मुख्य सामग्री पर जाएं

तापमान व्युत्क्रमण

सामान्य तापमान-क्रम का उलट जाना — ज़मीन के पास ठंडी हवा और उसके ऊपर गर्म परत, जो धुआँ, कोहरा और प्रदूषण नीचे ही क़ैद कर लेती है। दिल्ली-लाहौर की सर्दियों के स्मॉग की जड़ यही है।

घटनाएँ

तापमान व्युत्क्रमण क्या है?

सामान्य वायुमंडल में ऊपर जाते-जाते हवा ठंडी होती जाती है — औसतन 6.5 °C प्रति किलोमीटर, जिसे पर्यावरणीय ह्रास दर कहा जाता है। तापमान व्युत्क्रमण इसी क्रम को उलट देता है: ज़मीन से सटी हवा ठंडी रह जाती है और उसके ऊपर गर्म हवा की परत आ बैठती है।

नीचे की ठंडी हवा भारी है, इसलिए वहीं पड़ी रहती है; ऊपर की गर्म परत हल्की है, इसलिए नीचे उतरकर उसे हटाती नहीं। लंबवत मिश्रण रुक जाता है और धुआँ, धूल, कोहरा तथा PM2.5 उसी पतली सतही परत में क़ैद हो जाते हैं। उत्सर्जन चलता रहता है, हवा वही की वही रहती है, इसलिए सांद्रता घंटे-दर-घंटे चढ़ती जाती है।

दक्षिण एशिया के पाठक के लिए यह किताबी बात नहीं है। दिल्ली, लाहौर, पटना, कानपुर, ढाका और सिंधु-गंगा के मैदान के दर्जनों शहरों की सर्दियों का ज़हरीला स्मॉग इसी ढाँचे की देन है — पराली का धुआँ, वाहनों का धुआँ, औद्योगिक उत्सर्जन और धूल अक्सर महज़ 50 से 200 मीटर मोटी परत में दब जाते हैं।

ढक्कन चार तरह से बनता है

विकिरण व्युत्क्रमण दक्षिण एशिया की सर्दियों का मुख्य किरदार है। साफ़ और शांत रात में ज़मीन अपनी गर्मी हवा से कहीं तेज़ी से विकिरित कर देती है; ज़मीन से लगी हवा सबसे तेज़ ठंडी होती है और कुछ सौ मीटर ऊपर की हवा से भी ठंडी पड़ जाती है। सुबह की धूप चढ़ते ही यह परत आमतौर पर टूट जाती है। दिल्ली और लाहौर की सर्दियों के स्मॉग की सबसे बड़ी वजह यही क़िस्म है।

अवतलन व्युत्क्रमण तब बनता है जब ऊपर की हवा नीचे उतरती है, जैसा उच्च दाब वाले तंत्रों में होता है। उतरती हवा दबाव से गर्म होकर ठंडी सतही हवा के ऊपर गर्म छत बना देती है, और स्थिर परिस्थितियों में कई दिन टिकी रह सकती है।

वाताग्र व्युत्क्रमण में गर्म वायुराशि किसी मोर्चे पर ठंडी वायुराशि के ऊपर चढ़ जाती है। यह मुख्यतः मध्य अक्षांशों की परिघटना है।

पर्वतीय व्युत्क्रमण घाटियों की कहानी है। रात में ठंडी हवा ढलानों से उतरकर तलहटी में जमा होती रहती है, और कश्मीर या काठमांडू जैसी घाटियों में चूल्हों तथा खेतों की आग का धुआँ उसी ठंडी हवा में फँसा रह जाता है।

तापमान व्युत्क्रमण भारत और दक्षिण एशिया में

नवंबर से फ़रवरी तक चलने वाला सिंधु-गंगा के मैदान का स्मॉग-मौसम धरती के सबसे गंभीर वायु प्रदूषण दौरों में गिना जाता है, और उसका तात्कालिक कारण व्युत्क्रमण ही है। मैदान की बनावट इसे असाधारण रूप से असुरक्षित बना देती है:

जमा होने का क्रम रोज़ दोहराता है। शाम ढलते ही ज़मीन तेज़ी से ठंडी होने लगती है। आधी रात तक मज़बूत विकिरण व्युत्क्रमण खड़ा हो जाता है और प्रदूषक इकट्ठा होने लगते हैं। भोर में सड़क की ऊँचाई पर सांद्रता सबसे ऊँची होती है — ठीक उसी समय जब लोग काम पर निकलते हैं। सुबह चढ़ते-चढ़ते धूप ज़मीन गर्म करती है और परत नीचे से कटने लगती है। दोपहर तक वह बिखर भी सकती है, और हवा शांत रही तो टिकी भी रह सकती है।

