हवा में तैरते सूखे कणों — धूल, धुआँ, प्रदूषक — से घटी दृश्यता, जो कोहरे की पानी की बूँदों से अलग है। उत्तर भारत और पाकिस्तान की सर्दियों की धुंध सबसे गंभीर है।
घटनाएँधुंध क्या है?
सूखे कण — धूल, धुआँ, सल्फेट, कालिख और कार्बनिक एरोसोल — हवा में टिके रह जाएँ तो दूर की चीज़ें धुँधली पड़ने लगती हैं। इसी को धुंध कहते हैं। कोहरा और मिस्ट पानी की बूँदों से बनते हैं; धुंध नहीं, और यही फ़र्क़ बाक़ी सब कुछ बदल देता है। बारिश या तेज़ हवा के बिना ये कण नीचे नहीं बैठते, इसलिए धुंध कई-कई दिन टिकी रह सकती है।
दक्षिण एशिया में यह सिर्फ़ दिखने-न-दिखने का मामला नहीं है। सिंधु-गंगा का मैदान — पाकिस्तानी पंजाब से दिल्ली, उत्तर प्रदेश और बिहार होते हुए बांग्लादेश तक — हर सर्दी दुनिया के सबसे बुरे धुंध-दौरों से गुज़रता है। PM2.5 विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के दिशानिर्देश से 10 से 30 गुना ऊपर पहुँच जाता है। क़ीमत असमय मौतों, साँस की बीमारियों और आर्थिक नुक़सान में चुकती है।
सूखे कण बनाम पानी की बूँद: कोहरा, मिस्ट और स्मॉग से अलग कैसे
चारों शब्द बातचीत में गड्ड-मड्ड हो जाते हैं, जबकि लकीरें साफ़ हैं।
कोहरा पानी की बूँदों का है: आर्द्रता 90 प्रतिशत से ऊपर, दृश्यता एक किलोमीटर से नीचे, सेहत पर सीधा असर कम। मिस्ट उसका हल्का रूप है — आर्द्रता ऊँची, दृश्यता एक से पाँच किलोमीटर। धुंध अलग चलती है: आर्द्रता 80 प्रतिशत से नीचे रहने पर भी बनी रहती है, दृश्यता कितनी घटेगी यह बदलता रहता है, और PM2.5 की वजह से स्वास्थ्य-असर ऊँचा रहता है। स्मॉग सबसे बुरा मेल है — बूँदें और प्रदूषक साथ-साथ, दृश्यता एक किलोमीटर से कम, आर्द्रता ऊँची, असर सबसे गंभीर।
इसीलिए नवंबर की दिल्ली में सुबह की सफ़ेद चादर को “कोहरा” कहना भ्रामक है; वह आमतौर पर स्मॉग होती है। उलटा भी सच है — सूखी धुंध में दृश्यता ठीक-ठाक लगे, तब भी फेफड़ों पर ख़तरा बना रहता है।
धुंध भारत और दक्षिण एशिया में
सर्दियों की प्रदूषण-धुंध (नवंबर से फ़रवरी) सिंधु-गंगा के मैदान की पहचान बन चुकी है। हर अक्टूबर पंजाब और हरियाणा में धान की पराली जलाई जाती है। ठहरी हवा औद्योगिक उत्सर्जन वहीं रोक लेती है, तापमान व्युत्क्रमण वाहनों का धुआँ ज़मीन के पास दबाए रखता है, और अक्टूबर के आख़िर या नवंबर की शुरुआत में दिवाली की आतिशबाज़ी सालाना उछाल जोड़ देती है। सबसे भारी मार दिल्ली एनसीआर, लाहौर, फ़ैसलाबाद, पटना, कानपुर, ढाका और कराची पर पड़ती है।
अप्रैल-मई की धूल-धुंध दूसरी श्रेणी है। थार रेगिस्तान और सूखे मैदानों की “आँधी” राजस्थान, सिंध तथा दक्षिणी पंजाब की धूल आसमान में भर देती है। पछुआ हवाएँ उसे उत्तर भारत के ऊपर पूरब की ओर ढोती हैं और दृश्यता कई दिन तक कम बनी रहती है। जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, जयपुर, दिल्ली और लखनऊ सबसे ज़्यादा प्रभावित रहते हैं।
