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उच्च दबाव प्रणाली

वह क्षेत्र जहाँ वायुमंडलीय दबाव आसपास से ऊँचा होता है और हवा नीचे उतरकर गर्म तथा शुष्क हो जाती है — साफ़ आसमान, हल्की हवा और सूखा मौसम इसकी पहचान हैं। दक्षिण एशिया की सर्दी और पूर्वोत्तर मानसून दोनों इसी से चलते हैं।

घटनाएँ

उच्च दबाव प्रणाली क्या है?

उच्च दबाव प्रणाली — मौसम विज्ञान में प्रतिचक्रवात, और चार्ट पर सिर्फ़ “उच्च” — वह इलाक़ा है जहाँ उसी ऊँचाई पर आसपास की तुलना में वायुमंडलीय दबाव ज़्यादा होता है। ऊँचे दबाव की हवा बाहर धकेलती है, और उसकी जगह भरने ऊपर से हवा नीचे उतरती है — उतरते-उतरते दबती, गर्म होती और सूखती जाती है। नतीजा हर बार वही: साफ़ आसमान, हल्की हवा और ठहरा हुआ, स्थिर मौसम।

दक्षिण एशिया के पाठक के लिए यह किताबी बात नहीं। दिसंबर की वह सुबह जब धूप तो है पर हवा काटती है, मार्च की वह बेबादल दोपहर जब पारा चढ़ता चला जाता है — दोनों के पीछे कोई उच्च दबाव बैठा होता है। सर्दियों पर साइबेरियाई उच्च दबाव का क़ब्ज़ा रहता है, पर उसकी ठंडी उत्तरी हवाओं को हिमालय रोक लेता है, इसलिए भारत के मैदानों तक ठंडी हवा मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम से, पश्चिमी विक्षोभों के पीछे-पीछे पहुँचती है। गर्मियों में तिब्बत के ऊपर बना तिब्बती उच्च दबाव दक्षिण-पश्चिम मानसून को सहारा देता है। दक्षिणी हिंद महासागर के ऊपर फैली उपोष्ण उच्च दबाव पट्टी वे दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक हवाएँ पैदा करती है जो आगे चलकर मानसून बनती हैं, और प्रशांत उच्च दबाव पश्चिमी प्रशांत में टाइफून का रास्ता तय करने में हिस्सा लेता है।

नीचे उतरती हवा: ऊँचा दबाव बनने के तीन रास्ते

पहला रास्ता उपोष्ण अवतलन है। उष्णकटिबंध में ऊपर उठी हवा लगभग 25-35 डिग्री अक्षांश पर वापस सतह की ओर लौटती है और उतरते समय दबकर गर्म हो जाती है। इसी से महासागरों के ऊपर अर्ध-स्थायी उपोष्ण उच्च दबाव बनते हैं — अटलांटिक का अज़ोरेस उच्च और प्रशांत का हवाई उच्च इसी क़िस्म के हैं।

दूसरा रास्ता ठंडे महाद्वीपीय प्रतिचक्रवात का है। सतह के पास की ठंडी, भारी हवा चारों ओर क्षैतिज रूप से फैलती है और केंद्र में दबाव चढ़ जाता है। सर्दियों का साइबेरियाई उच्च और कनाडाई ध्रुवीय उच्च इसी तरह खड़े होते हैं, और उत्तर भारत में शीतलहर के दौर इन्हीं से निकलते हैं।

तीसरा रास्ता शीत वाताग्र के ठीक पीछे खुलता है। वाताग्र गुज़र जाने के बाद ठंडी शुष्क हवा नीचे बैठती है, थोड़े समय के लिए उच्च दबाव बनता है और आसमान खुल जाता है। भारतीय सर्दी में पश्चिमी विक्षोभ के गुज़रने के बाद यही दृश्य बार-बार दोहराता है।

इन्हीं उपोष्ण पट्टियों से — उत्तरी गोलार्ध में लगभग 30°N और दक्षिणी गोलार्ध में लगभग 30°S — व्यापारिक हवाएँ निकलती हैं: उत्तरी उत्तर-पूर्व से भूमध्य रेखा की ओर, दक्षिणी दक्षिण-पूर्व से। जहाँ ये दोनों मिलती हैं वहाँ अंतः-उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) बनता है, जो मौसम के साथ खिसकता है और गर्मियों में दक्षिण एशिया की मानसून द्रोणी बन जाता है।

