गर्म उष्णकटिबंधीय समुद्र पर बनने वाली घूमती हुई कम दबाव की प्रणाली, जिसमें गरज वाले बादल एक व्यवस्थित चक्र में सिमट जाते हैं। महासागर के हिसाब से इसे चक्रवात, हरिकेन या टाइफून कहा जाता है।
घटनाएँउष्णकटिबंधीय चक्रवात क्या है?
समुद्र के गर्म पानी पर बनी एक तेज़ी से घूमती तूफ़ानी प्रणाली, जिसके बीचोंबीच कम दबाव का केंद्र होता है और उसके चारों ओर गरज वाले बादल व्यवस्थित कतारों में सिमट जाते हैं — यही उष्णकटिबंधीय चक्रवात है। तेज़ हवा, मूसलाधार बारिश और घंटों तक टिकी रहने वाली बादलों की घूमती दीवार इसकी पहचान हैं। यह उष्णकटिबंधीय या उप-उष्णकटिबंधीय समुद्र पर ही जन्म लेता है, ज़मीन पर नहीं।
नाम महासागर के हिसाब से बदलता है, घटना वही रहती है। उत्तरी हिंद महासागर में — यानी बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में — इसे चक्रवात कहा जाता है; अटलांटिक और उत्तर-पूर्वी प्रशांत में हरिकेन, और उत्तर-पश्चिमी प्रशांत में टाइफून।
दक्षिण एशिया के पाठक के लिए यह शब्द किताबी नहीं है, पड़ोसी जैसा है। दुनिया भर में बनने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवातों में से लगभग 5% ही बंगाल की खाड़ी में बनते हैं, लेकिन चक्रवात से होने वाली 80% से ज़्यादा मौतें इसी खाड़ी के किनारों पर दर्ज होती हैं। इसकी वजह तूफ़ानों की संख्या नहीं, भूगोल और आबादी का मेल है: बांग्लादेश और पूर्वी भारत का तट बहुत नीचा है और उस पर बेहद घनी बस्तियाँ बसी हैं।
समुद्र का गर्म पानी तूफ़ान में कैसे बदलता है
चक्रवात बनने के लिए चार चीज़ें एक साथ जुटनी पड़ती हैं।
पहली शर्त गर्म समुद्र है। सतह का तापमान कम से कम 26.5°C होना चाहिए, और इतना गर्म पानी लगभग 50 मीटर की गहराई तक मिलना चाहिए। बंगाल की खाड़ी मई और अक्टूबर में नियमित रूप से 30°C पार कर जाती है — इन्हीं महीनों में तूफ़ान सबसे जल्दी ताकत पकड़ते हैं।
दूसरी शर्त पहले से मौजूद कोई गड़बड़ी है। आमतौर पर यह कोई उष्णकटिबंधीय लहर या कम दबाव का क्षेत्र होता है, जो बिखरी हुई संवहन गतिविधि को एक जगह समेट देता है।
तीसरी शर्त ऊर्ध्वाधर पवन कतरनी का कम होना है। हवा को नीचे से ऊपर तक लगभग एक ही दिशा में बहना चाहिए, वरना ऊपर की तेज़ हवाएँ बनते हुए तूफ़ान के स्तंभ को टेढ़ा करके तोड़ देती हैं।
चौथी शर्त कोरिओलिस बल है। घूमने के लिए प्रणाली को आमतौर पर भूमध्य रेखा से कम से कम 5 डिग्री दूर होना चाहिए — इसीलिए ठीक भूमध्य रेखा पर चक्रवात कभी नहीं बनते।
चारों शर्तें मिलते ही गर्म और नम हवा ऊपर उठती है, ठंडी होकर गरज वाले बादलों में बदलती है और गुप्त ऊष्मा छोड़ती है। यही ऊष्मा हवा के स्तंभ को और गर्म करती है, जिससे नीचे दबाव और गिरता है। धीरे-धीरे पूरा तंत्र कम दबाव के केंद्र के चारों ओर घूमने लगता है — उत्तरी गोलार्ध में घड़ी की सुई की उलटी दिशा में।
IMD की सात श्रेणियाँ: अवदाब से महा चक्रवात तक
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) उत्तरी हिंद महासागर के तूफ़ानों को 3 मिनट की औसत निरंतर हवा की गति के आधार पर सात पायदानों में बाँटता है:
