वह इलाक़ा जहाँ हवा का दबाव आसपास से नीचे रहता है, इसलिए हवा ऊपर उठती है, ठंडी होकर संघनित होती है और बादल, बारिश तथा तूफ़ानी मौसम लाती है। दक्षिण एशिया के मानसूनी अवदाब और चक्रवात इसी परिवार से हैं।
घटनाएँनिम्न दबाव प्रणाली क्या है?
निम्न दबाव प्रणाली — बोलचाल में “लो”, मौसम विज्ञान की भाषा में चक्रवात — वह इलाक़ा है जहाँ उसी ऊँचाई पर आसपास के मुक़ाबले वायुमंडलीय दबाव कम रह जाता है। चारों ओर से ऊँचे दबाव की हवा उस गड्ढे की तरफ़ धकेली जाती है, और भीतर पहुँचने के बाद उसके पास ऊपर उठने के सिवा कोई रास्ता नहीं बचता। ऊपर जाती हवा ठंडी होती है, उसमें घुली जलवाष्प संघनित होकर बूँदों में बदलती है, और बादल बन जाते हैं — यानी बादल, बारिश, हवा और तूफ़ानी मौसम।
दक्षिण एशिया के पाठक के लिए यह किताबी बात नहीं है। इस उपमहाद्वीप पर बारिश लाने वाले सबसे बड़े कारक निम्न दबाव के तंत्र ही हैं:
- मानसूनी निम्न दबाव और अवदाब मिलकर दक्षिण-पश्चिम मानसून की बारिश का बड़ा हिस्सा पहुँचाते हैं (अकेले अवदाबों का हिस्सा आमतौर पर 20% से कम रहता है)
- उष्णकटिबंधीय चक्रवात बंगाल की खाड़ी और अरब सागर में बनकर इस क्षेत्र की सबसे विनाशकारी घटनाएँ बनते हैं
- पश्चिमी विक्षोभ शीतोष्ण कटिबंध के निम्न दबाव हैं, जो सर्दियों की बारिश और बर्फ़ लेकर आते हैं
- मानसून द्रोणी जून से सितंबर तक लगभग स्थायी रूप से टिकी रहने वाली निम्न दबाव की पट्टी है
इन तंत्रों को तस्वीर से हटा दीजिए, तो भारतीय उपमहाद्वीप पर बारिश कहीं कम रह जाएगी।
तीन अलग रास्ते, तीन अलग क़िस्म के निम्न दबाव
बनने का तरीक़ा हर निम्न दबाव का एक-सा नहीं होता, और यही तय करता है कि वह किस मौसम में आएगा।
गर्म समुद्र से — उष्णकटिबंधीय चक्रवात उत्पत्ति। इसके लिए चार शर्तें एक साथ चाहिए: समुद्र की सतह का तापमान 26.5°C या उससे ऊपर, ऊपरी हवाओं की कम कतरनी, आमतौर पर 5° या उससे अधिक अक्षांश ताकि कोरिऑलिस बल घुमाव दे सके, और पहले से मौजूद कोई छोटी-मोटी गड़बड़ी। चारों मिल जाएँ तो गहरा उष्णकटिबंधीय निम्न दबाव बनता है, जो आगे चलकर चक्रवात में बदल सकता है।
तापमान के टकराव से — शीतोष्ण चक्रवात उत्पत्ति। ध्रुवीय ठंडी हवा और उपोष्ण गर्म हवा जहाँ वाताग्र पर आमने-सामने आती हैं, वहाँ वाताग्रों वाला मध्य-अक्षांशीय निम्न दबाव जन्म लेता है। सर्दियों में उत्तर भारत तक पहुँचने वाले पश्चिमी विक्षोभ इसी किस्म के हैं।
ज़मीन के तपने से — ताप निम्न दबाव। सतह तेज़ी से गरम होती है, उसके ऊपर की हवा उठने लगती है और तपते भूभाग पर दबाव नीचे बैठ जाता है। गर्मियों की एशियाई मानसून द्रोणी असल में इसी तरह का विशालकाय ताप निम्न दबाव है। छोटे पैमाने का उदाहरण राजस्थान पर मानसून-पूर्व बनने वाले हीट लो हैं।
31 से 222 km/h तक: IMD की सीढ़ी और गिरते काँटे का हिसाब
भारत मौसम विज्ञान विभाग निम्न दबाव के तंत्रों को सतही हवा की रफ़्तार के हिसाब से क्रमवार श्रेणियों में बाँटता है, और हर सीढ़ी के साथ दबाव की गिरावट भी बढ़ती जाती है।
| श्रेणी | लगातार हवा | आसपास से दबाव में गिरावट |
|---|---|---|
| निम्न दबाव क्षेत्र | 31 km/h से कम | 1.0 hPa |
| अवदाब | 31–49 km/h | 1.0–3.0 hPa |
