पृथ्वी को घेरे गैसों का वह आवरण जिसे गुरुत्व बाँधे रखता है और जो सतह से लगभग 100 km ऊपर तक फैला है। सारा मौसम इसकी सबसे निचली परत में बनता है, और साँस की ऑक्सीजन, ओजोन की ढाल तथा पूरी जलवायु व्यवस्था इसी के भीतर है।
मूल बातेंवायुमंडल क्या है?
वायुमंडल गैसों का वह लिफ़ाफ़ा है जिसे पृथ्वी का गुरुत्व अपने साथ बाँधे रखता है। अंतरराष्ट्रीय परिभाषा में इसकी सीमा सतह से लगभग 100 किलोमीटर ऊपर खींची गई कारमान रेखा पर मानी जाती है, पर असल में गैसें वहाँ अचानक ख़त्म नहीं होतीं — वे पतली पड़ती-पड़ती क़रीब 10,000 किलोमीटर तक अंतरिक्ष में घुलती चली जाती हैं। इतने विशाल आवरण का कुल भार 5.15 × 10^18 किलोग्राम बैठता है, यानी पूरी पृथ्वी के द्रव्यमान का महज़ दस लाखवाँ हिस्सा।
जीवन के लिए यह आवरण कई काम एक साथ करता है:
- साँस के लिए ऑक्सीजन देता है, जो सूखी हवा का 21 प्रतिशत है
- समतापमंडल की ओजोन परत से हानिकारक पराबैंगनी किरणें छानता है
- ग्रीनहाउस प्रभाव के ज़रिए तापमान को रहने लायक़ बनाए रखता है
- हवा और मौसम के ज़रिए गर्मी तथा नमी को इधर-उधर बाँटता है
- जल चक्र — वाष्पन, बादल, वर्षा — इसी के भीतर चलता है
- उल्काओं को मध्यमंडल में ही जला डालता है
मौसम के लिहाज़ से सबसे काम की बात यह है कि पृथ्वी का सारा मौसम सबसे निचली परत में बनता है, यानी क्षोभमंडल में। ऊपर की परतें अपनी-अपनी भूमिका निभाती हैं, पर बादल, बारिश और आँधी सीधे वहाँ से नहीं आतीं।
पाँच मंज़िलों की इमारत: क्षोभमंडल से बाह्यमंडल तक
क्षोभमंडल (भूमध्य रेखा पर 0 से 18–20 किमी, ध्रुवों पर लगभग 6 किमी) — यहीं सारा मौसम बनता है। ऊँचाई बढ़ने के साथ तापमान गिरता है, औसतन 6.5°C प्रति किलोमीटर। इसकी छत को क्षोभसीमा कहते हैं, और वायुमंडल का 75 प्रतिशत द्रव्यमान इसी एक परत में समाया हुआ है।
समतापमंडल (क्षोभसीमा से 50 किमी तक) — यहाँ नियम उलट जाता है: ऊपर जाते-जाते तापमान बढ़ता है, क्योंकि ओजोन पराबैंगनी किरणें सोखती है। ओजोन परत सबसे घनी 15 से 30 किमी के बीच मिलती है। यह परत स्थिर और लगभग बादल-रहित रहती है, इसीलिए यात्री विमान इसके निचले हिस्से में उड़ते हैं। ज्वालामुखी विस्फोट अगर राख यहाँ तक पहुँचा दे तो उसका असर जलवायु पर कई साल बना रहता है।
मध्यमंडल (50 से 85 किमी) — तापमान फिर गिरने लगता है और -80 से -100°C तक उतरकर इसे वायुमंडल की सबसे ठंडी परत बना देता है। रात में दिखने वाले “टूटते तारे” असल में यहीं जलती उल्काएँ हैं।
तापमंडल (85 से 600 किमी) — यहाँ तापमान 500 से 2000°C तक गिना जाता है, पर हवा इतनी विरल है कि वह गर्मी आपको महसूस ही नहीं होगी। ध्रुवीय ज्योति इसी परत में जगमगाती है, और अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन 400 किमी की ऊँचाई पर इसी के भीतर चक्कर काटता है।
