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आर्द्रता

हवा में घुली जलवाष्प की मात्रा, जिसे आमतौर पर सापेक्ष आर्द्रता (%) में बताया जाता है — संख्या जितनी ऊँची, हवा उतनी नम और मौसम उतना चिपचिपा।

मूल बातें

आर्द्रता क्या है?

जून की किसी सुबह मुंबई में थर्मामीटर 32°C से आगे नहीं बढ़ता, फिर भी पंखे के नीचे बैठे आदमी की कमीज़ पीठ से चिपकी रहती है। इसकी वजह तापमान नहीं, आर्द्रता है — हवा में घुली जलवाष्प की वह मात्रा जो आँखों को दिखती नहीं पर हर साँस में महसूस होती है। मौसम ऑनलाइन के शहर पृष्ठों पर तापमान के पास जो प्रतिशत छपा होता है, वही आर्द्रता है, और वह सापेक्ष आर्द्रता है — यही आँकड़ा ज़्यादातर मौसम ऐप दिखाते हैं और इसी को लोग आम बोलचाल में “उमस” कहते हैं।

हवा कितनी जलवाष्प अपने भीतर रख सकती है, यह उसके तापमान पर निर्भर करता है। सापेक्ष आर्द्रता बताती है कि उस क्षमता का कितना हिस्सा भर चुका है। 100% का मतलब है हवा पूरी तरह संतृप्त हो गई — उसके बाद जो नमी आएगी वह ओस या बारिश बनकर बाहर निकलेगी।

मानसून से चलने वाली दक्षिण एशिया की जलवायु में यह संख्या शौक़िया जानकारी नहीं रह जाती। बारिश के मौसम में उपमहाद्वीप के बड़े हिस्से में सापेक्ष आर्द्रता ऊँची बनी रहती है — ऐसी हवा जिसमें धुले कपड़े सूखने का नाम नहीं लेते और शरीर की अपनी ठंडक की व्यवस्था लड़खड़ाने लगती है। आराम और सेहत, दोनों के लिहाज़ से यह मौसम के सबसे काम के आँकड़ों में से एक है।

दो तरह की आर्द्रता और उन्हें नापने वाले यंत्र

नमी दो अलग तरीक़ों से गिनी जाती है, और दोनों का मतलब एक नहीं है।

चूँकि सापेक्ष आर्द्रता तापमान से बँधी है, बिना एक बूँद नमी घटे-बढ़े भी उसकी संख्या दिन भर बदलती रहती है — दोपहर की गर्म हवा में प्रतिशत गिरता है, और रात को वही नमी उसे ऊपर खींच ले जाती है।

नापने का मानक यंत्र हाइग्रोमीटर है। आज के मौसम केंद्र इलेक्ट्रॉनिक सेंसर इस्तेमाल करते हैं। पुरानी डिज़ाइन में दो थर्मामीटर साथ लगाए जाते थे — एक सूखा और एक गीली बत्ती में लिपटा — और दोनों के पाठ का अंतर एक तालिका में देखकर आर्द्रता निकाली जाती थी; इस जोड़ी को साइक्रोमीटर कहते हैं। घरों में लगने वाले छोटे स्मार्ट सेंसर भी अब आम होते जा रहे हैं।

मौसम ऑनलाइन पर दिखने वाले आँकड़े Open-Meteo से आते हैं, जो ECMWF और GFS जैसे बड़े मौसम मॉडलों के आउटपुट पर टिके हैं और हर घंटे ताज़ा होते रहते हैं।

आर्द्रता भारत और दक्षिण एशिया में

साल भर का पूरा ढर्रा मानसून तय करता है:

मौसम के साथ-साथ भूगोल भी बड़ा फ़र्क़ डालता है, और मुंबई, चेन्नई, कराची और चटगाँव जैसे तटीय शहर भी आपस में एक जैसे नहीं हैं: मुंबई में सापेक्ष आर्द्रता हर महीने 67% या उससे ऊपर रहती है, पर कराची में यह नौ महीने 70% से नीचे रहती है और चेन्नई में अप्रैल से अगस्त तक। सिंधु-गंगा का मैदान — दिल्ली, कानपुर, लखनऊ, पटना — बड़ा उतार-चढ़ाव झेलता है: मई में 20–40% और मानसून में इससे कहीं ज़्यादा (दिल्ली में 70–73%)। राजस्थान, भीतरी सिंध और बलूचिस्तान जैसे शुष्क अंदरूनी इलाक़े साल के ज़्यादातर हिस्से में तटीय इलाक़ों से ज़्यादा सूखे रहते हैं। बंगाल की खाड़ी का किनारा — कोलकाता और बांग्लादेश — गर्म समुद्र के पास होने के कारण बारहों महीने नम रहता है।