उच्च दबाव प्रणाली भारत और दक्षिण एशिया में

अक्टूबर के आख़िर से मार्च तक साइबेरिया के ऊपर ठंडी, घनी हवा जमा होती रहती है; वहाँ सतह का तापमान -30 से -50°C तक गिर जाता है और दबाव 1030 से 1060 hPa तक चढ़ जाता है। यह भारी ढेर एक जगह टिकता नहीं, इसलिए उत्तरी हवाएँ मध्य एशिया और चीन होते हुए दक्षिण की ओर फैलती हैं। भारत तक पहुँचने से उन्हें हिमालय रोक देता है, सो उत्तर भारत तक ठंडी शुष्क हवा मुख्य रूप से उत्तर-पश्चिम से आती है। यही दौर किसी पश्चिमी विक्षोभ से जुड़ जाए, तो शीतलहर की घटनाएँ बनती हैं।

असर हर देश में अलग शक्ल लेता है। उत्तर भारत में ठंडी शुष्क हवाएँ, पाले वाली सुबहें और कोहरा सर्दी की पहचान बन जाते हैं। पाकिस्तान में तस्वीर क़रीब-क़रीब वैसी ही रहती है, कहीं-कहीं ठंड और तीखी पड़ती है। बांग्लादेश में उत्तरी हवाएँ चलती हैं और मौसम शुष्क रहता है। बंगाल की खाड़ी के ऊपर इसी दौर में पूर्वोत्तर मानसून सक्रिय होता है, और तमिलनाडु को उलटी दिशा में बहती व्यापारिक हवाओं के ज़रिए इसी मानसून की बारिश मिलती है। एक ही मौसमी व्यवस्था उत्तर के मैदानों में कंबल निकलवाती है और तमिलनाडु में छाता।

तिब्बती प्रतिचक्रवात: वह “उच्च” जो मानसून खींच लाता है

गर्मियों में तिब्बत के ऊपर, ऊपरी स्तरों पर, एक विशाल उच्च दबाव प्रणाली बैठती है — तिब्बती उच्च दबाव या तिब्बती प्रतिचक्रवात। नाम भले “उच्च” हो, काम उल्टा दिखता है: यह मानसून को रोकती नहीं, उसे सहारा देती है।

तिब्बती पठार पर पड़ने वाली तेज़ गर्मी ऊपर की हवा को उठाती है। यही उठाव भारत भर में सतह पर निम्न दबाव का खिंचाव पैदा करता है, और उस खाली जगह को भरने के लिए हिंद महासागर की नम हवा उत्तर की ओर बहती है। यही दक्षिण-पश्चिम मानसून है।

मानसून की ताक़त आँकने वाले इसीलिए इस प्रणाली पर नज़र टिकाए रखते हैं। तिब्बती उच्च कमज़ोर पड़े या अपनी जगह से खिसके तो मानसून भी ढीला पड़ जाता है; मज़बूत बना रहे तो मानसून दमदार रहता है। दक्षिण एशिया में यही वह जगह है जहाँ “उच्च दबाव यानी सूखा मौसम” वाला आम नियम उलटा काम करता है।

ठहरी हवा की क़ीमत: कोहरा, धुआँ और मैदानों की लू

उत्तर भारत में सर्दियों की ख़राब हवा और मज़बूत उच्च दबाव अक्सर साथ-साथ चलते हैं। उच्च के भीतर हवा लगभग ठहरी रहती है, और रात में ठंडी होती सतह के ऊपर तापमान व्युत्क्रमण आसानी से बन जाता है। पराली का धुआँ, गाड़ियों का निकास और कारख़ानों का उत्सर्जन ज़मीन के पास की पतली परत में क़ैद होकर वहीं जमा रहते हैं, क्योंकि उन्हें बहाकर ले जाने वाली हवा ही नहीं चलती। शहर के बीच का ताप द्वीप प्रभाव इस गर्माहट को और बढ़ा देता है। दिल्ली के सबसे बुरे स्मॉग वाले दिन अमूमन उच्च दबाव के इसी क़ब्ज़े के दिन होते हैं।