बाह्यमंडल (600 किमी से ऊपर) — वायुमंडल यहाँ अंतरिक्ष में घुल जाता है। हाइड्रोजन और हीलियम के परमाणु धीरे-धीरे छिटककर बाहर निकल जाते हैं। 36,000 किमी पर बैठे भू-स्थिर उपग्रह तकनीकी रूप से इसी परत के भीतर हैं।
78, 21 और वह 0.04 प्रतिशत
सूखी हवा में आयतन के हिसाब से नाइट्रोजन 78.09 प्रतिशत है, जो रासायनिक रूप से निष्क्रिय रहती है और मौसम पर सीधे असर नहीं डालती। ऑक्सीजन 20.95 प्रतिशत है, जिस पर साँस और जलना दोनों टिके हैं। आर्गन 0.93 प्रतिशत एक निष्क्रिय उत्कृष्ट गैस है। बाक़ी बचता है 0.04 प्रतिशत कार्बन डाइऑक्साइड, जो लगातार बढ़ रहा है, और उसके साथ नियॉन, हीलियम, मीथेन, क्रिप्टॉन, हाइड्रोजन, ओजोन तथा नाइट्रस ऑक्साइड जैसी नाममात्र मात्रा वाली गैसें।
“सूखी हवा” की इस सूची से बाहर वे चीज़ें हैं जो जगह और दिन के साथ बदलती रहती हैं। जलवाष्प आयतन का 0 से 4 प्रतिशत तक हो सकती है। धूल, पराग और एरोसॉल की मात्रा बेहद अस्थिर रहती है। प्रदूषण के कण — PM2.5, NOx, SO₂ — इलाक़े और मौसम के साथ घटते-बढ़ते हैं, ज्वालामुखी का उत्सर्जन कभी-कभार आता है, और जंगल की आग का धुआँ मौसमी होता है।
गिनती में सबसे छोटी गैसें ही सबसे बड़ा काम करती हैं। पृथ्वी का तापमान जिस ग्रीनहाउस प्रभाव की बदौलत -18°C के बजाय रहने लायक़ 14°C बना रहता है, उसका लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा मात्र 0.04 प्रतिशत CO₂ जुटाता है, जबकि बाक़ी का ज़्यादातर हिस्सा जलवाष्प और बादलों से आता है। उसी तर्क का दूसरा सिरा चेतावनी है: CO₂ दोगुना हो जाए तो मोटे तौर पर 3°C की अतिरिक्त गर्मी आएगी।
वायुमंडल भारत और दक्षिण एशिया में
भूमध्य रेखा के पास होने के कारण इस क्षेत्र में क्षोभसीमा 16 से 17 किलोमीटर ऊँची बैठती है — ध्रुवीय इलाक़ों से दोगुनी से भी ज़्यादा। ज़मीन से लगी सीमा परत की गहराई 1 से 3 किलोमीटर के बीच ऋतुओं के साथ घटती-बढ़ती है, और सतह पर मानसून द्रोणी कहाँ पड़ी है, यही तय करता है कि बारिश किस राज्य पर गिरेगी।
हवा का रुख़ साल में तीन ढंग से चलता है। जून से सितंबर के गर्मियों के मानसून में हिंद महासागर से दक्षिण-पश्चिमी बहाव आता है। दिसंबर से फ़रवरी के शीतकालीन मानसून में बहाव पलटकर महाद्वीप की ओर से उत्तर-पूर्वी हो जाता है। मार्च से मई और अक्टूबर से नवंबर के बीच के संक्रमण काल में हवा का मिज़ाज अस्थिर और बदलता हुआ रहता है।
