जानलेवा आपात स्थिति जिसमें शरीर का भीतरी तापमान 40°C के पार चला जाता है और पसीना उसे ठंडा करना बंद कर देता है। बिना इलाज के यह कुछ ही घंटों में मार देती है।
घटनाएँलू लगना क्या है?
मई की दोपहर में सड़क किनारे खड़े ठेलेवाले को अचानक चक्कर आना और फिर गिर पड़ना — डॉक्टर इसी हालत को लू लगना कहते हैं। शरीर का भीतरी तापमान 40°C (104°F) के पार चला जाता है और ठंडा होने का उसका मुख्य तरीक़ा, यानी पसीना, काम करना बंद कर देता है। दिमाग़, दिल, गुर्दे, जिगर और मांसपेशियाँ मिनटों के भीतर टूटने लगती हैं। बिना इलाज के लू लगना जानलेवा हो सकता है, और अस्पताल पहुँच जाने पर भी लगभग 10 प्रतिशत मरीज़ों की मौत हो जाती है।
गर्मी से होने वाली बीमारियों की एक पूरी सीढ़ी है। सबसे नीचे गर्मी की ऐंठन, उसके ऊपर गर्मी की थकान — ये दोनों चेतावनी भर हैं। लू लगना उस सीढ़ी का आख़िरी पायदान है, जहाँ शरीर लड़ाई हार चुका होता है।
दक्षिण एशिया के लिए यह महज़ एक चिकित्सा शब्द नहीं है। यहाँ लू हर साल लोगों की जानें लेती है। लू से हुई मौतों की सरकारी गिनती कम है, मगर असली संख्या इससे काफ़ी ऊपर मानी जाती है: गाँवों में हुई मौतें अक्सर दर्ज ही नहीं होतीं, और लू के दिनों में दिल की बीमारी से गई जानों को गर्मी के खाते में नहीं डाला जाता।
पसीना रुकने के बाद शरीर के भीतर क्या टूटता है
लू कभी एक घंटे के भीतर पकड़ लेती है और कभी पूरे दिन धीरे-धीरे बनती रहती है। शुरुआती चरण, यानी गर्मी की थकान में, पसीना ख़ूब आता है, त्वचा ठंडी और चिपचिपी लगती है, सिर में दर्द रहता है, चक्कर और मितली आती है, मांसपेशियों में ऐंठन उठती है, नाड़ी तेज़ चलती है और प्यास बेक़ाबू हो जाती है।
असली ख़तरे की घंटी तब बजती है जब पसीना बंद हो जाए। लू लगने पर त्वचा गर्म और सूखी पड़ जाती है, अक्सर लाल दिखती है; सिरदर्द तीखा होता है; मरीज़ उलझी हुई बातें करता है या लड़खड़ाकर बोलता है; साँस और नाड़ी दोनों दौड़ने लगती हैं; और आख़िर में बेहोशी या दौरे पड़ सकते हैं। गंभीरता के लिहाज़ से यह हालत दिल के दौरे से कम नहीं — यहाँ हर मिनट मायने रखता है।
किस तापमान पर यह ख़तरा शुरू होता है, इसका जवाब अकेले थर्मामीटर नहीं देता। नमी भरी हवा में 37°C पार करते ही जोखिम तेज़ी से चढ़ता है, जबकि सूखी हवा में वही मोड़ 42°C के आसपास आता है। सबसे भरोसेमंद पैमाना गीला बल्ब तापमान है। 31°C गीले बल्ब के ऊपर खुले में लंबी मेहनत करने वाला स्वस्थ वयस्क भी लू की चपेट में आ सकता है, और 35°C गीला बल्ब वह सीमा है जिसके आगे तंदुरुस्ती चाहे जितनी हो, कुछ घंटों में मौत हो सकती है।
लू लगना भारत और दक्षिण एशिया में
2024 की मानसून-पूर्व लू ने पूरे उपमहाद्वीप में रिकॉर्ड तोड़े। मई 2024 में दिल्ली ने 49.9°C दर्ज किया और उसी महीने पाकिस्तान के मोहनजोदड़ो में पारा 52.5°C तक पहुँच गया। उत्तर भारत और पाकिस्तानी पंजाब के अस्पतालों में लू के मरीज़ों की भीड़ लग गई।