नवंबर में कई-कई दिन की ठहराव-घटनाएँ आम हैं। ऐसे दौर में ढक्कन दिन में भी मुश्किल से टूटता है, प्रदूषण दिन-ब-दिन जुड़ता जाता है और PM2.5 500 से 1000 μg/m³ तक पहुँच जाता है।

मिश्रण-गहराई: 50 मीटर और तीन किलोमीटर के बीच का फ़र्क़

हवा कितनी ऊँचाई तक मिल सकती है — यही मिश्रण-गहराई है, और प्रदूषण की सांद्रता सीधे इसी से तय होती है:

दिल्ली में सर्दियों की रातों की मिश्रण-गहराई अक्सर 50 से 150 मीटर तक गिर जाती है। इसका सीधा मतलब यह है कि पूरे शहर का उत्सर्जन 50 मंज़िला इमारत से भी पतली परत में ठूँस दिया जाता है।

नापने और पहले से बताने के तरीक़े भी हैं। IMD दिन में दो बार वायुमंडल का तापमान-प्रोफ़ाइल नापता है, जिससे व्युत्क्रमण की परत सीधे दिख जाती है। संख्यात्मक मौसम मॉडल मिश्रण-गहराई का अनुमान 5 से 7 दिन पहले तक देते हैं, और PM2.5 के पूर्वानुमान इन्हीं अनुमानों को उत्सर्जन के आँकड़ों से जोड़कर बनाए जाते हैं। मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर PM2.5 के साथ राष्ट्रीय AQI दिखाता है — AQI चढ़ता दिखे तो पीछे आमतौर पर व्युत्क्रमण ही काम कर रहा होता है।

एक ही उत्सर्जन, सर्दी में कई गुना असर

व्युत्क्रमण ख़ुद कोई प्रदूषक नहीं छोड़ता; वह सिर्फ़ गुणक है। गर्मियों की दोपहर में उतना ही धुआँ 2 से 3 किलोमीटर ऊँचाई तक बिखर जाता है और उसका असर कहीं कम रह जाता है। सर्दियों की रात वही धुआँ 100 से 200 मीटर के भीतर दब जाता है, और सड़क पर खड़े आदमी के फेफड़ों तक पहुँचने वाली मात्रा कई गुना बढ़ जाती है।

इसी वजह से लाहौर से ढाका तक फैली ज़हरीली चादर वहाँ रहने वाले लोगों की ज़िंदगी में घुस जाती है। सबसे ज़्यादा मार उन पर पड़ती है जो भोर में बाहर होते हैं — स्कूल जाते बच्चे, दुपहिया सवार, रेहड़ी-पटरी वाले, यातायात पुलिस। कोहरा भी उसी ढक्कन के नीचे टिकता है, इसलिए दृश्यता गिरने और हवा ज़हरीली होने की घटनाएँ अक्सर एक ही रात को आती हैं।

नीति के लिए इसका अर्थ साफ़ है। परत को हटाया नहीं जा सकता, उसमें भरने वाली चीज़ को घटाया जा सकता है। भारत का राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) और पाकिस्तान की स्मॉग योजनाएँ इसी तर्क पर टिकी हैं: पराली जलाना, वाहन, उद्योग और बायोमास चूल्हे।

ढक्कन टूटता कैसे है: धूप, हवा और बारिश

तीन ताक़तें व्युत्क्रमण को तोड़ती हैं। पहली सौर ताप है — सूरज ज़मीन गर्म करता है, ज़मीन अपने ऊपर की हवा गर्म करती है, और परत नीचे से कटने लगती है। दूसरी हवा है: लगातार 15 से 20 km/h से ऊपर चलती हवाएँ निचले वायुमंडल को मिला देती हैं। तीसरी बारिश है, जो कणों को धो देती है और परतों का तापीय ढाँचा ही बिगाड़ देती है।

