ज़मीन से 9 से 12 किलोमीटर ऊपर बहने वाली बेहद तेज़ हवा की पतली पट्टी (लगभग 150 से 400 km/h), जो मौसम प्रणालियों को रास्ता दिखाती है और मानसून के आने-जाने का समय प्रभावित करती है।
घटनाएँजेट धारा क्या है?
लंबी दूरी के यात्री विमान जिस ऊँचाई पर उड़ते हैं, उसी परत में ऊपरी वायुमंडल की हवा कुछ पतली मगर बेहद तेज़ पट्टियों में सिमटकर बहती है, और मौसम विज्ञान इन पट्टियों को जेट धारा कहता है। ये आम तौर पर 9 से 12 किलोमीटर की ऊँचाई पर, क्षोभमंडल के ऊपरी हिस्से में, मोटे तौर पर पश्चिम से पूर्व बहती हैं। रफ़्तार 100 km/h से शुरू होकर सबसे ताक़तवर कोर में 400 km/h से भी आगे निकल जाती है।
यह धारा हमारे सिर से कई किलोमीटर ऊपर बहती है, फिर भी दिल्ली और पंजाब में जाड़े की बारिश, कश्मीर की बर्फ़बारी, जून में मानसून का भीतर तक घुस आना और बंगाल की खाड़ी के चक्रवात का रुख़ — इन सबमें इसी ऊपरी हवा का हाथ है।
हर गोलार्ध में एक ध्रुवीय जेट लगभग 50° से 60° अक्षांश के पास बहती है और एक उपोष्ण जेट 25° से 30° के आसपास। तीसरी क़िस्म, उष्णकटिबंधीय पुरवा जेट, सिर्फ़ गर्मियों में अफ़्रीका और एशिया के ऊपर बनती है और उलटी दिशा में, यानी पूर्व से पश्चिम, बहती है। दक्षिण एशिया के लिए उपोष्ण जेट और पुरवा जेट ही सबसे ज़्यादा मायने रखती हैं।
ठंडी और गरम हवा की सरहद पर बनती ऊपरी नदी
हर जेट धारा की जड़ में तापमान का फ़र्क़ है। ध्रुवों की ठंडी हवा जहाँ उष्णकटिबंध की गरम हवा से मिलती है, वहाँ वायुमंडल इस असंतुलन को बराबर करने की कोशिश करता है, और उसी कोशिश से ऊपर हवा की एक तेज़ नदी बह निकलती है।
पूर्व की ओर मोड़ने का काम धरती का घूमना करता है। घूर्णन से पैदा होने वाला कोरिओलिस बल इस तापमान-अंतर के साथ मिलकर पश्चिम से पूर्व बहने वाली भूविक्षेपी हवा बनाता है। तापमान का अंतर जितना तीखा, धारा उतनी तेज़।
इतनी ऊँचाई की हवा नापने के लिए दुनिया भर में दिन में दो बार रेडियोसोंड गुब्बारे छोड़े जाते हैं। उपग्रह बादलों के खिसकने से ऊपरी हवा का अंदाज़ा लगाते हैं, और विमानों से आने वाली रिपोर्टें (AMDAR) 2017 तक हर दिन उड़ान के दौरान लिए गए 7 लाख से ज़्यादा प्रेक्षण देने लगी थीं, जिनमें हवा का माप भी शामिल है। ECMWF और GFS जैसे मौसम मॉडल यह सब जोड़कर दो हफ़्ते आगे तक जेट धारा का पूर्वानुमान बनाते हैं।
हिमालय पर सर्दियों का डाकिया: उपोष्ण पछुआ जेट
सर्दियों में उपोष्ण पछुआ जेट ठीक हिमालय की पर्वतमाला के ऊपर आ टिकती है। यह 10 से 12 किलोमीटर की ऊँचाई पर पश्चिम से पूर्व बहती है और इसके कोर में हवा 200 से 300 km/h की रफ़्तार पकड़ लेती है।
दक्षिण एशिया की सर्दियों के मौसम पर इसकी स्थिति का गहरा असर है। पश्चिमी विक्षोभ — मध्य अक्षांशों के कम दबाव वाले तंत्र, जो भूमध्य सागर के ऊपर या उससे भी आगे पूर्व में जन्म लेकर ईरान, अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान पार करते हुए उत्तर भारत पहुँचते हैं — इसी धारा के सहारे रास्ता पाते हैं। हर विक्षोभ कश्मीर, हिमाचल और उत्तराखंड के पहाड़ों पर बर्फ़ गिराता है, और पंजाब, हरियाणा, दिल्ली तथा पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मैदानों में जाड़े की बारिश लाता है। धारा कितनी ताक़तवर है और कितनी दक्षिण तक उतरी है, इसी से तय होता है कि उत्तर भारत में ठंड कितनी कड़ी पड़ेगी।