क्षेत्र की सबसे चुभने वाली विशेषता इसका एरोसॉल भार है। सिंधु-गंगा के मैदान में यह दुनिया के सबसे ऊँचे स्तरों में गिना जाता है, और सर्दियों में PM2.5 का शिखर WHO की सीमा से 10 से 30 गुना ऊपर पहुँच जाता है। दृश्यता दिनों तक गिरी रहती है। यह धुंध सिर्फ़ देखने में बाधा नहीं है — वह विकिरण संतुलन बदलती है और मानसून के समय पर भी असर डालती है।
मौसम गढ़ने वाली चार बड़ी बनावटें भी इसी क्षेत्र की हैं। गर्मियों में तिब्बत के पठार का तपना मानसून को खींच लाता है। बंगाल की खाड़ी की नमी मानसूनी अवदाबों और चक्रवातों को ईंधन देती है। हिमालय की दीवार उपमहाद्वीप को उत्तर की ठंडी हवाओं से बचाती है, जिससे गर्मियों में भारत के ऊपर गर्म और नम हवा जमा होती चली जाती है। और पश्चिमी विक्षोभ सर्दियों की बारिश तथा बर्फ़ पहुँचाते हैं।
ऊपर चढ़ते ही हवा पतली क्यों पड़ जाती है
दबाव ऊँचाई के साथ लगभग चरघातांकी ढंग से गिरता है:
| ऊँचाई | दबाव | समुद्र तल का प्रतिशत |
|---|---|---|
| 0 किमी (समुद्र तल) | 1013.25 hPa | 100% |
| 2 किमी | 795 hPa | 78% |
| 5 किमी | 540 hPa | 53% |
| 8 किमी (एवरेस्ट का “मृत्यु क्षेत्र”) | 356 hPa | 35% |
| 8.85 किमी (एवरेस्ट शिखर) | 314 hPa | 31% |
| 12 किमी | 194 hPa | 19% |
| 20 किमी (निचला समतापमंडल) | 55 hPa | 5% |
| 50 किमी (ऊपरी समतापमंडल) | 0.8 hPa | 0.08% |
इसी गिरावट के कुछ बिलकुल रोज़मर्रा नतीजे हैं। ऊँचाई पर पानी कम तापमान पर ही उबल जाता है, इसलिए पहाड़ी रसोई में दाल-चावल पकने में ज़्यादा वक़्त लगता है। 5,500 मीटर से ऊपर चढ़ने वाले पर्वतारोहियों को अपना शरीर ऊँचाई के अनुकूल ढालना पड़ता है, या फिर सिलिंडर की ऑक्सीजन का सहारा लेना पड़ता है। विमानों के केबिन में दबाव 2,400 मीटर की ऊँचाई के बराबर रखा जाता है, ताकि यात्री सहज रह सकें। और मौसम विभाग के गुब्बारे 30 किलोमीटर से भी ऊपर जाकर आँकड़े भेजते हैं।
बदलती बनावट, और उसका हिसाब किस पर
इंसानी गतिविधि वायुमंडल की रासायनिक बनावट बदल रही है, और आँकड़े सीधे-सपाट हैं। CO₂ 1850 के 280 ppm से बढ़कर 2025 में 427.35 ppm पर पहुँच गया — 30 लाख साल से भी लंबे अरसे का सबसे ऊँचा स्तर। मीथेन 700 ppb से 1920 ppb तक पहुँच चुकी है, जिसका बड़ा हिस्सा खेती और जीवाश्म ईंधन से आता है। नाइट्रस ऑक्साइड 270 से 335 ppb हो गई है। प्रतिबंधित हो चुकी CFC गैसें अब घट रही हैं, पर ब्लैक कार्बन बढ़ रहा है और वह सीधे मानसून को छेड़ता है।
इनका नतीजा पहले से दिख रहा है: औद्योगिक युग से पहले की तुलना में 2025 तक इंसानी गतिविधियों से आई 1.37°C की गर्मी; 1880 से अब तक 21 सेंटीमीटर से ज़्यादा समुद्र-स्तर की बढ़त, जिसकी रफ़्तार तेज़ होती जा रही है; लू, भारी बारिश और चक्रवातों की बढ़ती तीव्रता; हिमालय की बर्फ़ का तेज़ी से पीछे हटना; और समुद्री सतह की अम्लीयता में 30 प्रतिशत से ज़्यादा की बढ़ोतरी।
