मुख्य सामग्री पर जाएं

धुंध

पतला कोहरा, जिसमें क्षैतिज दृश्यता 1 से 5 km के बीच रह जाती है। हिमालय की तलहटी, पश्चिमी घाट के हिल स्टेशनों और नदी घाटियों की भोर इसी परत से बनती है, और पहाड़ी सड़कों पर यह अब भी मायने रखती है।

घटनाएँ

धुंध क्या है?

पहाड़ की भोर में सामने की चोटी जब धुल-सी जाती है और चाय के बागान कुछ सौ मीटर आगे जाकर सफेदी में घुल जाते हैं, तब हवा में पानी की बेहद महीन बूँदें तैर रही होती हैं। धुंध यही है — हवा में लटकी सूक्ष्म जल बूँदें, जो क्षैतिज दृश्यता को 1,000 से 5,000 मीटर के बीच ले आती हैं।

बनावट के लिहाज से यह कोहरे से अलग नहीं है। दोनों एक ही संघनन प्रक्रिया से बनते हैं और दोनों में पानी की बूँदें ही हैं। अंतर सिर्फ घनेपन का है: परत जितनी पतली रहेगी, उतनी दूर तक नजर जाएगी। दृश्यता अगर 1,000 मीटर से नीचे उतर जाए, तो वही सफेदी अब धुंध नहीं, कोहरा कहलाएगी।

दक्षिण एशिया का पाठक इससे मुख्यतः दो जगह टकराता है — हिमालय की तलहटी और हिल स्टेशनों की सुबह में, और नदी घाटियों, झीलों तथा बैकवाटर के किनारे ठंडी भोर में। शिमला, दार्जिलिंग, मुन्नार और मसूरी की जिस सुबह को लोग तस्वीरों से पहचानते हैं, वह बड़ी हद तक इसी पतली परत की देन है।

ओसांक, केंद्रक और 1,000 मीटर की लकीर

बूँद बनने की शर्त सीधी है: जमीन से लगी हवा ठंडी होकर अपने ओसांक तक उतर आए। उस बिंदु पर जलवाष्प और नहीं टिक पाती और हवा में पहले से मौजूद महीन कणों — धूल, पराग, धुएँ के कण — पर जम जाती है। ये कण संघनन के केंद्रक का काम करते हैं; इनके बिना बूँद को शुरू होने के लिए कोई सतह ही नहीं मिलती।

इस तरह बनी बूँदें आमतौर पर 5 से 20 माइक्रोमीटर चौड़ी होती हैं। यह नाप दोनों तरफ से मायने रखता है — इतनी छोटी कि घंटों हवा में टिकी रह सकें, और इतनी बड़ी कि रोशनी को ध्यान देने लायक बिखेर दें। इसी बिखराव के कारण दूर की चीजें धुलकर सफेद पड़ती दिखती हैं।

अब वह लकीर, जिस पर नाम बदल जाता है। दृश्यता और आर्द्रता के आधार पर तीन चीजें अलग-अलग गिनी जाती हैं:

धुंध और धुंधलेपन का फर्क पहचानने का सबसे भरोसेमंद तरीका किसी यंत्र में नहीं, त्वचा में है। धुंध गीली होती है — उसमें से गुजरने पर चेहरे और कपड़ों पर हल्की नमी बैठ जाती है। धुंधलापन सूखा होता है और ऐसी कोई नमी पीछे नहीं छोड़ता।

धुंध भारत और दक्षिण एशिया में

सबसे पक्का पता हिल स्टेशनों का है, जहाँ सुबह की यह परत खबर से ज्यादा रोज की आदत है:

मैदानों और पानी के किनारों की अपनी जगहें हैं। सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र की घाटियों में ठंडी सुबहों में यह परत बनती है। केरल के बैकवाटर — आलेप्पी और कुमारकोम — इसके लिए जाने जाते हैं। सुंदरबन और बांग्लादेश के डेल्टा में सुबह की धुंध आम बात है।

बनने के लिए चार चीजें साथ चाहिए, और इन्हीं से अंदाजा लगता है कि कल सुबह परत मिलेगी या नहीं:

पहाड़ी मोड़, चाय की पत्ती और छोटे हवाई अड्डे

कोहरे के मुकाबले धुंध कम खतरनाक है, पर पहाड़ पर “कम” का मतलब “बेफिक्र” नहीं होता।

गाड़ी चलाने वालों के लिए मुश्किल तीन तरफ से आती है: सड़क गीली हो जाती है, किनारे की चट्टानें फिसलनभरी हो जाती हैं, और हेयरपिन मोड़ पर सामने से आती गाड़ी उस दूरी पर दिखती है जो ब्रेक के लिए कम पड़ सकती है। पहाड़ी रास्तों पर सुबह जल्दी निकलना हो तो रफ्तार घटाना और अगली गाड़ी से फासला बढ़ाना इसी वजह से जरूरी है।

