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मानसून अवदाब

गर्मियों के मानसून के भीतर बनने वाला बड़ा और धीमी चाल वाला निम्न दबाव का तंत्र, जो प्रायः बंगाल की खाड़ी के उत्तरी हिस्से में जन्म लेकर भारत के भीतर की ओर सरकता है और तीन से पाँच दिन तक दूर-दूर तक भारी बारिश देता है। कमज़ोर मानसूनी निम्न दबाव क्षेत्रों के साथ मिलकर यह मध्य भारत की मानसूनी बारिश का बड़ा हिस्सा लाता है।

घटनाएँ

मानसून अवदाब क्या है?

बरसात में बुलेटिन की एक छोटी-सी पंक्ति — “उत्तरी बंगाल की खाड़ी पर अवदाब बना” — ओडिशा से मध्य प्रदेश तक के लोगों के अगले कई दिन तय कर देती है: बादलों से घिरा आसमान, न थमने वाली झड़ी और चढ़ती नदियाँ। इस दौर के पीछे खड़े तंत्र को मानसून अवदाब कहा जाता है।

गर्मियों के मानसून के भीतर बनने वाली यह एक बड़ी और सुस्त चाल वाली निम्न दबाव प्रणाली है। ज़्यादातर इसका जन्म बंगाल की खाड़ी के उत्तरी हिस्से में होता है, जहाँ से यह धीरे-धीरे भारत के भीतर सरकता है। इसका घूमता घेरा अक्सर 1,000 से 2,000 किलोमीटर तक फैला होता है, और एक अकेला अवदाब कई राज्यों जितने इलाक़े को तीन से पाँच दिन तक भिगो सकता है। कमज़ोर मानसूनी निम्न दबाव क्षेत्रों के साथ मिलकर यही तंत्र मध्य भारत की मानसूनी बारिश का बड़ा हिस्सा लाता है।

“अवदाब” कोई ढीला-ढाला शब्द नहीं, एक तय दर्जा है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) इन तंत्रों को सतह पर लगातार चल रही हवा की रफ़्तार से बाँटता है:

दर्जालगातार हवा
निम्न दबाव क्षेत्र / सुस्पष्ट निम्न दबाव31 km/h से कम
अवदाब31–49 km/h
गहरा अवदाब50–61 km/h
चक्रवाती तूफ़ान (नाम यहीं मिलता है)62 km/h और ऊपर

मानसून अवदाब शायद ही कभी गहरे अवदाब से ऊपर चढ़ पाता है। उसकी असली ताक़त हवा में नहीं, पानी में है।

ऊपर पूर्वी हवा, नीचे पश्चिमी: तूफ़ान अधूरा, बारिश पूरी

मानसून भर उत्तर-पश्चिम भारत से गंगा के मैदान को लाँघते हुए खाड़ी के सिरे तक निम्न दबाव की एक लंबी पट्टी पड़ी रहती है, जिसे मानसून द्रोणी कहते हैं। अवदाब ज़्यादातर इसके पूर्वी छोर पर पैदा होते हैं — उत्तरी खाड़ी के गर्म पानी पर, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के तटों के पास। अक्सर इसका बीज बहुत दूर से आता है: दक्षिण चीन सागर की ओर से म्यांमार पार करके पश्चिम की ओर बहते आए विक्षोभों के बचे-खुचे हिस्से यहाँ नए अवदाब की शुरुआत बन जाते हैं।

आगे की कहानी ऊँचाई तय करती है। सतह के पास मानसूनी हवाएँ पश्चिम की ओर से बहती हैं, जबकि वायुमंडल में बहुत ऊपर तेज़ पूर्वी हवाएँ चलती हैं। ऊँचाई के साथ हवा के रुख़ और रफ़्तार के इस अंतर को ऊर्ध्वाधर पवन कतरनी कहते हैं। कोई तंत्र जैसे ही सघन भँवर में सिमटने की कोशिश करता है, ऊपर की उलटी हवा उसका सिरा काटकर बहा ले जाती है।

ऐसा तंत्र अपनी ऊर्जा किसी प्रचंड केंद्र में इकट्ठा नहीं कर पाता। बदले में वह बहुत चौड़े इलाक़े पर फैला रहता है और उस पूरे इलाक़े पर नमी की भारी खेप ढोता है। जो कतरनी उसे चक्रवात बनने से रोकती है, वही उसे इतना कारगर बारिश-यंत्र बनाती है।