गर्मियों में वही ठहराव दूसरी शक्ल ले लेता है। ज़मीन के ऊपर अटकी उच्च दबाव प्रणाली बादल नहीं बनने देती, इसलिए धूप पूरे दिन बिना रुकावट ज़मीन तपाती है; हवा न चलने से ठंडक का कोई रास्ता नहीं बचता। मानसून-पूर्व की लू अक्सर मध्य भारत के ऊपर, ऊँचाई पर जमे उच्च दबावों के साथ मेल खाती है।

दबाव आसपास से ऊँचा: चार्ट और फ़ोन पर पहचान

मौसम मॉडल समदाब चार्ट पर समुद्र तल का दबाव दिखाते हैं। उच्च दबाव प्रणाली वहाँ एक के भीतर एक बंद घेरों की शक्ल में दिखती है, जिसके बीच में H या HIGH लिखा होता है।

Mausam Online के शहर पन्नों पर पहचान इससे भी सीधी है। दबाव आसपास के इलाक़ों से ज़्यादा हो तो आम तौर पर उच्च दबाव का असर माना जाता है। दिन और रात के तापमान में बड़ा अंतर हो — धूप भरे दिन और ठंडी, साफ़ रातें — तो यह ठहरे हुए उच्च का संकेत है। कई दिन लगातार साफ़ आसमान का पूर्वानुमान बताता है कि नियंत्रण उच्च दबाव के हाथ में है। और काँटा गिरने लगे तो समझिए निम्न दबाव पास आ रहा है, उच्च पीछे हट रहा है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

उच्च दबाव में मौसम साफ़ क्यों रहता है? इसलिए कि हवा नीचे उतर रही होती है। उतरती हवा दबती है, गर्म होती है और सूखती जाती है, जिससे बादल बिखर जाते हैं। ऊपर उठने वाली हवा ही न हो तो बादल या वर्षा बनने की कोई वजह नहीं बचती — बचता है सिर्फ़ साफ़ आसमान और धूप।

उच्च दबाव अच्छा है या बुरा? बाहरी कामकाज, खेती और मछली पकड़ने के लिहाज़ से आम तौर पर अच्छा। लेकिन सर्दियों में यही प्रणाली मैदानों पर ठंडी हवा को क़ैद कर लेती है और प्रदूषण को गाढ़ा कर देती है। गर्मियों में ज़मीन के ऊपर ठहरा हुआ उच्च दबाव लू जैसी हालत बना देता है।

सर्दियों का उच्च दबाव दिल्ली के कोहरे और प्रदूषण से क्यों जुड़ा है? रात भर विकिरण से ठंडी होती सतह मज़बूत तापमान व्युत्क्रमण खड़ा कर देती है, जो प्रदूषकों और जलवाष्प दोनों को ज़मीन के पास की पतली परत में बाँध देता है। बिखेरने वाली हवा न चले तो कोहरा और स्मॉग, दोनों कई दिन टिके रहते हैं।

क्या उच्च दबाव से लू चलती है? हाँ। ज़मीन के ऊपर एक जगह अटकी उच्च दबाव प्रणालियाँ ही ज़्यादातर लू की मौसमी वजह होती हैं। वे बादलों को बनने नहीं देतीं, हवा से मिलने वाली ठंडक रोक देती हैं और सूरज को लगातार ज़मीन तपाने देती हैं। दक्षिण एशिया में मानसून-पूर्व की लू अक्सर मध्य भारत के ऊपर, ऊँचाई पर जमे उच्च दबावों के साथ आती है।

अपने शहर का दबाव कहाँ देखूँ? Mausam Online हर शहर पन्ने पर मौजूदा वायुमंडलीय दबाव दिखाता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, जयपुर और भोपाल के पन्ने देखिए — सर्दियों में इन्हीं आँकड़ों से उच्च दबाव की पकड़ सबसे साफ़ दिखती है।

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