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उष्णकटिबंधीय अवदाब

चक्रवात की पहली संगठित अवस्था, जिसमें सतत हवा 62 km/h से नीचे रहती है और इसीलिए सिस्टम को नाम नहीं मिलता। बंगाल की खाड़ी में हर साल औसतन 7.8 अवदाब या उससे प्रबल प्रणालियाँ बनती हैं, और बहुत से मानसूनी अवदाब कभी इस अवस्था से आगे नहीं बढ़ते, फिर भी मूसलाधार बारिश दे जाते हैं।

घटनाएँ

उष्णकटिबंधीय अवदाब क्या है?

समुद्र पर बिखरे बादलों का झुंड जिस घड़ी एक केंद्र के चारों ओर घूमने लगता है, वह उष्णकटिबंधीय अवदाब कहलाने लगता है — चक्रवात बनने की पहली औपचारिक रूप से संगठित अवस्था। यह दर्जा तीन चीजें एक साथ मिलने पर मिलता है:

दक्षिण एशिया का पाठक इससे किताब में नहीं, खिड़की के बाहर मिलता है: जुलाई-अगस्त का वह गीला, धूपहीन दौर जिसमें तीन-चार दिन बारिश रुकती ही नहीं और हवा खास तेज भी नहीं चलती, प्रायः खाड़ी से भीतर तक आया कोई अवदाब ही होता है।

31 से 61 km/h: वह दर्जा जिसमें तूफान बिना नाम के रहता है

उत्तर हिंद महासागर में IMD इस अवस्था को दो हिस्सों में बाँटता है। 31 से 49 km/h की सतत हवा वाला सिस्टम अवदाब कहलाता है, यानी 17 से 27 नॉट; 50 से 61 km/h वाला गहरा अवदाब, यानी 28 से 33 नॉट। 62 km/h की लकीर छूते ही वही सिस्टम चक्रवाती तूफान बन जाता है — 62 से 88 km/h, 34 से 47 नॉट — और नाम भी ठीक इसी पायदान पर मिलता है।

नाम न मिलने का असर सीधे लोगों की सतर्कता पर पड़ता है। बेनाम प्रणाली न याद रखी जाती है न दोहराई जाती है; बुलेटिन में वह बस IMD के पहचान-कोड से दर्ज होती है और सुर्खी “अवदाब” से आगे नहीं जाती। मौसम का हिसाब इससे नहीं बदलता — 61 km/h वाले गहरे अवदाब और 62 km/h वाले नामधारी तूफान की बारिश लगभग एक जैसी होती है।

अवदाब बनने के लिए क्या-क्या चाहिए

कोई अवदाब शून्य से नहीं उगता। छह शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए:

  1. पहले से मौजूद कोई गड़बड़ी — एक निम्न दाब क्षेत्र या पूर्वी लहर, जिसके इर्द-गिर्द हवा संगठित हो सके।
  2. समुद्र की सतह का तापमान 26.5 °C या ऊपर, और यह गर्माहट 50 मीटर से ज्यादा गहराई तक।
  3. निचले क्षोभमंडल में ऊँची नमी।
  4. वायुमंडल की अस्थिरता, जो संवहन को चलाए रखे।
  5. कम ऊर्ध्वाधर पवन कतरनी, 10 m/s से नीचे; इससे ज्यादा कतरनी उठते बादल-स्तंभ को तिरछा काटकर बिखेर देती है।
  6. कोरिऑलिस बल, जो लगभग 5° से ऊपर के अक्षांश पर ही इतना होता है कि हवा केंद्र के चारों ओर घूम सके।

मानसून के महीनों में खाड़ी पर ये सारी शर्तें नियमित रूप से पूरी होती रहती हैं, और चक्रवात उत्पत्ति की यही सहूलियत वहाँ अवदाबों की गिनती इतनी ऊँची रखती है।

उष्णकटिबंधीय अवदाब भारत और दक्षिण एशिया में

उत्तर हिंद महासागर के अधिकांश उष्णकटिबंधीय अवदाब बंगाल की खाड़ी में ही बनते हैं। जून से सितंबर के मानसून में पूरे उत्तर हिंद महासागर पर हर साल औसतन 4.9 अवदाब या उससे प्रबल प्रणालियाँ बनती हैं। अरब सागर की गिनती कम है, पूरे साल में औसतन 2.3।

जीवन-चक्र लगभग बँधा हुआ है। बनने की जगह प्रायः खाड़ी का उत्तरी सिरा होती है, मोटे तौर पर 17 से 22°N और 88 से 95°E के बीच। वहाँ से सिस्टम मानसून द्रोणी के सहारे पश्चिम या उत्तर-पश्चिम की ओर 10 से 25 km/h से खिसकता है और आम तौर पर ओडिशा, पश्चिम बंगाल या बांग्लादेश के तट पर जमीन चढ़ता है। फिर 2 से 5 दिन तक कमजोर पड़ता हुआ भीतर बढ़ता है और बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ पर बरसता है — 3 से 5 दिन में 100 से 300 mm, लगभग 500 × 500 km के इलाके पर।

कुछ दर्ज घटनाएँ बताती हैं कि यह “कमजोर” दर्जा क्या कर सकता है — और इनमें से कुछ यह भी याद दिलाती हैं कि हर बड़ी आपदा अवदाब की देन नहीं होती:

