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चक्रवात उत्पत्ति

किसी चक्रवाती तंत्र का जन्म और फिर उसका ताक़तवर होना — वह क्रम जिसमें समुद्र पर बादलों का बिखरा गुच्छा पहले अवदाब और फिर चक्रवाती तूफ़ान बनता है।

घटनाएँ

चक्रवात उत्पत्ति क्या है?

तट से टकराता चक्रवात एक लंबी कहानी का आख़िरी अध्याय होता है। कहानी खुले समुद्र पर शुरू होती है, जहाँ हवा का कोई मामूली विक्षोभ संगठित होता है और फिर एक-एक दर्जा ऊपर चढ़ता है। जन्म से लेकर ताक़तवर होने तक के इसी पूरे क्रम को चक्रवात उत्पत्ति (चक्रवातजनन, अंग्रेज़ी में साइक्लोजेनेसिस) कहते हैं।

यह शब्द दो अलग प्रक्रियाओं के लिए आता है:

  1. उष्णकटिबंधीय चक्रवात उत्पत्ति — गर्म समुद्र पर अवदाब और हर तीव्रता के चक्रवाती तूफ़ानों का बनना। यह लेख मुख्य रूप से इसी पर है।
  2. अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय चक्रवात उत्पत्ति — मध्य अक्षांशों में तापमान-अंतर से निम्न दबाव प्रणालियों का बनना। सर्दियों में पाकिस्तान और उत्तर भारत में बारिश लाने वाले पश्चिमी विक्षोभ इसी क़िस्म के हैं।

तटीय दक्षिण एशिया के लिए पहली क़िस्म कहीं ज़्यादा जानलेवा है: बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में साल के तय मौसमों में चक्रवात जन्म लेते हैं, और तमिलनाडु से बांग्लादेश और म्यांमार तक का तट बार-बार उनकी चपेट में आता है। “खाड़ी में निम्न दबाव का क्षेत्र बना” वाली छोटी-सी ख़बर इसी प्रक्रिया का पहला क़दम है, हालाँकि ऐसा हर क्षेत्र चक्रवात नहीं बनता।

26.5°C का पानी, 5° का अक्षांश और चार और शर्तें

कोई भी शर्त अकेले काफ़ी नहीं; चक्रवात वहीं बनता है जहाँ छहों एक ही समय, एक ही जगह मिल जाएँ:

  1. गर्म समुद्र — ऊपरी 50 मीटर या उससे गहरी परत में पानी कम से कम 26.5°C का हो। वाष्पीकरण से उठी नमी ऊपर संघनित होकर गुप्त ऊष्मा छोड़ती है, और यही ऊष्मा तूफ़ान का इंजन है।
  2. अस्थिर वायुमंडल — ऊँचाई के साथ तापमान तेज़ी से गिरे, ताकि सतह की गर्म हवा फुर्ती से ऊपर चढ़ सके।
  3. बीच की ऊँचाई पर नमी — 5 से 10 किलोमीटर ऊपर की हवा नम हो, वरना नीचे उतरती हवा की धाराएँ बनते हुए तूफ़ान के केंद्र को सुखा देती हैं।
  4. कमज़ोर पवन कतरनी — सतह और 12 किलोमीटर ऊपर की हवा में लगभग 10 m/s से कम का अंतर हो। ज़्यादा अंतर बनते हुए तूफ़ान को संगठित होने से पहले ही चीर देता है।
  5. कोरिऑलिस बल — तंत्र भूमध्य रेखा से आम तौर पर कम से कम 5° अक्षांश दूर हो। इससे नीचे पृथ्वी का घूर्णन अक्सर इतना कमज़ोर पड़ता है कि हवा को भँवर में नहीं घुमा पाता।
  6. पहले से मौजूद बीज — निचले स्तर पर कोई विक्षोभ, जैसे उष्णकटिबंधीय तरंग, मानसून अवदाब या निम्न दबाव की द्रोणी। चक्रवात शून्य से नहीं उठता, किसी हल्की हलचल को ही बड़ा करता है।

सबक़ यह कि सिर्फ़ गर्म समुद्र देखकर चक्रवात का अनुमान नहीं लगाया जा सकता। पानी खूब गर्म हो पर ऊपर की हवा में तेज़ कतरनी हो, तो बनता हुआ तूफ़ान संगठित होने से पहले ही बिखर जाएगा।

बिखरे बादलों से नामधारी तूफ़ान तक: पायदान दर पायदान

शर्तें पूरी हो जाने पर भी चक्रवात एक झटके में नहीं बनता। तंत्र को उसकी हवा की गति के हिसाब से इन सीढ़ियों पर रखा जाता है:

