वाष्पीकरण से हवा जितनी ठंडी हो सकती है, उसकी निचली सीमा। 35°C का गीला बल्ब तापमान स्वस्थ वयस्क के लिए भी घातक है, और दक्षिण एशिया के तट उसकी ओर बढ़ रहे हैं।
मापनगीला बल्ब तापमान क्या है?
थर्मामीटर के बल्ब पर गीला कपड़ा लपेटिए और सामने पंखा चला दीजिए। कपड़े का पानी भाप बनते-बनते थर्मामीटर से गर्मी खींच ले जाएगा, पारा गिरेगा, और फिर एक जगह ठहर जाएगा। वही ठहरा हुआ पाठ गीला बल्ब तापमान है — वाष्पीकरण के सहारे हवा को जितना ठंडा किया जा सकता है, उसकी निचली सीमा।
त्वचा पर पसीना ठीक वही गीला कपड़ा है। इसीलिए यह संख्या बताती है कि शरीर पसीने के भरोसे खुद को अधिकतम कितना ठंडा रख सकता है। त्वचा का तापमान लगभग 35°C रहता है, तो हवा का गीला बल्ब जहाँ इस आँकड़े तक पहुँच जाए वहाँ पसीना निकलता तो रहेगा पर ठंडक देना बंद कर देगा। भीतर बनती गर्मी के पास बाहर जाने का रास्ता नहीं बचता, और कुछ घंटों में स्वस्थ वयस्क भी लू लगने और मौत के दायरे में आ जाता है।
दक्षिण एशिया के लिए यह किताबी सवाल नहीं रहा। क्षेत्र की कई जगहें 33°C के आसपास का गीला बल्ब दर्ज कर चुकी हैं, यानी जीवित रहने की सीमा से महज़ 2°C नीचे। जलवायु मॉडल अनुमान लगाते हैं कि ऊँचे उत्सर्जन की स्थिति में 21वीं सदी के आख़िर तक दक्षिण एशिया के ज़्यादातर हिस्सों में गीले बल्ब के चरम आँकड़े 35°C के क़रीब पहुँच जाएँगे, और कुछ जगहों पर इसके पार भी चले जाएँगे।
गीले कपड़े से समीकरण तक: यह संख्या आती कहाँ से है
पुराने मौसम केंद्रों में यह सचमुच गीले कपड़े में लिपटे थर्मामीटर से नापी जाती थी। आज के स्वचालित केंद्र इसे सीधे नहीं नापते — वे सूखे बल्ब का तापमान, आर्द्रता और हवा का दबाव लेकर स्टल या डेविस-जोन्स समीकरण से इसकी गणना कर लेते हैं।
इससे मिलता-जुलता दूसरा नाम है गीला बल्ब ग्लोब तापमान, यानी WBGT। यह अकेली माप नहीं, तीन चीज़ों का जोड़ है: गीला बल्ब यानी नमी, ग्लोब यानी धूप और विकिरण, और सूखा बल्ब यानी हवा का तापमान। खेल चिकित्सा और सेना में बाहर के काम की सुरक्षा-सीमाएँ इसी संख्या पर तय होती हैं।
चुनाव काम से तय होता है। जलवायु विज्ञान और इंसानी सहनशक्ति के शोध में सादा गीला बल्ब तापमान चलता है, क्योंकि उसकी सीमा भौतिकी से निकलती है; कारख़ाने, सेना और खेल के मैदान पर, जहाँ सीधी धूप भी गिननी होती है, WBGT मानक है।
37°C का शरीर, 35°C की त्वचा और गर्मी का बंद दरवाज़ा
भीतरी तापमान सामान्य हालत में 37°C होता है, त्वचा उससे कुछ डिग्री नीचे क़रीब 35°C पर। आराम में भी शरीर लगातार लगभग 100 वाट गर्मी बनाता है, और मेहनत के दौरान 500 से 1000 वाट तक। इसे बाहर फेंकने के तीन ही रास्ते हैं।
विकिरण तभी काम का है जब आसपास की चीज़ें त्वचा से ठंडी हों। संवहन, यानी बहती हवा का गर्मी उठा ले जाना, उस घड़ी बेकार हो जाता है जब हवा खुद शरीर जितनी गर्म हो। बचता है वाष्पीकरण — पसीने का हर ग्राम भाप बनते समय क़रीब 580 कैलोरी सोख लेता है, और भीषण गर्मी में यही शरीर का असली पंखा है।
