जाकर हवा ठंडी होती है, नमी संघनित होती है और भारी मात्रा में पानी नीचे गिरता है। इसी मौसम में अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) भी उत्तर की ओर खिसकता है, जिससे बारिश का यह पूरा ढाँचा और मज़बूत हो जाता है।
सर्दियों में, यानी नवंबर से फ़रवरी के बीच, यही चक्र उलटा घूमता है: ज़मीन समुद्र से पहले ठंडी पड़ती है, एशिया के ऊपर उच्च दबाव बनता है और ठंडी, सूखी हवा उत्तर-पूर्व से बहने लगती है। यही उत्तर-पूर्वी मानसून है — बाक़ी दक्षिण एशिया जब सूखा रहता है, तब तमिलनाडु, दक्षिण-पूर्वी आंध्र प्रदेश और श्रीलंका को बारिश इसी से मिलती है।
मानसून भारत और दक्षिण एशिया में
हर साल दक्षिण-पश्चिम मानसून 1 जून के आसपास केरल पहुँचता है — इसी को आधिकारिक “आगमन” कहा जाता है। वहाँ से अगले 30 से 40 दिनों में यह उत्तर की ओर बढ़ता जाता है, और 8 जुलाई के आसपास पूरा देश इसके दायरे में आ चुका होता है। वापसी सितंबर के मध्य में राजस्थान से शुरू होती है और अक्टूबर के मध्य तक पूरी हो जाती है।
इलाक़े बदलते ही तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है:
- पश्चिमी घाट और कोंकण तट पर हवा की ओर वाले ढलान सबसे ज़्यादा भीगते हैं — अक्सर साल में 3,000 मिमी से भी ऊपर।
- मेघालय के चेरापूंजी और मॉसिनराम दुनिया में सबसे अधिक वर्षा दर्ज करने वाली जगहों में गिने जाते हैं, सालाना 11,000 मिमी से भी ज़्यादा।
- असम, मेघालय और अरुणाचल प्रदेश में बारिश लंबी और तीखी होती है, और ब्रह्मपुत्र घाटी में बाढ़ बार-बार लौटती है।
- बांग्लादेश में सबसे भारी बारिश जुलाई और अगस्त में होती है; वहाँ की सालाना वर्षा का 70 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा मानसून का है।
- पाकिस्तान के सिंध और पंजाब में मानसूनी बारिश जुलाई से सितंबर के बीच पड़ती है, जबकि बलूचिस्तान काफ़ी हद तक सूखा रह जाता है।
- राजस्थान और थार रेगिस्तान के हिस्से में थोड़ी ही बारिश आती है, और वह भी ज़्यादातर जुलाई में।
अप्रैल में छपने वाला आँकड़ा: पूर्वानुमान कैसे बनता है
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) हर साल अप्रैल में आने वाले मानसून के लिए दीर्घ-अवधि पूर्वानुमान जारी करता है। यह पूर्वानुमान सीधे मिलीमीटर में नहीं बताया जाता, बल्कि दीर्घ अवधि औसत (LPA) के प्रतिशत के रूप में — और यह औसत 868.6 मिमी है। LPA का 96 से 104 प्रतिशत के बीच का आँकड़ा “सामान्य” माना जाता है, और अख़बारों की सुर्ख़ियाँ अक्सर इसी एक संख्या पर टिकी होती हैं।
विभाग जिन संकेतों पर नज़र रखता है, उनमें चार सबसे अहम हैं:
- हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD): धनात्मक IOD आम तौर पर भारतीय मानसून को मज़बूत करता है।
- अल नीनो और ला नीना: अल नीनो मानसून को कमज़ोर करने की ओर ले जाता है, जबकि ला नीना अक्सर उसे ताक़त देती है।
- मैडेन-जूलियन दोलन (MJO): यह मौसम के भीतर के छोटे उतार-चढ़ाव तय करता है — वे दौर जब दो हफ़्ते लगातार बरसता है और फिर कई दिन सूखे निकल जाते हैं।
- यूरेशिया की बर्फ़: सर्दियों में वहाँ ज़्यादा बर्फ़ गिरी हो तो गर्मियों के मानसून का आगमन टल सकता है।
इस अनुमान की अपनी सीमा भी है — अप्रैल वाले पूर्वानुमान में आज भी ±4 से 5 प्रतिशत की गुंजाइश रहती है। इसके उलट तीन से सात दिन के छोटे पूर्वानुमान, जो ECMWF और IMD के GFS जैसे मॉडलों से आते हैं, किसी एक तूफ़ान या बारिश के दौर के लिए काफ़ी भरोसेमंद हैं।