| गहरा अवदाब | 50–61 km/h | 3.0–4.5 hPa |
| चक्रवाती तूफ़ान | 62–88 km/h | 6.1–10.0 hPa |
| भीषण चक्रवाती तूफ़ान | 89–117 km/h | 15.0 hPa |
| अति भीषण चक्रवाती तूफ़ान | 118–166 km/h | 20.9–29.4 hPa |
| अत्यंत भीषण चक्रवाती तूफ़ान | 167–221 km/h | 40.2–65.6 hPa |
| महा चक्रवाती तूफ़ान | 222 km/h या अधिक | 80.0 hPa |
हवा की रफ़्तार जितनी बढ़ती है, दबाव की गिरावट उससे ज़्यादा तेज़ी से बढ़ती है, हालाँकि अलग-अलग समुद्री बेसिन में थोड़ा अंतर रहता है। 1999 का ओडिशा महाचक्रवात और 2020 का अम्फान जैसे महा चक्रवाती तूफ़ानों के केंद्र में दबाव क्रमशः 912 hPa और 920 hPa तक गिर गया था — यानी मानक 1013 hPa से क़रीब 100 hPa कम।
रोज़मर्रा के लिए एक नियम याद रखना काफ़ी है: 6 से 12 घंटे में 5 hPa या उससे ज़्यादा की गिरावट का सीधा मतलब है कि निम्न दबाव का कोई तंत्र पास आ रहा है।
निम्न दबाव प्रणाली भारत और दक्षिण एशिया में
बंगाल की खाड़ी धरती के उन चुनिंदा इलाक़ों में है जहाँ निम्न दबाव के तंत्र सबसे ज़्यादा पैदा होते हैं। जून से सितंबर के बीच यहाँ हर मौसम में मानसूनी अवदाब बनते हैं — उनका दशकीय औसत 1951–1960 में प्रति मौसम 5.90 था, जो 2001–2010 में घटकर 2.50 रह गया। इनमें से ज़्यादातर पश्चिम की ओर बढ़ते हुए भारत के पूर्वी तट को पार कर जाते हैं। ज़मीन पर पहुँचा एक अवदाब 3 से 5 दिन में 100 से 300 मिमी बारिश दे जाता है। बहुत-से अवदाब कभी चक्रवात की ताक़त तक पहुँचते ही नहीं, फिर भी बाढ़ दूर-दूर तक फैला देते हैं।
मानसून से पहले और बाद के महीनों में तस्वीर बदल जाती है। तब नामधारी उष्णकटिबंधीय चक्रवात बनते हैं, जो अवदाबों से अक्सर कहीं ज़्यादा तीव्र होते हैं, और उनका तट से टकराव तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के किनारों पर होता है। पूरे उत्तरी हिंद महासागर में, सभी मौसमों को मिलाकर, ऐसे चक्रवात साल में लगभग 5 बनते हैं, और बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर के बीच उनका अनुपात 4:1 रहता है। बंगाल की खाड़ी में सबसे व्यस्त महीने मई तथा अक्टूबर–नवंबर हैं, अरब सागर में मई और अक्टूबर।
IMD का RSMC नई दिल्ली हर दिन उष्णकटिबंधीय मौसम का आउटलुक जारी करता है — चक्रवात और अवदाब, दोनों पर नज़र रखने का सबसे भरोसेमंद सरकारी स्रोत।
मानसून द्रोणी: वह लकीर जो तय करती है कि आज बारिश होगी या नहीं
दक्षिण-पश्चिम मानसून के दौरान उत्तर भारत के आरपार, राजस्थान से लेकर बंगाल की खाड़ी तक, निम्न दबाव की एक पूरब-पश्चिम पट्टी खिंची रहती है। इसे मानसून द्रोणी कहते हैं, और यह उपमहाद्वीप पर ITCZ की सतही पहचान है। इसके भीतर दबाव आमतौर पर 1000 से 1005 hPa रहता है।
द्रोणी एक जगह टिकी नहीं रहती। हफ़्तों के पैमाने पर वह कभी उत्तर में हिमालय की ओर खिसकती है, कभी दक्षिण में मध्य भारत की तरफ़ लौट आती है, और यही हरकत पूरे मानसून की बारिश का ढाँचा तय करती है। अपनी सामान्य जगह पर बैठी द्रोणी का मतलब है सक्रिय मानसून; खिसककर हिमालय की तलहटी तक पहुँच जाए तो मैदानों में बारिश थम जाती है, और उसे मानसून का ब्रेक कहा जाता है।
बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के लिए यह लकीर रोज़ाना के मौसम का सबसे बड़ा फ़ैसला करती है: द्रोणी इस वक़्त कहाँ बैठी है, इसी से तय होता है कि आज खेत भीगेंगे या सूखे रहेंगे।
खेत, नदी और साँस पर एक अवदाब का हिसाब
एक निम्न दबाव के गुज़र जाने का असर उसी दिन की बारिश तक सीमित नहीं रहता।
सबसे पहले आता है बादलों का ढक्कन, जो सूरज की गर्मी ज़मीन तक पहुँचने से रोकता है और तापमान 5 से 10°C तक नीचे खींच सकता है। उसके साथ बारिश आती है — हल्की बूँदाबाँदी से लेकर मूसलाधार तक। हवा उत्तरी गोलार्ध में केंद्र के चारों ओर घड़ी की उलटी दिशा में घूमती है, और दबाव की ढलान जितनी तीखी होगी वह उतनी ही तेज़ चलेगी। तट पर एक ख़तरा और जुड़ता है: तेज़ हवा और गिरा हुआ दबाव मिलकर समुद्र का पानी ऊपर उठा देते हैं, जिसे तूफ़ानी उछाल कहते हैं।
बाद के असर धीमे हैं, पर कम अहम नहीं। बारिश हवा में तैरते प्रदूषकों को धोकर बैठा देती है, इसलिए अवदाब के गुज़रने के बाद शहरों की हवा की गुणवत्ता अक्सर सुधर जाती है। बहाव बढ़ने से नदियों का जलस्तर चढ़ता है — किसान के लिए राहत, निचली बस्तियों के लिए चेतावनी। मानसून के महीनों में यही पानी जलाशयों को भरता है, जिस पर अगले पूरे साल की सिंचाई और बिजली टिकी होती है। और सबसे सीधा फ़ायदा: ज़मीन की सतह ठंडी पड़ते ही चल रही लू टूट जाती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
निम्न दबाव का मतलब ख़राब मौसम क्यों होता है? निम्न दबाव हवा को ऊपर की ओर धकेलता है। ऊपर उठती हवा ठंडी होती है और उसकी जलवाष्प संघनित होकर बादल बना देती है। यह गति जितनी ताक़तवर होगी, बादलों से उतनी ही ज़्यादा बारिश या गरज-चमक निकलेगी। तंत्र जितना गहरा, मौसम उतना ही नाटकीय।
मानसूनी अवदाब और उष्णकटिबंधीय चक्रवात एक ही चीज़ हैं? दोनों रिश्तेदार हैं, पर एक नहीं। मानसूनी अवदाब कम तीव्रता वाले उष्णकटिबंधीय निम्न दबाव हैं, जिनकी हवा 62 km/h से कम रहती है और जो सक्रिय मानसून द्रोणी के भीतर बनते हैं। चक्रवात उनसे मज़बूत हैं — हवा 62 km/h या उससे ऊपर — और आमतौर पर मानसून से पहले या बाद के मौसम में बनते हैं। खुले समुद्र पर कुछ अवदाब तीव्र होकर चक्रवात में बदल भी जाते हैं।
भूमध्य रेखा पर चक्रवात क्यों नहीं बनते? घुमाव देने वाला कोरिऑलिस बल वहाँ लगभग शून्य होता है। चक्कर खाने के लिए चक्रवात को आमतौर पर 5° या उससे अधिक अक्षांश चाहिए, चाहे उत्तर का हो या दक्षिण का। यही वजह है कि सिंगापुर पर चक्रवात का सीधा टकराव बहुत कम होता है।
दबाव नीचे से नीचे कहाँ तक जा सकता है? विश्व रिकॉर्ड 870 hPa का है, जो 1979 में पश्चिमी प्रशांत के टाइफ़ून टिप में दर्ज हुआ। बंगाल की खाड़ी का सबसे नीचे का आँकड़ा 1999 के ओडिशा महाचक्रवात के नाम है, लगभग 912 hPa। ज़्यादातर मानसूनी अवदाबों में दबाव सबसे नीचे लगभग 984 से 990 hPa तक पहुँचता है।
अपने शहर का दबाव कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर पृष्ठ पर सतही दबाव दिखाता है। कोलकाता, भुवनेश्वर, चेन्नई, मुंबई, पटना और लखनऊ के पृष्ठों पर काँटे की चाल देखिए। गिरावट दिखे तो उसी पृष्ठ का घंटेवार वर्षा पूर्वानुमान खोलिए — वह बताता है कि बारिश कब और कितनी तेज़ पड़ने वाली है।