क्षोभमंडल के ठीक ऊपर की स्थिर परत, जिसमें ओजोन परत रहती है और जहाँ ऊँचाई के साथ तापमान बढ़ता है। दक्षिण एशिया के ऊपर यह असामान्य ऊँचाई पर, लगभग 16 से 18 किलोमीटर से शुरू होती है।
मूल बातेंक्षोभसीमा के पार: मौसम के ऊपर की दूसरी परत
ज़मीन से सीधे ऊपर चलें तो पहले क्षोभमंडल मिलता है — वह उथली निचली परत जिसमें लगभग सारा मौसम बनता है। उसके ऊपर दूसरी परत, समताप मंडल, शुरू होती है और क़रीब 50 किलोमीटर तक जाती है। दोनों के बीच की रेखा क्षोभसीमा कहलाती है, और इसकी ऊँचाई कहीं तय नहीं: ध्रुवों पर यह सबसे नीची है, उष्णकटिबंध पर सबसे ऊँची। भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर यह लगभग 16 से 18 किलोमीटर पर मिलती है, यानी दक्षिण एशिया के ऊपर धरती की सबसे गहरी मौसमी परतों में से एक टिकी है, और उसके ऊपर समताप मंडल का फ़र्श भी सबसे ऊँचे फ़र्शों में गिना जाता है।
इस परत में बारिश नहीं होती, कहने लायक़ संवहन भी नहीं होता, और बादल दिखें भी तो असाधारण हालात में ही। तो ज़मीन पर रहने वाले को इसकी परवाह क्यों हो? चेन्नई या कराची तक कितनी पराबैंगनी किरणें पहुँचेंगी, यह इसी परत की ओजोन तय करती है। मानसून बरसाने वाले गरज के बादलों पर ढक्कन भी यही लगाती है। और जो एक बार यहाँ पहुँच जाए, उसे यह बरसों थामे रखती है, इसलिए ज्वालामुखी विस्फोट और औद्योगिक रसायन जलवायु पर अपनी सबसे लंबी छाप यहीं छोड़ते हैं।
ऊपर गर्म, नीचे ठंडा: ओजोन का उलटा चूल्हा
क्षोभमंडल में नियम सीधा है: जितना ऊपर, उतनी ठंड। हिमालय इसीलिए ठंडा है, और ऊपर धकेली गई हवा इसीलिए ठंडी होकर संघनित होती है और बरसती है। समताप मंडल में यह नियम पलट जाता है: परत का ऊपरी छोर निचले छोर से कहीं ज़्यादा गर्म रहता है।
इसके पीछे ओजोन है। मोटे तौर पर 15 से 35 किलोमीटर के बीच ओजोन के अणु सूरज की सबसे छोटी तरंगदैर्ध्य वाली पराबैंगनी रोशनी पकड़कर गर्मी में बदल देते हैं। धूप ऊपर से नीचे आती है और रास्ते में ही सोखी जाती है, इसलिए ऊपरी हिस्सा, जो उससे सबसे पहले मिलता है, सबसे ज़्यादा तपता है और परत के तल की ओर यह गरमाहट घटती जाती है।
ठंडी हवा पर गर्म हवा का बैठना ही तापमान व्युत्क्रमण है, और व्युत्क्रमण ऊपर-नीचे की हलचल दबा देता है: ज़रा ऊपर धकेली गई हवा आसपास से ठंडी और भारी निकलती है और सीधी नीचे लौट आती है। बारिश और बादल इसी वजह से यहाँ नहीं पनपते। यहाँ की हवा तहों में सजी रहती है — अंग्रेज़ी नाम “स्ट्रैटोस्फ़ियर” इन्हीं तहों से बना है — और उसकी चाल धीमी और क्षैतिज है, घंटों की नहीं, महीनों और सालों की।
यही स्थिरता क्षोभसीमा को ढक्कन बनाती है। मानसून का गरज वाला बादल क्षोभमंडल में बेरोकटोक चढ़ता है, पर समताप मंडल से टकराते ही उसकी उठती हवा अगल-बगल फैलने लगती है। बंगाल की खाड़ी पर सौ किलोमीटर दूर से दिखने वाली सपाट, निहाई जैसी चोटी इसी टक्कर का निशान है।
उपमहाद्वीप के ऊपर ऊँची छत और मानसून का दरवाज़ा