  1. उष्णकटिबंधीय विक्षोभ — गरज वाले बादलों का ढीला गुच्छा, जिसमें अभी कोई ढाँचा नहीं।
  2. उष्णकटिबंधीय अवदाब — निचले स्तर पर बंद घेरे वाला परिसंचरण बन चुका है, हवा 31–61 km/h।
  3. चक्रवाती तूफ़ान — हवा 62–88 km/h। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) इसी पायदान पर तंत्र को नाम देता है। इसी दर्जे को उष्णकटिबंधीय तूफ़ान भी कहा जाता है।
  4. गंभीर चक्रवाती तूफ़ान — हवा 89–117 km/h तक पहुँच चुकी।
  5. अति गंभीर चक्रवाती तूफ़ान — 118–166 km/h, जो हरिकेन पैमाने की श्रेणी 1–2 के बराबर बैठता है।
  6. अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफ़ान — 167–221 km/h, यानी हरिकेन की श्रेणी 2–4।
  7. महा चक्रवाती तूफ़ान — 222 km/h या उससे ऊपर, हरिकेन की श्रेणी 4–5 के बराबर।

हर अगली सीढ़ी के लिए लगातार ताक़त जुटानी पड़ती है, और इसमें वक़्त लगता है: विक्षोभ से अवदाब तक मोटे तौर पर 12 से 48 घंटे, अवदाब से नामधारी तूफ़ान तक 12 से 72 घंटे, और वहाँ से गंभीर चक्रवात तक 24 से 72 घंटे। कुछ तंत्र रास्ते में ही अटक जाते हैं — देर तक अवदाब बने रहते हैं, कभी ताक़त नहीं पकड़ते और नाम पाए बिना ही ख़त्म हो जाते हैं।

खाड़ी और अरब सागर का तूफ़ानी कैलेंडर

उत्तरी हिंद महासागर में चक्रवात उत्पत्ति के तीन दौर हैं, और हर एक का मिज़ाज अलग है।

मानसून से पहले, अप्रैल–मई। बंगाल की खाड़ी में इस दौर के कुछ तंत्र बहुत तेज़ी से ताक़त पकड़ते हैं। मई 2020 का अम्फान और मई 2023 का मोका इसी दौर की पैदाइश थे।

मानसून, जून से सितंबर। इस दौर में औसतन 6 अवदाब बनते हैं, फिर भी पूरे चक्रवात गिने-चुने ही निकलते हैं, क्योंकि सक्रिय मानसून की तेज़ पवन कतरनी चौथी शर्त तोड़ देती है। ज़्यादातर तंत्र अवदाब पर ही रुक जाते हैं, और बहुत कम गंभीर चक्रवाती तूफ़ान तक पहुँचते हैं।

मानसून के बाद, अक्टूबर से दिसंबर। असली चरम यही है — बंगाल की खाड़ी के ज़्यादातर जानलेवा चक्रवात अक्टूबर–नवंबर में बने हैं। भोला (1970), सिद्र (2007), फाइलिन (2013) और हुदहुद (2014) इसी दौर के नाम हैं।

अरब सागर। ऐतिहासिक रूप से यह कम सक्रिय रहा है, क्योंकि वहाँ मध्य ऊँचाई की हवा ज़्यादा सूखी रहती है, जिसके पीछे अरब प्रायद्वीप का असर है — यानी तीसरी शर्त अक्सर अधूरी रह जाती है। हाल के दशकों में यह तस्वीर बदल रही है, और जलवायु परिवर्तन यहाँ चक्रवात उत्पत्ति को बढ़ा रहा है। मई 2021 के ताउते ने 174 जानें लीं, और जून 2023 का बिपरजॉय पाकिस्तान-भारत सीमा के पास तट से टकराया।

बंगाल की खाड़ी इतनी चक्रवात-प्रवण क्यों है? साल के बड़े हिस्से में उसकी सतह 28°C से ऊपर रहती है, सक्रिय मानसून द्रोणी पहले से मौजूद विक्षोभ का बीज देती है, मैडेन-जूलियन दोलन (MJO) के कुछ चरण संवहन भड़काते हैं, और 15° से 25° उत्तर पर कोरिऑलिस बल तेज़ घुमाव के लिए काफ़ी है। लैंडफॉल के समय दो और बातें जुड़ती हैं: उथली तलहटी तूफानी लहर को ऊँचा करती है, और कीप जैसी बनावट हवा व लहर को बांग्लादेश की ओर समेट देती है।