हवाई यात्रा में असर छोटे और पहाड़ी हवाई अड्डों पर दिखता है। धर्मशाला और पाकयोंग जैसी जगहों पर धुंध कभी-कभी उड़ानों में देरी करा देती है — यानी सुबह की फ्लाइट पकड़नी हो तो समय में थोड़ी गुंजाइश रखकर चलना समझदारी है।

काम के घंटों पर भी इसका सीधा असर पड़ता है। चाय बागानों में मजदूर पत्ती तोड़ना तब तक शुरू नहीं करते, जब तक धुंध उठ न जाए। बागान का दिन इस तरह सूरज से नहीं, धुंध के छँटने से शुरू होता है।

भोर के तीन घंटे: धुंध कब उतरती है और कब उठ जाती है

सबसे भरोसेमंद समय सूर्योदय से ठीक पहले का है, क्योंकि तभी तापमान सबसे नीचे और सापेक्ष आर्द्रता सबसे ऊपर होती है। देर शाम बारिश की फुहार पड़ जाए, तब भी परत बन सकती है: सतह पर बची नमी हवा के ठंडा होते ही संघनित होने लगती है।

जगह भी उतना ही तय करती है। घाटियों में ठंडी भारी हवा रात भर नीचे जमा होती रहती है, इसलिए धुंध सबसे पहले वहीं बैठती है। पानी की सतह के ऊपर वाष्पीकरण लगातार जलवाष्प की आपूर्ति करता रहता है। और घनी वनस्पति के आसपास पेड़-पौधों का वाष्पोत्सर्जन वही नमी हवा में लौटाता है।

छँटने का हिसाब आमतौर पर छोटा होता है। सूरज निकलने के बाद हवा का तापमान ओसांक से ऊपर उठता है और परत 1 से 3 घंटे के भीतर गायब हो जाती है। इसीलिए पहाड़ी सफर में सुबह की यात्रा को एक-दो घंटे टाल देना अक्सर सबसे सस्ता उपाय साबित होता है।

धुंधली सुबह में आँख, कान और नाक

धुंध सिर्फ दृश्यता का आँकड़ा नहीं है; वह इंद्रियों के साथ कुछ करती है, और यही वजह है कि इस पर इतनी तस्वीरें और इतनी कहानियाँ बनी हैं।

साहित्य और सिनेमा ने इसी अनुभव को उठा लिया। दक्षिण एशियाई कहानियों में धुंध अक्सर रहस्य और अनजाने का प्रतीक बनती है — किरदार धुंध से निकलकर सामने आता है। कहीं वह स्मृति और नॉस्टैल्जिया का संकेत है, बीते समय का नरम फोकस; कहीं आध्यात्मिक उपस्थिति का — देवता, आत्माएँ, पूर्वज। शिमला, ऊटी और दार्जिलिंग में फिल्माए गए बॉलीवुड और टॉलीवुड के अनगिनत शुरुआती दृश्य असल में इसी दक्षिण एशियाई धुंध का उत्सव हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

धुंध और कोहरे में फर्क क्या है? सिर्फ दृश्यता का। धुंध में यह 1,000 से 5,000 मीटर रहती है, कोहरे में 1,000 मीटर से नीचे चली जाती है। भौतिक रूप से दोनों एक ही चीज हैं — हवा में लटकी पानी की बूँदें।

धुंध दिखे तो क्या बारिश आने वाली है? आमतौर पर नहीं। यह परत स्थानीय ठंडक से बनती है, बारिश कराने वाली प्रक्रिया से नहीं। हाँ, धुंध देर तक टिकी रहे और आर्द्रता बढ़ती जाए, तो कभी-कभी इसके बाद बूँदाबाँदी या हल्की बारिश हो सकती है।

हिल स्टेशनों पर हमेशा धुंध क्यों रहती है? ऊँचाई के कारण वहाँ की हवा हर सुबह अपने ओसांक तक उतर आती है। ठंडी रातें, नमी छोड़ती घनी वनस्पति, पास की घाटियाँ और झीलें — ये सब मिलकर रात भर संघनन कराते रहते हैं। सूर्योदय के समय इसलिए चारों ओर धुंध फैली मिलती है, जो तापीय गर्मी बढ़ने पर बिखर जाती है।

क्या धुंध गाड़ी या इलेक्ट्रॉनिक सामान को नुकसान पहुँचाती है? सतहों पर यह नमी की पतली परत छोड़ जाती है। लंबे समय तक यही नमी धातु में जंग ला सकती है और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों पर असर डाल सकती है। हिल स्टेशनों के रहने वाले इसीलिए गाड़ी और उपकरण गैराज में रखते हैं और घर के भीतर सिलिका जेल या कम बिजली खाने वाले डीह्यूमिडिफायर का इस्तेमाल करते हैं।

अपने शहर की दृश्यता कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर लाइव दृश्यता दिखाता है, जो धुंध वाले इलाकों में सुबह निकलने से पहले सीधे काम आती है। नदी और डेल्टा वाले शहरों के लिए कोलकाता, पटना और गुवाहाटी देखिए; बैकवाटर के लिए कोच्चि, और मैदानी ठंडी सुबहों के लिए अमृतसर।

संबंधित शब्द

संबंधित शब्द

सभी शब्द