35°C के गीले बल्ब पर यह तीसरा रास्ता भी बंद हो जाता है। हवा की वाष्पीकरण क्षमता चुक चुकी होती है: पसीना निकलता रहता है, मगर गर्मी साथ नहीं ले जाता। त्वचा का तापमान चढ़ता है, कुछ घंटों में भीतरी तापमान उसके पीछे जाता है, फिर लू, अंगों का जवाब दे देना और मौत का क्रम चलता है। ध्यान रहे, यह सवाल बुज़ुर्गों या बीमारों भर का नहीं — यह छाँव में आराम से बैठे स्वस्थ वयस्क के लिए भी जीवित रहने की सैद्धांतिक सीमा है, और युवा, स्वस्थ वयस्कों पर हुए प्रयोगशाला परीक्षणों में व्यावहारिक सीमा इससे नीचे निकली। धूप में ईंट ढोते आदमी के लिए इससे नीचे का गीला बल्ब भी जानलेवा हो जाता है।
गीला बल्ब तापमान भारत और दक्षिण एशिया में
पाकिस्तान के सिंध की भीतरी पट्टी पर बसे जैकोबाबाद में थोड़ी देर के लिए 35°C से ऊपर का गीला बल्ब दर्ज हुआ है। वहाँ की कई-कई दिन खिंचने वाली लू में हवा का तापमान 50°C के ऊपर तक जाता है। सुक्कुर, लरकाना और सिबी के साथ मिलकर यह शहर पाकिस्तान का वह गर्म त्रिकोण बनाता है जहाँ दक्षिण एशिया के गीले बल्ब के कुछ सबसे ऊँचे आँकड़े दर्ज होते हैं, और ये ज़्यादातर मानसून की शुरुआत के आसपास आते हैं।
फ़ारस की खाड़ी के तट पर भी थोड़ी देर के लिए 35°C से ऊपर का गीला बल्ब दर्ज हुआ है। संयुक्त अरब अमीरात के रास अल ख़ैमा में ऐसी ही 35°C वाली घटनाएँ दर्ज हुई हैं, और खाड़ी के तटीय शहर दुनिया भर में चरम गीले बल्ब के सबसे बड़े केंद्रों में गिने जाते हैं।
भारत के तट पर आँकड़े फ़िलहाल कुछ नीचे हैं, दिशा वही है। विशाखापत्तनम, चेन्नई और मुंबई में मई-जून के दौरान ऊँचे गीले बल्ब की घटनाएँ दर्ज होती हैं, और तटीय तमिलनाडु तथा आंध्र प्रदेश में मानसून से पहले की गर्मी समुद्र की नमी से मिलकर इस पट्टी को 31°C से ऊपर के गीले बल्ब के ठिकानों में से एक बना देती है। बांग्लादेश के सुंदरबन और दक्षिणी तटीय ज़िलों में भी लू और भारी नमी के दिनों में गीला बल्ब ऊँचा दर्ज होता है।
रोज़ के लिए हीट इंडेक्स, नीति के लिए गीला बल्ब
रोज़मर्रा की चेतावनी में हीट इंडेक्स या अनुभव तापमान ज़्यादा काम का है, क्योंकि वह हवा के तापमान जैसे ही पैमाने पर संख्या देता है: 45°C का हीट इंडेक्स यानी “45°C जैसा लग रहा है”। विज्ञान और नीति की भाषा अलग है — वहाँ गीला बल्ब मानक है, क्योंकि वह भौतिक राशि है, असहजता पर बिठाया गया अनुमान नहीं, और उसकी 35°C वाली रेखा सख़्ती से परिभाषित है।
दोनों का मेल मोटे तौर पर इस तरह बैठता है: 41°C का हीट इंडेक्स लगभग 29°C के गीले बल्ब के बराबर, जो “ख़तरा” श्रेणी में आता है; 54°C का हीट इंडेक्स 31 से 32°C पर, जिसे “अति ख़तरा” कहते हैं; और 35°C का गीला बल्ब हीट इंडेक्स की तालिका से ही बाहर पड़ता है — यही जीवित रहने की सीमा है।
दिहाड़ी, खेत और ठेले पर इसकी कीमत
निर्माण मज़दूर, खेतिहर मज़दूर और ठेला लगाने वाले — दक्षिण एशिया में करोड़ों परिवारों की रोज़ी खुले आसमान के नीचे की मेहनत से चलती है, और गीला बल्ब तापमान ठीक इसी मेहनत पर सीमा लगाता है।
जहाँ यह 30°C से ऊपर जाए, वहाँ स्वस्थ आदमी को भी सावधानी चाहिए। सुबह 11 से शाम 4 बजे के बीच खुले में काम टालिए। सिर्फ़ छाया नहीं, ठंडी जगह खोजिए — ऊँचे गीले बल्ब पर अकेला पंखा काम नहीं करता, क्योंकि वह उसी हवा को चलाता है जिसमें नमी सोखने की गुंजाइश बहुत कम बची है। पानी लगातार पीते रहिए, क्योंकि ठंडक मिले या न मिले, पसीना बहता रहता है। गर्म पेय और शराब हालत बिगाड़ते हैं। और साथी को उलझन हो, चक्कर आएँ या पसीना अचानक बंद हो जाए, तो उसी वक़्त उसे ठंडी जगह ले जाइए।