2026 के लिए मौसम विभाग (IMD) के 31 मार्च के पूर्वानुमान में भारत के कई हिस्सों में अप्रैल–जून का अधिकतम तापमान सामान्य या सामान्य से नीचे रहने की उम्मीद जताई गई थी। अपवाद पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत का ज़्यादातर हिस्सा था, जहाँ अधिकतम तापमान सामान्य से ऊपर रहने के आसार थे। जिन शहरों में आम तौर पर लू लगने का जोखिम सबसे ऊँचा रहता है उनमें दिल्ली, लखनऊ, पटना, जयपुर, अहमदाबाद और हैदराबाद हैं, तथा सीमा पार लाहौर, मुल्तान, जैकोबाबाद और कराची।
किन लोगों पर यह सबसे पहले गिरती है
खुले में काम करने वाले सबसे आगे की कतार में खड़े हैं — निर्माण मज़दूर, किसान, रेहड़ी-पटरी वाले, रिक्शा चालक और ट्रैफ़िक पुलिसकर्मी। दक्षिण एशिया में लू से होने वाली ज़्यादातर मौतें इसी समूह में होती हैं।
बच्चे और बुज़ुर्ग दूसरी कतार में हैं। छोटे बच्चों का शरीर तापमान संभालना अभी सीख ही रहा होता है, और बुज़ुर्गों में प्यास का एहसास कमज़ोर पड़ जाता है, ऊपर से पहले से चली आ रही बीमारियाँ बोझ बढ़ाती हैं।
पुरानी बीमारियों वाले लोग — दिल की बीमारी, मधुमेह, गुर्दे की बीमारी, सीओपीडी और मोटापा — ज़्यादा जोखिम में रहते हैं। कुछ दवाएँ भी ख़तरा बढ़ा देती हैं: पेशाब बढ़ाने वाली, बीटा-ब्लॉकर, एलर्जी और अवसाद की दवाएँ।
जिनके घर में एसी नहीं है। लू की मौतें बिना ठंडक वाले घरों में सिमटी हुई मिलती हैं। भारत में एसी सिर्फ़ लगभग 10 प्रतिशत घरों तक पहुँचा है, पाकिस्तान में भी तस्वीर यही है — बाक़ी आबादी पंखे, कूलर और छाया के भरोसे गर्मी काटती है।
खिलाड़ी और सैनिक प्रशिक्षु भी इसी सूची में हैं। शरीर को गर्मी का अभ्यस्त बनाए बिना भारी मेहनत कराने से एक साथ कई लोगों के गिर पड़ने की घटनाएँ हो चुकी हैं।
एम्बुलेंस आने तक के तीस मिनट
मदद पहुँचने से पहले तेज़ी से ठंडा करना ही जान बचाता है। भीतरी तापमान 40°C के ऊपर जितने मिनट बना रहता है, अंगों का नुक़सान उतना ही जुड़ता जाता है। लक्ष्य साफ़ है: तीस मिनट के भीतर शरीर को 39°C से नीचे लाना।
- आपात सेवा को फ़ोन करें — भारत में 108, पाकिस्तान में 1122, बांग्लादेश में 999।
- मरीज़ को छाया या ठंडे कमरे में ले जाएँ।
- ज़रूरत से ज़्यादा कपड़े उतार दें।
- जो साधन हाथ में हो, उसी से ज़ोर-शोर से ठंडा करें:
- बर्फ़ के पानी में डुबोना सबसे असरदार है — बाथटब या कोई बड़ा टब काम आएगा।
- भीगी चादर लपेटकर लगातार हवा करें।
- गर्दन, बग़ल और जाँघ के जोड़ पर बर्फ़ की थैलियाँ रखें, जहाँ बड़ी रक्तवाहिकाएँ त्वचा के पास होती हैं।
- ठंडे पानी का छिड़काव करें और साथ-साथ पंखा चलाएँ।
- होश में हो तो घूँट-घूँट ठंडा पानी दें। शराब या कैफ़ीन वाली चीज़ें नहीं।
- बुख़ार की गोली न दें — पैरासिटामोल और आइबुप्रोफ़ेन लू में असर नहीं करतीं और जिगर का नुक़सान बढ़ा सकती हैं।