त्वरित तीव्रीकरण: जब तैयारी का समय सिकुड़ जाए

चक्रवात उत्पत्ति का एक रूप पूर्वानुमान और निकासी, दोनों के लिए बड़ी चुनौती है। इसे मौसम विज्ञानी त्वरित तीव्रीकरण कहते हैं: 24 घंटे के भीतर तंत्र की अधिकतम निरंतर हवा कम से कम 30 नॉट (लगभग 56 km/h) बढ़ जाए। बंगाल की खाड़ी में ऐसे मामले पहले से ज़्यादा दिखने लगे हैं। तीन हालिया उदाहरण:

कारण तीन माने जाते हैं: ज़्यादा गर्म सतह, जो ज़्यादा गुप्त ऊष्मा छोड़ती है; गर्म पानी की गहरी परतें, जो नीचे का पानी ऊपर खिंचने पर भी ईंधन ख़त्म नहीं होने देतीं; और ईएनएसओ के तटस्थ दौर या ला नीना में कमज़ोर पड़ी पवन कतरनी।

ज़मीन पर इसका मतलब घड़ी से समझ आता है। सामान्य रफ़्तार में विक्षोभ से गंभीर चक्रवात तक पहुँचने में कई दिन लगते हैं, ऊपर दी गई सीढ़ियों का समय जोड़कर देखिए। त्वरित तीव्रीकरण में यही सफ़र कहीं कम समय में सिमट जाता है, और इसके दो सीधे नतीजे हैं:

गर्म होता समुद्र: गिनती लगभग वही, मार ज़्यादा भारी

शोध बताते हैं कि उत्तरी हिंद महासागर में चक्रवातों की कुल संख्या मोटे तौर पर स्थिर है। बदला है उनका मिज़ाज:

तटीय शहरों और खेतिहर बस्तियों के लिए जलवायु परिवर्तन का अर्थ यही है: तूफ़ानों की गिनती भले न बढ़े, मार ज़्यादा बार और ज़्यादा भीषण पड़ेगी।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या भूमध्य रेखा के ठीक पास चक्रवात बन सकता है? लगभग 5° के भीतर बहुत कम ही बनता है, क्योंकि वहाँ कोरिऑलिस बल हवा को भँवर में घुमाने लायक नहीं होता। इसी वजह से सिंगापुर पर चक्रवात का सीधा लैंडफॉल शायद ही कभी होता है।

“विस्फोटक चक्रवात उत्पत्ति” किसे कहते हैं? यह शब्द मुख्य रूप से मध्य अक्षांशों के अतिरिक्त-उष्णकटिबंधीय चक्रवातों के लिए है, जिनमें दबाव 24 घंटे में 24 hPa या उससे ज़्यादा गिर जाए। गर्म समुद्र के चक्रवातों में इसका जोड़ीदार त्वरित तीव्रीकरण है — 24 घंटे में हवा का 56 km/h या उससे ज़्यादा बढ़ जाना।

बंगाल की खाड़ी में पश्चिमी प्रशांत से कम चक्रवात बनते हैं, फिर भी इतनी जानें क्यों जाती हैं? खाड़ी पश्चिमी प्रशांत के मुक़ाबले छोटी और उथली है। यहाँ साल में औसतन तीन से चार चक्रवात बनते हैं, जबकि टाइफून वाले पश्चिमी प्रशांत में 25.3। मगर खाड़ी का चक्रवात जब बनता है, तो उसके रास्ते में घनी आबादी वाले, नीचे बसे नदी-डेल्टा पड़ते हैं, और इसलिए मौतें उसकी गिनती के अनुपात से कहीं ज़्यादा होती हैं।

ख़बर में “निम्न दबाव का क्षेत्र” सुनूँ तो कितनी चिंता करूँ? घबराने की नहीं, नज़र रखने की ज़रूरत है। मानसून के महीनों में ज़्यादातर तंत्र अवदाब पर ही थम जाते हैं। देखिए कि वह अवदाब बना या नहीं, उसे नाम मिला या नहीं, और अगले बुलेटिनों में उसकी श्रेणी चढ़ रही है या नहीं।

चक्रवात बनने की सूचना कहाँ देखूँ? IMD का क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केंद्र (RSMC), नई दिल्ली, पूरे उत्तरी हिंद महासागर के लिए रोज़ उष्णकटिबंधीय मौसम का आउटलुक जारी करता है। मौसम ऑनलाइन के हर शहर-पन्ने पर वर्षा का पूर्वानुमान और गंभीर मौसम के कोड दिखते हैं। बंगाल की खाड़ी की तरफ़ चेन्नई, विशाखापत्तनम, कोलकाता और ढाका, और अरब सागर की तरफ़ कराची के पन्ने खोलिए।

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