ओडिशा से विदर्भ तक: रास्ता, और उसके बाईं ओर की गीली पट्टी

बनने के बाद अवदाब आम तौर पर द्रोणी के साथ-साथ पश्चिम-उत्तर-पश्चिम की दिशा पकड़ता है: ओडिशा, झारखंड और छत्तीसगढ़ से होकर मध्य प्रदेश और विदर्भ की ओर। कुछ अवदाब मिटने से पहले गुजरात और राजस्थान तक जा पहुँचते हैं। कुछ अवदाब समुद्र के बजाय ज़मीन पर ही जन्म लेते हैं, और कुछ अरब सागर में। भुवनेश्वर, रायपुर, रांची, जबलपुर, भोपाल, नागपुर और अहमदाबाद इसी आम रास्ते पर बसे शहर हैं।

पूर्वानुमान बनाने वालों के लिए इस तंत्र की सबसे काम की ख़ूबी यह है कि सबसे भारी बारिश केंद्र पर नहीं गिरती, बल्कि अवदाब के दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में सिमटी रहती है। तंत्र की चाल की दिशा में खड़े होकर देखें, तो भारी बारिश की पट्टी रास्ते के बाएँ हाथ, यानी दक्षिण की तरफ़, साथ-साथ चलती है। केंद्र किसी क़स्बे से काफ़ी दूर से निकल जाए, तब भी अगर वह क़स्बा इस पट्टी में पड़ता है तो सबसे बुरा हाल आम तौर पर उसी का होता है।

अपने शहर के लिए इससे एक सीधी कसौटी निकलती है: पूर्वानुमान में अवदाब का अनुमानित रास्ता देखिए और समझिए कि आप उस रेखा के उत्तर में हैं या दक्षिण में। दक्षिण की ओर होना अक्सर ज़्यादा पानी का इशारा है।

महानदी का उफान, तट पर उफनता समुद्र और खरीफ़ की आस

दिन-ब-दिन दोहराई जाने वाली भारी बारिश। अवदाब के रास्ते के आसपास IMD की “बहुत भारी” श्रेणी की बारिश — 24 घंटे में 115.6 से 204.4 mm — आम है, और कहीं-कहीं 204.4 mm से ऊपर की “अत्यंत भारी” वर्षा भी अनोखी नहीं मानी जाती। तंत्र धीमे चलता है, इसलिए ऐसे आँकड़े एक दिन पर नहीं रुकते; अगले दिन पड़ोस के ज़िले यही कहानी दोहराते हैं।

नदियों में बाढ़। महानदी, गोदावरी और नर्मदा पर मध्य भारत की कई सबसे बड़ी बाढ़ किसी अवदाब के, या एक के पीछे एक आए कई निम्न दबाव तंत्रों के, बेसिन पार करने के बाद आई हैं। ओडिशा का महानदी डेल्टा और गोदावरी का निचला हिस्सा ख़ास तौर पर जोखिम में रहते हैं।

तट पर हवा और समुद्र। जब तक तंत्र समुद्र पर टिका रहता है, ओडिशा, आंध्र और बंगाल के तटों पर झंझावात, यानी झोंकेदार तेज़ हवाएँ, चलते हैं और समुद्र उफनता है। IMD इस दौरान मछुआरों के लिए चेतावनी जारी करता है।

सूखते खेतों के लिए राहत। मानसून के “ब्रेक”, यानी बारिश के ठहराव वाले दौर, को भीतर की ओर बढ़ता अवदाब अक्सर तोड़ देता है। कमज़ोर मानसून वाले साल में प्यासे विदर्भ या मराठवाड़ा पर पहुँचा एक अवदाब खरीफ़ की फ़सल के बर्बाद होने और बच जाने के बीच का फ़र्क़ बन सकता है।

अवदाब घटे, झटकेदार बारिश बढ़ी

हर मानसून मध्य भारत के ऊपर से निम्न दबाव तंत्रों की पूरी कतार गुज़ारता है, पर उनमें से कितने पूरे अवदाब की ताक़त तक पहुँचते हैं, यह बदल चुका है। बीसवीं सदी के बीच के दशकों में एक मौसम में आम तौर पर कई अवदाब आते थे। बाद के IMD रिकॉर्ड पर हुए अध्ययन इनमें साफ़ गिरावट दिखाते हैं — हाल के कुछ मौसमों में बस एक या दो — जबकि कमज़ोर निम्न दबाव क्षेत्र पहले से ज़्यादा बनने लगे हैं।

बारिश ग़ायब नहीं हुई; वह अब भी इन कमज़ोर तंत्रों के सहारे आती है। बदला है उसके आने का तरीक़ा। रॉक्सी और उनके साथियों ने 2017 के अध्ययन में दिखाया कि 1950 से 2015 के बीच मध्य भारत में बड़े इलाक़े पर एक साथ होने वाली अत्यधिक बारिश की घटनाएँ तीन गुना हो गईं। दोनों नतीजे मिलकर इस ओर इशारा करते हैं कि मानसून के पानी का ज़्यादा हिस्सा अब लंबी, संगठित झड़ी के बजाय छोटे और तीखे झटकों में बरस रहा है।

बाढ़ का पूर्वानुमान करने वालों और किसानों के लिए यह बदलाव मौसम के कुल जोड़ जितना ही मायने रखता है।

अवदाब, चक्रवात या पश्चिमी विक्षोभ: ख़बर किसकी है?