छत ऊँची, तो बादल भी ऊँचे। ध्रुवीय इलाक़ों में क्षोभसीमा आम तौर पर लगभग 6 किलोमीटर पर रहती है, यहाँ 16 से 18 किलोमीटर पर। बंगाल की खाड़ी, गंगा के मैदान और पूर्वोत्तर के संवहन को इसलिए चढ़ने के लिए लंबी सीढ़ी मिलती है, और यहाँ के सबसे ऊँचे कपासी वर्षा मेघ धरती के सबसे गहरे बादलों में गिने जाते हैं। सबसे ज़ोरदार बादलों की चोटियाँ ढक्कन लाँघकर कुछ देर समताप मंडल में घुसती हैं और फिर ढह जाती हैं।
मानसून ऊपर का रास्ता खोलता है। दक्षिण-पश्चिमी मानसून के दिनों में एशिया के ऊपर, ऊपरी क्षोभमंडल और निचले समताप मंडल में, एक विशाल प्रतिचक्रवात बनता है जिसका लंगर तिब्बत के पठार और उपमहाद्वीप पर पड़ा रहता है। गहरा संवहन सतह की हवा को, मैदानों के प्रदूषण समेत, उसके तले तक उठा देता है, जहाँ से वह धीरे-धीरे और ऊपर खिंचकर पूरी दुनिया में फैल सकती है। शोध-विमानों और उपग्रहों ने क्षोभसीमा के पास इससे जुड़ी एक अलग एरोसॉल परत पहचानी है। सतह की हवा को समताप मंडल तक ऐसी अपेक्षाकृत सीधी राह गिनी-चुनी जगहों पर ही मिलती है, और यह राह दुनिया के सबसे घने बसे इलाक़ों में से एक के ठीक ऊपर खुलती है।
ओजोन सलामत, धूप फिर भी कड़ी। दक्षिण एशिया के ऊपर कोई ओजोन छिद्र नहीं है; ओजोन का भारी मौसमी क्षय अंटार्कटिका की कहानी है। यहाँ के ऊँचे यूवी सूचकांक की वजह कम अक्षांश और सूरज का ऊँचा कोण है, और पहाड़ों में पतली हवा तथा बर्फ़ की चमक। स्कार्दू के ऊपर की ओजोन अपना काम कर रही है, फिर भी पराबैंगनी किरणें भरपूर नीचे आती हैं।
28 महीने का झूला और आर्कटिक की अचानक तपिश
भूमध्य रेखा के ऊपर समताप मंडल की हवाएँ पूर्वी और पश्चिमी दिशा के बीच बारी-बारी पलटती हैं, और हर पलटाव ऊपर से नीचे उतरता है। इस चक्र को लगभग-द्विवार्षिक दोलन (QBO) कहते हैं; इसकी औसत अवधि लगभग 28 महीने है और वायुमंडल में इससे नियमित कोई दोहराव नहीं। शोध इसके चरण को उष्णकटिबंधीय चक्रवातों और मानसूनी बारिश के उतार-चढ़ाव से जोड़ता है, पर यह आँकड़ों का झुकाव भर है, पूर्वानुमान का औज़ार नहीं।
दूसरा असर आर्कटिक से आता है। सर्दियों का ध्रुवीय भँवर कभी-कभी अचानक बिखर जाता है और कुछ ही दिनों में आर्कटिक के ऊपर समताप मंडल का तापमान नाटकीय ढंग से चढ़ जाता है। यह अचानक समतापमंडलीय तापन नीचे उतरकर हफ़्तों तक मध्य अक्षांशों की जेट धारा का नक़्शा बदल सकता है। पश्चिमी विक्षोभ इसी जेट धारा की पटरी पर चलकर पाकिस्तान और उत्तर भारत तक जाड़े की बारिश और बर्फ़ पहुँचाते हैं, इसलिए आर्कटिक के ऊपर की यह हलचल घूमकर हमारे जाड़े तक आ सकती है। किसी एक ठंडी लहर में इसका कितना हाथ था, इस पर बहस है, पर रास्ता असली है और उस पर शोध जारी है।
विमान के रास्ते और दोपहर की धूप
यूरोप या उत्तरी अमेरिका पर क्षोभसीमा इतनी नीची है कि यात्री विमान सामान्य उड़ान-ऊँचाई पर अक्सर उसके ठीक ऊपर, समताप मंडल में होते हैं। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के ऊपर ढक्कन इतना ऊँचा है कि विमान आम तौर पर क्षोभमंडल में ही रहते हैं, और उन्हें रास्ते में कहीं ज़्यादा गरजते बादलों से कतराकर निकलना पड़ता है।