- अवदाब — 31 से 49 km/h
- गहरा अवदाब — 50 से 61 km/h
- चक्रवाती तूफ़ान — 62 से 88 km/h, और नाम यहीं मिलता है
- गंभीर चक्रवाती तूफ़ान — 89 से 117 km/h
- अति गंभीर चक्रवाती तूफ़ान — 118 से 166 km/h
- अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफ़ान — 167 से 221 km/h
- महा चक्रवाती तूफ़ान — 222 km/h और उससे ऊपर
ख़बरों में जिस पल तूफ़ान का नाम सुनाई देने लगता है, उसी पल वह 62 km/h की सीमा पार कर चुका होता है। उससे पहले वह सिर्फ़ अवदाब या गहरा अवदाब रहता है और बुलेटिन में बिना नाम के दर्ज होता है।
अंतरराष्ट्रीय सैफिर-सिंपसन पैमाने से तुलना करनी हो तो अत्यंत गंभीर चक्रवाती तूफ़ान मोटे तौर पर श्रेणी 2 से श्रेणी 4 तक के हरिकेन के दायरे में आता है, जबकि महा चक्रवाती तूफ़ान का दायरा श्रेणी 4 से श्रेणी 5 तक फैला है।
उष्णकटिबंधीय चक्रवात भारत और दक्षिण एशिया में
अटलांटिक या प्रशांत के उलट, उत्तरी हिंद महासागर में चक्रवात का एक नहीं, दो मौसम होते हैं — और उन दोनों के बीच में मानसून आ जाता है।
मानसून से पहले का दौर अप्रैल और मई का है। इस समय बने तूफ़ान अक्सर उत्तर की ओर बांग्लादेश और म्यांमार की तरफ़ बढ़ते हैं। नरगिस (2008), मोका (2023), फनी (2019), अम्फान (2020) और रेमल (2024) इसी मौसम के उदाहरण हैं।
मानसून के बाद का दौर अक्टूबर से दिसंबर तक चलता है। इस दौर के तूफ़ानों का रास्ता ज़्यादातर पश्चिम की ओर भारत के पूर्वी तट की तरफ़ रहता है — तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और पश्चिम बंगाल। 1999 का ओडिशा महा चक्रवात, फाइलिन (2013) और सिद्र (2007) इसी दौर के उदाहरण हैं।
अरब सागर में तूफ़ान कहीं कम बनते हैं, लेकिन जो बनते हैं वे पहले से ज़्यादा प्रचंड होते जा रहे हैं। मई 2021 का ताउते इसका उल्लेखनीय उदाहरण रहा, जिसने गुजरात और महाराष्ट्र के तट को प्रभावित किया।
जान किससे जाती है: लहर, बाढ़ और उड़ती छतें
आम धारणा हवा को सबसे बड़ा ख़तरा मानती है, पर इतिहास तीन दूसरी वजहों की तरफ़ उँगली उठाता है।
सबसे पहले आती है तूफ़ानी लहर — समुद्र का पानी, जिसे चक्रवात की हवाएँ धकेलकर ज़मीन पर चढ़ा देती हैं। बंगाल की खाड़ी का आकार कीप जैसा है, इसलिए किनारे की ओर सिकुड़ता हुआ पानी और ऊँचा उठ जाता है; बांग्लादेश में यह लहर 6 से 9 मीटर तक पहुँच सकती है। 1970 के भोला चक्रवात में अनुमानतः 3 से 5 लाख लोगों की जान गई थी, और लगभग पूरी मौतें इसी लहर से हुईं।
दूसरी वजह भीतरी इलाकों की बाढ़ है। 24 घंटे में कभी-कभी 300 mm से ज़्यादा बारिश गिर जाती है, जिसे नालियाँ और नहरें सँभाल नहीं पातीं। डेल्टा के इलाकों में, जहाँ ज़मीन पहले से ही समतल और पानी से भरी रहती है, यह असर सबसे गहरा होता है।