बुलेटिन में “अवदाब”, “चक्रवात” और “पश्चिमी विक्षोभ”, तीनों का मतलब बारिश हो सकता है, पर तीनों अलग मौसम में, अलग जगह जन्म लेते हैं और अलग ख़तरा लाते हैं:

मानसून अवदाबउष्णकटिबंधीय चक्रवातपश्चिमी विक्षोभ
मुख्य मौसमजून–सितंबरअप्रैल–जून और अक्टूबर–दिसंबरमुख्यतः दिसंबर–मार्च
कहाँ बनता हैउत्तरी बंगाल की खाड़ी, मानसून द्रोणी परखुली बंगाल की खाड़ी या अरब सागरबहुत दूर पश्चिम में, फिर ऊपरी पछुआ हवाओं के साथ पूर्व की ओर
हवा31–61 km/h62 km/h और ऊपरज़्यादातर वायुमंडल में ऊँचाई पर
मुख्य ख़तराकई दिनों की व्यापक भारी बारिश, नदियों में बाढ़तट से टकराते समय हवा, तूफानी लहर और बारिशसर्दियों की बारिश, पहाड़ों पर बर्फ़, ओले

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या मानसून अवदाब को ही चक्रवात कहते हैं? नहीं। दोनों एक ही पैमाने के पायदान हैं, पर अवदाब नीचे वाला है: उसकी लगातार हवा 31–49 km/h रहती है, जबकि नामधारी चक्रवाती तूफ़ान के लिए 62 km/h या उससे ज़्यादा चाहिए। मानसून के दिनों की पवन कतरनी उसे संगठित नहीं होने देती, इसलिए वह शायद ही इससे ज़्यादा ताक़त पकड़ पाता है; फिर भी भीतरी भारत में कुल पानी के हिसाब से वह कई बार किसी चक्रवात से ज़्यादा बरसा जाता है।

बुलेटिन से “अवदाब” शब्द हट गया, फिर भी झड़ी क्यों जारी है? अवदाब की ताक़त पर कोई तंत्र आम तौर पर तीन से पाँच दिन टिकता है। कमज़ोर पड़ने के बाद बचा निम्न दबाव भी नमी से लदा रहता है और कई दिन और आगे खिसक सकता है, इसलिए लेबल उतरने के बाद भी भारी बारिश चलती रह सकती है।

केंद्र तो हमारे शहर से दूर से निकला, फिर सबसे ज़्यादा पानी यहीं क्यों गिरा? अवदाब का ढाँचा झुका हुआ होता है और वह मानसून की नम हवा को अपने भीतर खींचता है। इसलिए हवा सबसे ज़ोर से उसके दक्षिण-पश्चिमी हिस्से में ऊपर उठती है, और सबसे भारी बारिश भी वहीं होती है। भारी बारिश वाले पूर्वानुमान नक़्शे इसी वजह से अनुमानित रास्ते के समानांतर, पर उससे दक्षिण में खिंचे दिखते हैं।

पहले के मुक़ाबले अब अवदाब कम क्यों बनते हैं? गिरावट रिकॉर्ड में साफ़ है, पर उसके कारणों पर शोध अभी जारी है; बड़े पैमाने पर मानसून के परिसंचरण में बदलाव और समुद्र के गर्म होने के ढर्रे, दोनों की चर्चा होती है। रोज़मर्रा के लिहाज़ से असल बात यह है कि बारिश अब पहले से ज़्यादा बार कमज़ोर तंत्रों और छोटे, तीव्र दौरों के ज़रिए पहुँचती है।

अवदाब की बारिश पर अपने शहर में नज़र कैसे रखूँ? मौसम ऑनलाइन अवदाब के आम रास्तों पर बसे शहरों का मौजूदा हाल, घंटेवार बारिश की संभावना और सात दिन का पूर्वानुमान दिखाता है। रास्ते की शुरुआत के लिए ओडिशा में भुवनेश्वर, बीच के हिस्से के लिए भोपाल, और पश्चिमी छोर के लिए अहमदाबाद के पन्ने खोलिए। रायपुर, रांची, जबलपुर और नागपुर भी इसी रास्ते पर पड़ते हैं।

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