धान का पानी और डूबा हुआ जिला: एक ही बारिश के दो नतीजे

पूरे उत्तर हिंद महासागर पर हर मानसून में औसतन 4.9 अवदाब या उससे प्रबल प्रणालियाँ बनती हैं; हर एक बड़े इलाके पर असर डालती है, और कमजोर निम्न दाब क्षेत्रों के साथ मिलकर ये भारत के मानसून कोर क्षेत्र में होने वाली मानसूनी बारिश का 57% तक देती हैं, हालाँकि अकेले अवदाबों का हिस्सा अधिकतम 17% ही है। खेती का कैलेंडर भी उसी हिसाब से बना है। बिहार, ओडिशा और पश्चिम बंगाल की खरीफ धान की फसल इसी लगातार नमी पर टिकी है; साथ-साथ जलाशय भरते हैं और भूजल रिचार्ज होता है।

पलटकर यही पानी मुसीबत बनता है जब मिट्टी पहले से भरी हो। धीरे चलता अवदाब तीन दिन में 200 से 300 mm उड़ेल दे, तो बाढ़ उस तेज चलते प्रचंड चक्रवात से भी बड़ी होती है जो कुछ घंटों में पार निकल जाता है। अवदाब में मुख्य खतरा हवा नहीं, बारिश है।

पहाड़ों में तस्वीर और तीखी है: पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश की पहाड़ियों में साधारण ताकत का अवदाब भी अचानक बाढ़ ला सकता है। कभी-कभी दर्जा ही बदल जाता है — 2014 का हुदहुद 7 अक्टूबर को अवदाब था और गर्म पानी के ऊपर बढ़ते हुए 10 अक्टूबर तक अति गंभीर चक्रवाती तूफान बन चुका था।

मानसून द्रोणी के भीतर बने अवदाब, और उसके बाहर बने अवदाब

द्रोणी के भीतर बनने वाले अवदाब धीमे चलते हैं, 10 से 25 km/h से; उनका बारिश वाला घेरा 500 km से भी चौड़ा होता है, नुकसान हवा से कम और पानी से ज्यादा होता है, और वे प्रायः अवदाब या चक्रवाती तूफान के पायदान पर ही रुक जाते हैं।

मानसून से पहले और बाद के महीनों में, द्रोणी के बाहर बनने वाले अवदाब दूसरी तरह के हैं: तेजी से तीव्र होते हैं, परिसंचरण छोटा और सघन रहता है, हवा का खतरा बड़ा होता है और वे अक्सर गंभीर चक्रवात तक पहुँच जाते हैं। पहली किस्म पानी और बाढ़ का जोखिम है, दूसरी हवा और तूफानी लहर का।

अवदाब पर नजर कौन रखता है

नई दिल्ली के RSMC में बैठा IMD का चक्रवात चेतावनी प्रभाग पूरे साल रोज एक बार (0600 UTC पर) उष्णकटिबंधीय मौसम आउटलुक देता है, अवदाब बनते ही विशेष बुलेटिन शुरू करता है और तट के पास अपडेट हर 3 घंटे पर कर देता है; चेतावनियाँ हरे, पीले, नारंगी और लाल रंगों में बँटी हैं। पाकिस्तान में PMD और बांग्लादेश में BMD अपने तटों के लिए यही करते हैं। डॉप्लर रडार, INSAT-3D जैसे भूस्थिर उपग्रह और ECMWF, GFS तथा NCMRWF के मॉडल मिलकर रास्ते और तीव्रता का अनुमान 5 से 7 दिन पहले तक दे देते हैं; मोबाइल पर चेतावनी भारत में सचेत ऐप, बांग्लादेश में BMD Weather App और टोल-फ्री 1090 लाइन से, और पाकिस्तान में PMD से आती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

अवदाब और निम्न दाब क्षेत्र में फर्क क्या है? निम्न दाब क्षेत्र असंगठित होता है — बस एक इलाका जहाँ सतह का दबाव आसपास से कम है, पर कोई स्पष्ट परिसंचरण नहीं। अवदाब में संवहन संगठित हो चुका होता है और एक तय चक्रवाती परिसंचरण मौजूद होता है, भले कमजोर हो।

क्या अवदाब को नाम मिलता है? नहीं। नाम तभी मिलता है जब सिस्टम चक्रवाती तूफान के पायदान पर पहुँचे, यानी सतत हवा 62 km/h या उससे ऊपर हो। अवदाब और गहरे अवदाब बुलेटिन में IMD के पहचान-कोड से दर्ज होते हैं, जैसे “BOB/01/2024”।

क्या बिना नाम वाला अवदाब खतरनाक होता है? हाँ, मुख्य रूप से बाढ़ और भीतरी इलाकों के नुकसान की वजह से। दक्षिण एशिया में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों से होने वाली अधिकांश मौतें चक्रवात-स्तर की हवा से नहीं, तूफानी लहर से होती हैं। फिर भी “कमजोर” अवदाब सुनकर निश्चिंत हो जाना महँगा पड़ता है — उसकी बारिश का घेरा तबाही ला सकता है।

भारत में हर साल कितने अवदाब आते हैं? बंगाल की खाड़ी में हर साल औसतन 7.8 अवदाब या उससे प्रबल प्रणालियाँ बनती हैं, जबकि पूरे उत्तर हिंद महासागर का औसत 11.2 है (IMD, 1965–2021)। इनमें से बहुत सी ओडिशा, बंगाल और बांग्लादेश के ऊपर से गुजरती हैं। अरब सागर में हर साल औसतन 2.3 बनती हैं।

चेतावनी और अपने शहर की बारिश मैं कहाँ देखूँ? उत्तर हिंद महासागर के लिए आधिकारिक स्रोत नई दिल्ली के RSMC की IMD वेबसाइट है। मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर बारिश का पूर्वानुमान और गंभीर मौसम के कोड दिखाता है — भुवनेश्वर, कोलकाता, पटना, भोपाल और गुवाहाटी।

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