मार्च से मई में हिमालय की तलहटी अपनी अलग धुंध बनाती है: उत्तराखंड और हिमाचल के चीड़ के जंगल आग पकड़ते हैं और घाटियों का व्युत्क्रमण धुआँ नीचे रोके रखता है। देहरादून, शिमला, अल्मोड़ा और नैनीताल इसकी चपेट में आते हैं।
सीमापार धुंध का चौथा वर्ग भी गिना जाता है, पर एक ग़लतफ़हमी सुधारने लायक़ है: इंडोनेशिया की पीट-आग का धुआँ दक्षिण-पूर्व एशिया तक ही सीमित रहता है, दक्षिण एशिया तक नहीं आता। म्यांमार के जंगलों की आग ज़रूर कभी-कभी पूर्वोत्तर भारत को छू जाती है।
फेफड़े, उड़ानें और बंद स्कूल
नवंबर से जनवरी के बीच सिंधु-गंगा का मैदान दुनिया का सबसे प्रदूषित आबाद इलाक़ा माना जाता है। भारत में 2019 में 16 लाख 70 हज़ार मौतों का कारण वायु प्रदूषण माना गया, जिनमें से 9 लाख 80 हज़ार मौतें बाहरी हवा के कणों (पार्टिकुलेट मैटर) से जुड़ी थीं (GBD)। दिल्ली के निवासी साफ़ हवा की तुलना में औसतन 11 साल की जीवन-प्रत्याशा गँवाते हैं, बच्चों के फेफड़ों का विकास स्थायी रूप से प्रभावित होता है, और दिल के दौरे, स्ट्रोक, फेफड़ों के कैंसर तथा COPD की दर ऊँची रहती है।
कुछ दौरों ने यह क़ीमत सबको दिखा दी। नवंबर 2016 के दिल्ली स्मॉग में PM2.5 चरम पर 1,000 μg/m³ से ऊपर गया — WHO सीमा का लगभग 40 गुना। नवंबर 2019 के लाहौर-दिल्ली स्मॉग में स्कूल बंद हुए और उड़ानें मोड़नी पड़ीं। नवंबर 2023 में दिल्ली का AQI कई दिन ‘गंभीर’ श्रेणी (401-500) में रहा; 3 नवंबर को यह 468 था। तीनों नवंबर में हैं, और यह संयोग नहीं है।
दृश्यता के किलोमीटर, कणों के माइक्रोग्राम
धुंध नापने के तीन तरीक़े चलन में हैं, और तीनों अलग बात बताते हैं।
पहला दृश्यता है, जिसे हवाई अड्डों और मौसम केंद्रों के ऑप्टिकल सेंसर नापते हैं।
दूसरा कणों की सीधी गिनती है। PM2.5 — ढाई माइक्रोमीटर या उससे छोटे कण — धुंध का मुख्य संकेतक है, जबकि PM10 मोटी धूल पकड़ता है। इन्हें ज़मीन के संदर्भ मॉनिटर नापते हैं और अब बढ़ते हुए उपग्रह भी। तीसरा है एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (AOD), जिसमें उपग्रह पूरे वायुमंडल का कण-घनत्व आँकते हैं; MODIS और INSAT-3D इस क्षेत्र को यह कवरेज देते हैं।
मौसम ऑनलाइन के हर शहर के पन्ने पर लाइव PM2.5, PM10 और राष्ट्रीय AQI साथ दिखते हैं, गंभीर प्रदूषण पर चेतावनी मिलती है, और दृश्यता सामान्य मौसम आँकड़ों में शामिल है।
धुंध वाले दिनों में क्या करें, और नीति क्या कर रही है
AQI 100 से ऊपर जाए या PM2.5 35 μg/m³ से ऊपर, तो कुछ चीज़ें सीधे मदद करती हैं:
- बाहर की मेहनत वाली कसरत टालें; व्यायाम घर के अंदर करें।
- बाहर जाना ज़रूरी हो तो N95 या KN95 मास्क पहनें; कपड़े के और सर्जिकल मास्क PM2.5 के ख़िलाफ़ कहीं कम कारगर हैं।
- घर में HEPA फ़िल्टर वाला एयर प्यूरिफ़ायर चलाएँ — सबसे कारगर उपाय यही है।
- चरम घंटों में खिड़कियाँ बंद रखें।
- बच्चे, बुज़ुर्ग, दमा और दिल के मरीज़ भीतर रहें।
- पानी पीते रहें; साँस की नली की सफ़ाई में मदद मिलती है।