तीसरी वजह हवा और उसके साथ उड़ता मलबा है। पक्के कंक्रीट के मकान ज़्यादातर चक्रवात झेल जाते हैं, लेकिन कच्चे मिट्टी-ईंट के घर, टिन की छतें और पेड़ भारी नुकसान उठाते हैं। यही फ़र्क़ बताता है कि एक ही तूफ़ान एक ही शहर में किसी के लिए बंद खिड़की की रात होता है और किसी के लिए छत का पूरी तरह उड़ जाना।
चेतावनी, आश्रय और निकासी: मौतों का आँकड़ा कैसे गिरा
दक्षिण एशिया के आपदा प्रबंधन में सबसे उत्साहजनक अध्याय बांग्लादेश का चक्रवात तैयारी कार्यक्रम है। 1970 के बाद से इसने चक्रवात से होने वाली मौतों को सौ गुना से भी ज़्यादा घटाने में मदद की है — भोला (1970) में 3 लाख से ज़्यादा मौतों से लेकर रेमल (2024) में 30 से भी कम तक।
इस कार्यक्रम के चार खंभे हैं:
- समय रहते चेतावनी: बांग्लादेश मौसम विभाग (BMD) के चेतावनी संकेत, जिन्हें स्वयंसेवक लाउडस्पीकर, मेगाफ़ोन और सायरन के ज़रिए लोगों तक पहुँचाते हैं
- 76,000 से ज़्यादा प्रशिक्षित स्वयंसेवक, जो घर-घर जाकर लोगों को निकालते हैं
- तट पर बने 4,000 से ज़्यादा ऊँचे कंक्रीट के चक्रवात आश्रय
- सुंदरबन में तटीय मैंग्रोव की बहाली
भारत ने भी 1999 के ओडिशा महा चक्रवात के बाद अपने पूर्वी तट पर इसी तरह की क्षमता खड़ी की है। बड़ा चक्रवात क़रीब आने पर हर बार दस लाख से ज़्यादा लोगों को सुरक्षित जगहों तक पहुँचाया जाता है। यही वजह है कि आज किसी तूफ़ान की ताकत और उससे जाने वाली जानों का सीधा रिश्ता नहीं रह गया है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बंगाल की खाड़ी में चक्रवात का मौसम कब होता है? साल में दो बार: मानसून से पहले अप्रैल–मई में, और मानसून के बाद अक्टूबर–दिसंबर में। सबसे प्रचंड तूफ़ान इन दोनों में से किसी भी दौर में बन सकते हैं।
चक्रवात, हरिकेन और टाइफून में क्या फ़र्क़ है? फ़र्क़ सिर्फ़ नाम का है, घटना एक ही है। उत्तरी हिंद महासागर में इसे चक्रवात कहते हैं, अटलांटिक और उत्तर-पूर्वी प्रशांत में हरिकेन, और उत्तर-पश्चिमी प्रशांत में टाइफून।
चक्रवातों के नाम कौन तय करता है? 13 सदस्य देशों का एक पैनल — बांग्लादेश, भारत, ईरान, मालदीव, म्यांमार, ओमान, पाकिस्तान, क़तर, सऊदी अरब, श्रीलंका, थाईलैंड, संयुक्त अरब अमीरात और यमन। हर देश 13 नाम देता है। नाम क्रम से एक-एक करके इस्तेमाल होते हैं और कोई भी नाम दोबारा काम में नहीं लिया जाता। बिपरजॉय, तेज, हामून, मिधिली, फेंगल, मोका और रेमल हाल के उदाहरण हैं।
भारत के कौन से राज्य सबसे ज़्यादा जोखिम में हैं? पूर्वी तट पर ओडिशा, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु। सबसे ताकतवर लैंडफॉल ओडिशा ने झेले हैं। पश्चिमी तट पर गुजरात कभी-कभी अरब सागर के तूफ़ानों की चपेट में आ जाता है।
सक्रिय चक्रवात पर नज़र कहाँ रखें? आधिकारिक चेतावनियाँ भारत में भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और बांग्लादेश में बांग्लादेश मौसम विभाग (BMD) जारी करते हैं; अमेरिका का संयुक्त टाइफून चेतावनी केंद्र (JTWC) भी ट्रैक प्रकाशित करता है। हवा और दबाव का ताज़ा आँकड़ा देखने के लिए मौसम ऑनलाइन पर अपने शहर का पन्ना खोलिए — कोलकाता, भुवनेश्वर, चेन्नई, मुंबई या कोच्चि।