खेत, सड़क और सेहत पर इसका असर
उपमहाद्वीप की खेती मानसूनी बारिश के सहारे चलती है। जलाशय इसी मौसम में भरते हैं, जिनसे पनबिजली वाले बाँध चलते हैं, और आगे आने वाले सूखे महीनों के लिए भूजल का भंडार भी इन्हीं हफ़्तों में दोबारा भरता है। एक ही मौसम पर इतना कुछ टिका होने की वजह से यहाँ अच्छी और बुरी बारिश का फ़र्क़ सीधे थाली तक पहुँचता है।
शहरों में तस्वीर दूसरी है। मुंबई, चेन्नई, बेंगलुरु और ढाका में मानसूनी जलभराव अब लगभग हर साल की घटना बन चुका है। बारिश थमने के बाद के हफ़्ते सेहत के लिहाज़ से सबसे जोखिम भरे होते हैं — डेंगू और मलेरिया जैसी मच्छरजनित बीमारियाँ ठीक उसी दौर में चरम पर पहुँचती हैं। पहाड़ों का ख़तरा अलग क़िस्म का है: उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और पश्चिमी घाट के हिल स्टेशनों पर भूस्खलन इसी मौसम की पहचान बन गया है।
सफ़र की योजना बनाते वक़्त यह सब सीधे काम आता है। मसूरी और मुन्नार जैसी जगहें इन महीनों में बेहद ख़ूबसूरत दिखती हैं, पर वहीं भूस्खलन का ख़तरा सबसे ज़्यादा रहता है। गोवा का तटीय इलाक़ा जुलाई और अगस्त में पर्यटन के लिहाज़ से लगभग बंद रहता है, और पश्चिमी घाट के ट्रेक फिसलन भरे तथा ख़तरनाक हो जाते हैं।
पहली बारिश, पकौड़े और रेन हॉलिडे
दक्षिण एशिया में मानसून सिर्फ़ मौसम नहीं, सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा भी है। अप्रैल-मई की “मैंगो शावर” आम पकने में मदद करती है और खेत की मिट्टी को आगे के लिए तैयार करती है। मौसम की पहली तेज़ बारिश — हिंदी में पहली बारिश, बांग्ला में प्रथम बृष्टि — पकौड़ों और गरम चाय के साथ मनाई जाती है। और जब सड़कों पर पानी भर जाता है, तो कई जगह स्कूल “रेन हॉलिडे” घोषित कर देते हैं, जो बच्चों के लिए पूरे साल की सबसे अच्छी ख़बर होती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत में मानसून कब शुरू होता है? दक्षिण-पश्चिम मानसून 1 जून के आसपास केरल पहुँचता है और 27 जून के आसपास दिल्ली तक आ जाता है। सामान्य हालात में 8 जुलाई के आसपास पूरा देश इसके दायरे में आ चुका होता है।
दक्षिण-पश्चिम और उत्तर-पूर्वी मानसून में फ़र्क़ क्या है? दक्षिण-पश्चिम मानसून, जून से सितंबर तक, भारत के ज़्यादातर हिस्सों को उनकी अधिकांश बारिश देता है। उत्तर-पूर्वी मानसून, अक्टूबर से दिसंबर तक, आकार में उससे बहुत छोटा है और मुख्य रूप से तमिलनाडु, दक्षिणी आंध्र प्रदेश और श्रीलंका को प्रभावित करता है।
मानसून को इतना अहम क्यों माना जाता है? यह भारत की सालाना वर्षा का लगभग 75 प्रतिशत देता है, खेती को सहारा देता है, पनबिजली वाले बाँधों के जलाशय भरता है और आगे के सूखे महीनों के लिए भूजल दोबारा भरता है।
क्या मानसून का सटीक पूर्वानुमान संभव है? अप्रैल में जारी होने वाले मौसमी पूर्वानुमान पहले से काफ़ी बेहतर हुए हैं, फिर भी उनमें ±4 से 5 प्रतिशत की गुंजाइश रहती है। दूसरी ओर तीन से सात दिन के पूर्वानुमान, जो ECMWF और IMD के GFS जैसे मॉडलों से आते हैं, किसी एक तूफ़ान या बारिश के दौर के लिए काफ़ी भरोसेमंद होते हैं।
अपने शहर का मानसूनी मौसम कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन के हर शहर के पृष्ठ पर घंटेवार बारिश की संभावना, दिन भर की कुल बारिश और सात दिन का पूर्वानुमान दिया रहता है। मानसून से सबसे ज़्यादा जुड़े शहरों में मुंबई, कोच्चि, कोलकाता, चेन्नई और गुवाहाटी शामिल हैं।