- साँस और गले की नली पर नज़र रखें, और ज़रूरत पड़े तो सीपीआर देने के लिए तैयार रहें।
अलर्ट वाले दिन घर से निकलने से पहले
मौसम विभाग का नारंगी या लाल कोड, पाकिस्तान मौसम विभाग का लाल कोड और बांग्लादेश की लू-चेतावनी जारी होते ही कुछ आदतें जान बचाने लगती हैं।
सुबह 11 बजे से शाम 4 बजे के बीच बाहर का काम टाल दें। मेहनत वाले काम में हर आधे घंटे में 250 मिलीलीटर पानी पिएँ; प्यास लगने का इंतज़ार न करें। ढीले, हल्के रंग के सूती कपड़े पहनें, सिर और गर्दन ढककर रखें, और बाहर जाना टल न सके तो छाता तथा भीगा तौलिया साथ रखें। खाना हल्का और पानी वाला हो — खीरा, तरबूज़, नारियल पानी, लस्सी। तला-भुना भारी भोजन इन दिनों दिक़्क़त करता है, और शराब तथा कैफ़ीन शरीर से पानी खींचते हैं।
घर और मोहल्ले के बुज़ुर्गों की रोज़ ख़बर लें। लू की बहुत-सी मौतें अकेले रहने वालों के घरों में होती हैं, जहाँ गिर पड़ने के बाद कोई देखने वाला नहीं होता। बच्चों या पालतू जानवरों को खड़ी गाड़ी में एक पल के लिए भी न छोड़ें — बंद गाड़ी के भीतर का तापमान बीस मिनट में 60°C के पार जा सकता है।
शरीर को गर्मी का अभ्यस्त होने में 7 से 14 दिन लगते हैं। इसीलिए गर्म इलाक़े में नए पहुँचे लोग — सैलानी, प्रवासी मज़दूर, नए भर्ती जवान — पहले हफ़्ते में सबसे ज़्यादा जोखिम में रहते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गर्मी की थकान और लू लगने में फ़र्क़ क्या है? गर्मी की थकान चेतावनी का चरण है — ख़ूब पसीना, कमज़ोरी, मितली, और तापमान सामान्य या थोड़ा ऊपर। लू लगना आपात स्थिति है — तापमान 40°C से ऊपर, पसीना रुक जाना, सोच-समझ में गड़बड़ी, और कभी बेहोशी। थकान का इलाज घर पर संभव है; लू लगने पर अस्पताल के सिवा कोई रास्ता नहीं।
क्या लू घर के अंदर भी लग सकती है? हाँ, और दक्षिण एशियाई शहरों में रात की गर्मी के दौरान ऐसे मामले बढ़ रहे हैं। सूरज डूबने के बाद भी जब घर के भीतर का तापमान 35°C से ऊपर टिका रहे, तो अकेले रहने वाले बुज़ुर्ग और बिना एसी वाले परिवार अपने ही कमरों में लू का शिकार हो जाते हैं।
लू कितनी जल्दी जान ले लेती है? बिना इलाज के गंभीर मामला दो से तीन घंटे में मौत तक पहुँच सकता है। इलाज मिल जाने पर भी ठंडा करने में देर हुई तो अंगों का नुक़सान स्थायी रह जाता है। शरीर जितनी तेज़ी से ठंडा होगा, नतीजा उतना ही बेहतर रहेगा।
क्या लू लगने पर बुख़ार की गोली देनी चाहिए? नहीं। पैरासिटामोल और आइबुप्रोफ़ेन लू में काम नहीं करतीं और जिगर को पहुँचे नुक़सान को और बढ़ा सकती हैं। इलाज एक ही है — शरीर को जल्द से जल्द ठंडा करना और अस्पताल पहुँचाना।
अपने शहर की गर्मी की चेतावनी कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर मौजूदा तापमान, अनुभव तापमान, नमी और गर्मी की सलाह का कोड दिखाता है। देखिए दिल्ली, लखनऊ, पटना, जयपुर, अहमदाबाद और हैदराबाद।