जब पसीना धीरे सूखने लगे

शरीर अपनी गर्मी मुख्य रूप से पसीने के वाष्पीकरण से बाहर फेंकता है। हवा पहले से नमी से भरी हो तो पसीना बहुत धीरे सूखता है और शरीर अपनी गर्मी ठीक से बाहर नहीं निकाल पाता। इसी कारण तटीय मुंबई का 32°C वाला दिन सूखे जैसलमेर के 38°C से कहीं ज़्यादा भारी लगता है।

इस असर को तीन माप पकड़ते हैं:

मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, कराची, चटगाँव और कॉक्स बाज़ार जैसे तटीय शहरों में ऊँचे तापमान और ऊँची नमी का मेल अब कभी-कभी वेट-बल्ब रीडिंग को जानलेवा सीमाओं के क़रीब पहुँचा देता है।

सेहत का हिसाब इसके बाद सीधा चलता है। नमी भरी गर्मी में लंबा समय बिताने से लू और गर्मी की थकावट होती है, जो बाहर काम करने वालों के लिए ख़ास ख़तरा है। उमस में पसीना ज़्यादा बहता है, इसलिए पानी की कमी भी तेज़ी से होती है — सुनने में उल्टा लगता है, पर नम मौसम में गंभीर निर्जलीकरण आम बात है। दमा और सीओपीडी के मरीज़ों की तकलीफ़ बढ़ जाती है, क्योंकि नम हवा में एलर्जी पैदा करने वाले और जलन देने वाले कण ज़्यादा रहते हैं। मानसून के दौरान बच्चों में घमौरियाँ निकलना भी आम है।

नम घर, फफूँद और रोज़मर्रा के इंतज़ाम

घर के भीतर की नमी अपनी अलग समस्या है। 60% से ऊपर आर्द्रता में फफूँद पनपने लगती है — दीवारों पर, अलमारी में रखे कपड़ों पर और इलेक्ट्रॉनिक सामान पर — और उससे साँस की बीमारियाँ बढ़ती हैं।

उल्टी तरफ़ का ख़तरा भी असली है। 30% से नीचे की आर्द्रता में आँखें सूखती हैं, त्वचा फटती है, नाक से ख़ून आ सकता है और साँस के संक्रमण का ख़तरा बढ़ जाता है।

शरीर के लिए: पानी पीते रहना सबसे पहला क़दम है — साथ में ओआरएस, नींबू पानी, नारियल पानी या छाछ। सूती और हल्के कपड़े पहनें जिनमें हवा आर-पार जा सके। बाहर का काम सुबह जल्दी या शाम के लिए रखें। बहुत उमस वाले दिनों में शराब और ज़रूरत से ज़्यादा कैफ़ीन से दूर रहें।

घर के लिए: तटीय शहरों के फ़्लैटों में डीह्यूमिडिफ़ायर सबसे ज़्यादा काम आता है। एसी को “ड्राई मोड” पर चलाएँ — यह कड़ाके की ठंडक किए बिना हवा की नमी घटाता है। रसोई और स्नानघर में हवा निकलने का रास्ता बेहतर करें। अलमारी में सिलिका जेल की पुड़ियाँ रख दें ताकि कपड़े और इलेक्ट्रॉनिक सामान फफूँद से बचे रहें।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

50% आर्द्रता ज़्यादा मानी जाए या कम? दक्षिण एशिया के ज़्यादातर शहरों के लिए 50% मध्यम और आरामदेह है। 30% से नीचे हवा सूखी लगने लगती है, 70% से ऊपर चिपचिपी। घर के भीतर 40–50% को आमतौर पर सबसे सेहतमंद दायरा माना जाता है।

क्या आर्द्रता 100% तक पहुँच सकती है? हाँ, थोड़ी देर के लिए — आमतौर पर तेज़ बारिश या घने कोहरे के दौरान। 100% पर हवा पूरी तरह संतृप्त होती है और उसके बाद आने वाली हर अतिरिक्त नमी तुरंत संघनित होकर कुहासा, ओस या बारिश बन जाती है।

दिल्ली और मुंबई की एक जैसी गर्मी अलग क्यों लगती है? सारा फ़र्क़ नमी का है। दिल्ली की गर्मी में 42°C और 25% आर्द्रता छाँव में झेली जा सकती है। मुंबई का 32°C और 85% आर्द्रता वाला दिन कहीं ज़्यादा भारी लगता है, क्योंकि वहाँ पसीना बहुत धीरे सूखता है।

ओस बिंदु आर्द्रता से किस तरह अलग है? ओस बिंदु वह तापमान है जिस तक ठंडा होने पर हवा संतृप्त, यानी 100% सापेक्ष आर्द्रता पर, पहुँच जाती है। 25°C से ऊपर का ओस बिंदु असहज लगता है, चाहे प्रतिशत वाली संख्या कुछ भी दिख रही हो।

अपने शहर की आर्द्रता कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन के हर शहर पृष्ठ पर तापमान और हवा के साथ-साथ मौजूदा आर्द्रता भी दिखती है — मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और जयपुर।

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