- सुबह-शाम भीड़ के समय ट्रैफ़िक वाली सड़कों से बचें।
AQI 300 के पार सरकारें स्कूल और बाहरी गतिविधियाँ बंद कर सकती हैं, दिल्ली में GRAP के तहत निर्माण रुकता है, और वाहन घटाकर सार्वजनिक परिवहन अपनाने को कहा जाता है।
नीति के स्तर पर भारत का राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP) 130 शहरों में PM10 घटाने का लक्ष्य रखता है — वे शहर जो वायु-गुणवत्ता मानकों पर खरे नहीं उतरते और दस लाख से ज़्यादा आबादी वाले शहर। पाकिस्तान की पंजाब स्मॉग योजना सीमापार प्रदूषण पर काम करती है, और बांग्लादेश विश्व बैंक से वित्तपोषित बांग्लादेश स्वच्छ वायु परियोजना (क्लीन एयर प्रोजेक्ट) में भागीदार है। ठोस क़दमों में पराली की जगह मल्चिंग के लिए हैप्पी सीडर, दिल्ली के बिजलीघरों का कोयले से गैस पर जाना, 2020 से BS-VI उत्सर्जन मानक, ताप बिजलीघरों में अनिवार्य FGD (अमल पिछड़ा हुआ) और दिल्ली का GRAP शामिल हैं। प्रगति धीमी रही, पर नापी जा सकती है — दिल्ली का औसत PM2.5 एक दशक में घटा है, हालाँकि सर्दियों के शिखर अब भी ख़तरनाक हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
धुंध और कोहरे में फ़र्क़ कैसे पहचानें? कोहरा पानी की बूँदों का है — आर्द्रता क़रीब 100 प्रतिशत, दृश्यता एक किलोमीटर से कम। धुंध सूखे कणों की है: आर्द्रता कम, और हवा में धूल, धुआँ या प्रदूषक। PM2.5 तथा PM10 के कारण धुंध सेहत के लिए कहीं ज़्यादा नुक़सानदेह है। स्मॉग दोनों का मेल है।
उत्तर भारत दक्षिण भारत से इतना धुँधला क्यों रहता है? उत्तर के मैदानों की बनावट प्रदूषकों को निकलने का रास्ता नहीं देती। उस पर सर्दियों का तापमान व्युत्क्रमण, ठहरी हवा और बड़े पैमाने पर पराली जलना जुड़कर प्रदूषण को सतह के पास क़ैद कर देते हैं। दक्षिण भारत समुद्र के पास है; समुद्री हवाएँ और गर्म सर्दियाँ प्रदूषण तेज़ी से बिखेर देती हैं।
क्या धुंध पहले से बदतर हो गई है? दिल्ली में PM2.5 2016 के आसपास चरम पर था और उसके बाद NCAP, BS-VI मानकों तथा दिवाली की आतिशबाज़ी पर पाबंदियों से थोड़ा घटा है। फिर भी सर्दियों के शिखर दुनिया में सबसे ऊँचे हैं। पाकिस्तान के पंजाब में औद्योगिक विस्तार से रुझान ऊपर जा रहा है।
धुंध का हवाई यात्रा पर क्या असर पड़ता है? जब दृश्यता 800 मीटर से नीचे हो और रनवे विज़ुअल रेंज (RVR) भी 550 मीटर से नीचे चली जाए, तब हवाई अड्डों को CAT II/III प्रक्रिया पर जाना पड़ता है। दिल्ली के IGI हवाई अड्डे पर CAT III-B क्षमता है, जहाँ 50 मीटर दृश्यता में भी विमान उतारे जा सकते हैं, लेकिन पटना और वाराणसी जैसे कई छोटे हवाई अड्डे, जहाँ CAT III नहीं है, पूरी तरह बंद हो जाते हैं। लाहौर पर भी यही मार पड़ती है।
अपने शहर की ताज़ा धुंध और AQI कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर लाइव PM2.5, PM10, राष्ट्रीय AQI और दृश्यता दिखाता है। दिल्ली, पटना, लखनऊ, जयपुर और अमृतसर के पन्ने सर्दियों में रोज़ देखने लायक़ हैं।