सेहत के लिए ओजोन परत ढाल है, पूरी छतरी नहीं। सबसे नुक़सानदेह, छोटी तरंग वाली पराबैंगनी किरणें वह ऊपर ही सोख लेती है, और यह ढाल न हो तो सतह पर रहना नामुमकिन हो जाए। फिर भी सौर विकिरण का अच्छा-ख़ासा पराबैंगनी हिस्सा ज़मीन तक आता है। दक्षिण एशिया में अक्षांश और सूरज के कोण की वजह से यह स्तर ऊँचा रहता है, और हिमालयी पठार पर चरम तक पहुँच जाता है, जहाँ हवा पतली है और बर्फ़ नीचे से धूप लौटाती है। इसलिए ओजोन परत के ऊपर होने भर से धूप सुरक्षित नहीं हो जाती।
पिनातुबो से मॉन्ट्रियल तक: जो ऊपर गया, बरसों टिका
1991 में फ़िलीपींस के माउंट पिनातुबो ने सल्फ़र डाइऑक्साइड को समताप मंडल तक उछाल दिया। वहाँ सल्फ़ेट की महीन बूँदों का विश्वव्यापी घूँघट तन गया, जो धूप को अंतरिक्ष की ओर लौटाने लगा। धरती की सतह का औसत तापमान एक डिग्री सेल्सियस के कुछ दसवें हिस्से तक गिरा और असर लगभग दो साल रहा, जब तक एरोसॉल नीचे नहीं बैठ गए। उतना ही बड़ा विस्फोट क्षोभमंडल तक सीमित रहता, तो उसका मलबा कुछ हफ़्तों में बारिश के साथ धुल जाता।
दूसरी कहानी क्लोरोफ़्लोरोकार्बन (CFC) गैसों की है। ज़मीन पर स्थिर और बेज़रर, ये इसी टिकाऊपन के चलते बिना टूटे समताप मंडल तक पहुँचीं। वहाँ पराबैंगनी रोशनी ने इन्हें तोड़ा और छूटी क्लोरीन, ख़ुद ख़र्च हुए बिना, उत्प्रेरक की तरह ओजोन मिटाती गई। मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल पर 1987 में सहमति बनी, इन गैसों का उत्पादन क़दम-ब-क़दम रोका गया, और अब समताप मंडल की ओजोन धीरे-धीरे सँभलने की राह पर है। इंसान ने इस परत को बिगाड़ा भी, और सुधारने का रास्ता भी उसी ने निकाला।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्षोभमंडल कहाँ ख़त्म होता है और समताप मंडल कहाँ से शुरू? क्षोभसीमा पर, जिसकी ऊँचाई अक्षांश और मौसम के साथ खिसकती है। दक्षिण एशिया पर वह समशीतोष्ण और ध्रुवीय इलाक़ों से काफ़ी ऊपर रहती है, क्योंकि गर्म उष्णकटिबंधीय हवा फैलकर नीचे की परत को मोटा कर देती है।
भारत के ऊपर उड़ता यात्री विमान क्या समताप मंडल में होता है? आम तौर पर नहीं। यूरोप या उत्तरी अमेरिका पर अक्सर होता है, क्योंकि वहाँ की नीची क्षोभसीमा उड़ान-ऊँचाई से नीचे रह जाती है; भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश पर विमान क्षोभमंडल में ही रहते हैं।
ओजोन परत ऊपर है, तो क्या धूप से डरने की ज़रूरत नहीं? ज़रूरत है। परत सबसे घातक किरणें रोकती है, धूप को बेख़तर नहीं बनाती; कम अक्षांश और ऊँचा सूरज यहाँ पराबैंगनी स्तर को ऊँचा ही रखते हैं।
अपने शहर की धूप कितनी तेज़ है, यह कहाँ देखूँ? शहर के पन्ने पर यूवी सूचकांक बादलों की मात्रा के ठीक बगल में दिखता है, ताकि धूप का अंदाज़ा तापमान से अटकल लगाकर नहीं, आँकड़े देखकर लगे। मैदान की दिल्ली को गहरे उष्णकटिबंध की चेन्नई के साथ रखकर देखिए, और दोनों को श्रीनगर या स्कार्दू जैसे ऊँचाई वाले स्टेशनों से मिलाकर देखिए।