शहर के स्तर पर उपाय इससे बड़े हैं: छतों को परावर्तक रंग, छाँव के ढाँचे, गर्मी की घटनाओं में बाहरी मज़दूरों के लिए अनिवार्य विश्राम, बिना एसी वाले घरों के लिए ठंडे केंद्र, काम के घंटे भोर और शाम की ओर खिसकाना, और लंबी दौड़ में पेड़ लगाकर शहरी ताप द्वीप घटाना।
सदी के आख़िर की ओर: तीन उत्सर्जन रास्ते
ऊँचे उत्सर्जन वाले RCP 8.5 रास्ते पर 2070 से 2090 के बीच फ़ारस की खाड़ी का तट साल में कई बार 35°C का गीला बल्ब देख सकता है। सिंधु-गंगा के मैदान में लखनऊ, पटना और ढाका जैसे शहर नियमित रूप से 32 से 34°C पर पहुँचेंगे, और तटीय दक्षिण एशिया में 33 से 34°C की घटनाएँ कई दिन तक खिंच सकती हैं।
मध्यम उत्सर्जन वाले RCP 4.5 पर 21वीं सदी के आख़िर तक चरम आँकड़े इससे नीचे रहते हैं — राहत की बात, पर खुले में काम करने वालों के लिए तब भी ख़तरनाक। पेरिस समझौते से मेल खाते RCP 2.6 पर भी चरम सीमाएँ बढ़ती ही हैं।
फ़र्क़ सिर्फ़ आँकड़ों का नहीं है। उत्सर्जन में तेज़ कटौती के बिना आशंका है कि इस क्षेत्र के बड़े हिस्से गर्मी के महीनों में व्यावहारिक रूप से रहने लायक़ न बचें, और सबसे पहले उनके लिए जिनका काम घर के भीतर हो ही नहीं सकता।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
35°C की सीमा का असली मतलब क्या है? यह वह अधिकतम गीला बल्ब तापमान है जिस पर छाँव में, पर्याप्त पानी के साथ, एक स्वस्थ वयस्क सैद्धांतिक रूप से ज़िंदा रह सकता है। इससे ऊपर शरीर अपनी ही गर्मी बाहर नहीं फेंक पाता, और कसरती बदन हो या भरपूर पानी, कुछ घंटों में लू और मौत तक का रास्ता वही रहता है।
क्या यह सीमा कहीं सचमुच छुई जा चुकी है? थोड़ी देर के लिए, हाँ। पाकिस्तान के जैकोबाबाद और फ़ारस की खाड़ी के कुछ हिस्सों में 35°C से ऊपर का गीला बल्ब दर्ज हो चुका है। ज़्यादातर आबादी वाले इलाकों ने लगातार टिकने वाला 35°C अभी नहीं देखा, मगर जलवायु अनुमान कहते हैं कि यह बदलेगा।
हीट इंडेक्स और गीले बल्ब में बुनियादी फ़र्क़ क्या है? गीला बल्ब भौतिक माप है, हीट इंडेक्स इंसानी असहजता के आँकड़ों पर बिठाया गया फ़ॉर्मूला। इसीलिए गीले बल्ब की एक साफ़ सीमा है, 35°C, जबकि हीट इंडेक्स में एक रेखा नहीं, कई श्रेणियाँ होती हैं।
नम गर्मी सूखी गर्मी से ज़्यादा जानलेवा क्यों होती है? पसीना तभी ठंडक देता है जब वह भाप बने। नम हवा में नमी सोखने की जगह लगभग नहीं बचती, इसलिए पसीना धीरे-धीरे भाप बनता है और ठंडक बहुत कम देता है। सूखी 50°C हवा पानी की कमी से ख़तरनाक होती है, पर उसमें पसीना अपना काम करता रहता है; नम हवा 35°C पर ही ज़्यादा घातक साबित हो सकती है।
अपने शहर के लिए यह संख्या कहाँ देखें? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर अनुभव तापमान दिखाता है, जो इसी परिवार की संख्या है; गीले बल्ब के लिए ERA5 जैसे वैज्ञानिक आँकड़ा-संग्रह चाहिए होते हैं। शुरुआत इन पन्नों से कीजिए: चेन्नई, मुंबई, कोलकाता, भुवनेश्वर, पटना और लखनऊ।