दक्षिण एशिया के सर्दियों के दौरों में यही तीनों तय करती हैं कि स्मॉग कितने दिन चलेगा। 5 km/h से नीचे की हल्की हवाओं में व्युत्क्रमण कई दिन तक टिका रहता है। पश्चिमी विक्षोभ के साथ आने वाली लगातार पछुआ हवाएँ अस्थायी राहत देती हैं। सर्दियों की बारिश सबसे कारगर प्राकृतिक सफ़ाई है।

घाटियों का अपना ढक्कन: काठमांडू से क्वेटा तक

पहाड़ों से घिरी बस्तियाँ मैदान से अलग क़िस्म की मार झेलती हैं, क्योंकि वहाँ ठंडी हवा को बहकर निकलने की जगह ही नहीं मिलती।

काठमांडू घाटी में सर्दियों के व्युत्क्रमण बनते-बिगड़ते रहते हैं, चारों ओर के पहाड़ों के घेरे में क़ैद होकर। वाहनों का धुआँ और ईंट-भट्ठों का उत्सर्जन उसी द्रोणी में जमा होता रहता है; यह दुनिया की सबसे प्रदूषित राजधानियों में गिनी जाती है।

श्रीनगर और कश्मीर घाटी में सर्दियों के व्युत्क्रमण के साथ गर्माहट के लिए जलाई जाने वाली लकड़ी का धुआँ जुड़ जाता है। औद्योगिक उत्सर्जन सिंधु-गंगा के मैदान जितना नहीं है, फिर भी हालत गंभीर रहती है।

क्वेटा पहाड़ों से घिरी घाटी है, जहाँ प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। डीज़ल का धुआँ और धूल व्युत्क्रमण के नीचे जमा होते रहते हैं।

इसी श्रेणी का एक अंतरराष्ट्रीय उदाहरण चियांग माई घाटी है। मार्च-अप्रैल में खेतों की आग और घाटी का व्युत्क्रमण मिलकर AQI को कभी-कभी 500 के पार ले जाते हैं, और स्कूल बंद होना आम बात हो जाती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

दिल्ली सर्दियों में इतनी प्रदूषित क्यों हो जाती है? ऊँचे उत्सर्जन और तापमान व्युत्क्रमण का मेल इसकी वजह है। थोड़ी-सी पराली का धुआँ भी तब विनाशकारी बन जाता है जब सर्दियों का व्युत्क्रमण उसे ज़मीन से 100 से 200 मीटर के भीतर टाँक देता है। उतना ही उत्सर्जन गर्मियों में 2 से 3 किलोमीटर ऊँचाई तक बिखर जाता और असर कहीं कम होता।

क्या सरकार व्युत्क्रमण के बारे में कुछ कर सकती है? नहीं। व्युत्क्रमण प्राकृतिक मौसमी परिघटना है। सरकारी कार्रवाई उस फँसी हुई हवा में भरने वाले उत्सर्जन पर ही हो सकती है — पराली जलाना, वाहन, उद्योग और बायोमास चूल्हे। भारत का NCAP और पाकिस्तान की स्मॉग योजनाएँ इन्हीं स्रोतों को निशाना बनाती हैं।

दिल्ली में स्मॉग का मौसम कब ख़त्म होता है? फ़रवरी आमतौर पर बदलाव का महीना होता है। पश्चिमी विक्षोभ बारिश लाते हैं जो हवा धो देती है। मार्च तक ज़मीन का बढ़ा हुआ ताप रात के व्युत्क्रमण तोड़ने लगता है। अप्रैल आते-आते मानसून-पूर्व की धूल भरी धुंध जगह ले लेती है, और अगले नवंबर से चक्र दोबारा शुरू हो जाता है।

क्या जलवायु परिवर्तन से व्युत्क्रमण बढ़ रहे हैं? प्रमाण मिले-जुले हैं। कुछ अध्ययन कहते हैं कि मध्य अक्षांशों में ठहराव की घटनाएँ बढ़ सकती हैं और सिंधु-गंगा के मैदान की सर्दियाँ थोड़ी और स्थिर हो सकती हैं। फिर भी स्मॉग पर असली नियंत्रण उत्सर्जन का ही रहेगा, जिसे नीति से बदला जा सकता है।

मैं अपने शहर का AQI कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन के हर शहर के पन्ने पर लाइव PM2.5 और राष्ट्रीय AQI दिखता है। सर्दियों में दिल्ली, पटना, लखनऊ, अमृतसर और कोलकाता के पन्ने सबसे काम आते हैं।

संबंधित शब्द

संबंधित शब्द

सभी शब्द