इस सूची का हर बिंदु दक्षिण एशिया में किसी न किसी की रोज़ी से जुड़ा है। हिमालय की पिघलती बर्फ़ उन नदियों का स्रोत है जिन पर उत्तर भारत और पाकिस्तान की सिंचाई टिकी है। समुद्र-स्तर की बढ़त सीधे बंगाल तथा बांग्लादेश के निचले तटों पर आकर बैठती है। और सर्दियों की वह धुंध, जो क्षोभमंडल की सबसे नीचे वाली सीमा परत में क़ैद रह जाती है, एक ही साथ फेफड़ों, खेत पर पड़ने वाली धूप और उड़ानों की समय-सारिणी — तीनों पर असर डालती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
वायुमंडल आख़िर कितना ऊँचा है? अंतरराष्ट्रीय तौर पर अंतरिक्ष की सीमा 100 किलोमीटर की कारमान रेखा मानी जाती है। पर गैसें वहाँ कटकर ख़त्म नहीं होतीं — 400 किलोमीटर पर, जहाँ अंतरिक्ष स्टेशन की कक्षा है, इतना वायुमंडलीय घर्षण अब भी बचा रहता है कि उपग्रहों की रफ़्तार धीमी पड़ने लगे। व्यावहारिक रूप से “मौसम वाला वायुमंडल” क्षोभसीमा के साथ ही ख़त्म हो जाता है, जो ध्रुवों के ऊपर लगभग 6 किलोमीटर और भूमध्य रेखा के ऊपर 18 से 20 किलोमीटर ऊँची है।
ऊँचाई बढ़ने पर तापमान क्यों गिरता है? हवा ऊपर उठते ही फैलती है, क्योंकि वहाँ दबाव कम होता है, और फैलती हुई गैस ठंडी हो जाती है। क्षोभमंडल में इस ठंडक की मानक दर 6.5°C प्रति किलोमीटर है। क्षोभसीमा के ऊपर यह नियम उलट जाता है, क्योंकि समतापमंडल में ओजोन पराबैंगनी विकिरण सोखकर हवा को गर्म कर देती है।
मौसम के मॉडल इतने बड़े वायुमंडल को कैसे संभालते हैं? उन्हें दबाव, तापमान, आर्द्रता, हवा और बादल — सबका भौतिक व्यवहार पूरे क्षोभमंडल पर फैली एक त्रि-आयामी जाली पर हल करना पड़ता है। जाली जितनी बारीक होगी, पूर्वानुमान उतना सटीक बनेगा, पर उतनी ही ज़्यादा कंप्यूटर शक्ति भी लगेगी। ECMWF का IFS मॉडल यह काम 137 ऊर्ध्वाधर स्तरों पर करता है।
क्या वायुमंडल “मोटा” होता जा रहा है? थोड़ा-सा, हाँ। गर्मी बढ़ने से क्षोभमंडल फैल रहा है, और 1970 के दशक से क्षोभसीमा हर दशक लगभग 50 से 80 मीटर ऊपर खिसक चुकी है। उसी दौरान समतापमंडल ठंडा होकर सिकुड़ रहा है।
अपने शहर के वायुमंडल का हाल कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर पृष्ठ पर सतह का तापमान, दबाव, आर्द्रता और हवा दिखाता है। सर्दियों की धुंध और उथली सीमा परत का असर देखना हो तो दिल्ली, लखनऊ और पटना खोलें; तटीय नमी और समुद्री हवा के लिए मुंबई, चेन्नई तथा कोच्चि; और मानसूनी बहाव के लिए कोलकाता तथा गुवाहाटी। ऊपरी वायुमंडल के आँकड़े IMD की रेडियोसॉन्ड रिपोर्टों में मिलते हैं।