जून में तस्वीर पलट जाती है: यह धारा हिमालय के उत्तर की ओर खिसककर मध्य एशिया तक पीछे हट जाती है। धारा का यह खिसकना उन कारणों में से एक है जिनसे मानसून की शुरुआत होती है, क्योंकि ऊपर से रुकावट हटते ही दक्षिण-पश्चिम की नम हवाएँ भारतीय भूभाग के भीतर तक चढ़ आती हैं।
मानसून की चिमनी: सिर्फ़ इसी इलाक़े की पुरवा जेट
जैसे-जैसे दक्षिण-पश्चिम मानसून जमता है, प्रायद्वीपीय भारत और उत्तरी अफ़्रीका के ऊपर 12 से 14 किलोमीटर की ऊँचाई पर एक तेज़ पुरवा जेट बहने लगती है, जो पूर्व से पश्चिम की ओर बहती है और जिसके कोर में रफ़्तार 100 नॉट से भी ऊपर जा सकती है। एशिया और अफ़्रीका की गर्मियों के अलावा यह धारा और कहीं नहीं मिलती।
भारत के ऊपर संवहन के इलाक़े में जो हवा ऊपर उठती है, उसे पुरवा जेट वहाँ से दूर बहा ले जाती है, जैसे चूल्हे की चिमनी धुआँ बाहर निकालती है। ऊपर जगह ख़ाली होती है तो नीचे से और हवा उठ पाती है, और भारी बारिश का सिलसिला टूटता नहीं।
मज़बूत पुरवा जेट का रिश्ता सामान्य से ज़्यादा मानसूनी बारिश से देखा गया है, जबकि कमज़ोर पुरवा जेट, मसलन अल नीनो वाले सालों में, अक्सर सामान्य से कम मानसून के साथ आती है। अक्टूबर तक मानसून लौटते ही यह धारा ग़ायब हो जाती है और उपोष्ण पछुआ जेट फिर दक्षिण खिसककर हिमालय के ऊपर लौट आती है।
हवाई सफ़र: पीठ पर धक्का, सामने से अड़चन
लंबी दूरी के यात्री विमान 10 से 12 किलोमीटर की ऊँचाई पर उड़ते हैं, ठीक उसी परत में जहाँ जेट धाराएँ बहती हैं, और एयरलाइंस ईंधन बचाने के लिए इसका जानबूझकर फ़ायदा उठाती हैं। पूर्व की ओर जाने वाली उड़ानें, जैसे यूरोप से भारत, धारा पर सवार होकर 100 km/h से ज़्यादा की पीठ-हवा पा लेती हैं; पश्चिम जाने वाले विमान, जैसे भारत से यूरोप, सामने से आती इस हवा से कतराते हैं।
मुंबई से लंदन की उड़ान पश्चिम की ओर जाती है और आम तौर पर लंदन से मुंबई लौटने वाली उड़ान से ज़्यादा समय लेती है, क्योंकि लौटते हुए विमान पूर्व की ओर जेट धारा पर सवार होकर आता है। पायलट रोज़ जेट धारा का पूर्वानुमान देखकर रास्ता तय करते हैं।
किनारों पर ख़तरा भी छिपा रहता है। जेट धारा के किनारों पर पवन अपरूपण सबसे ज़्यादा होता है, और वहीं अक्सर साफ़ आसमान में भीषण उथल-पुथल (क्लियर-एयर टर्बुलेंस) पैदा होती है — धूप खिले दिन में भी बिना चेतावनी विमान को झकझोर देने वाले झटके।
बंगाल की खाड़ी का तूफ़ान किधर मुड़ेगा
उष्णकटिबंधीय चक्रवात किस राह चलेगा, इस पर जेट धाराओं का असर पड़ता है। जेट के नीचे बैठा उपोष्ण उच्च दाब का कटक अटलांटिक और प्रशांत के तूफ़ानों को पश्चिम की ओर ले जाता है। ऊपरी स्तर की तेज़ पछुआ हवाएँ चक्रवात को मोड़कर ध्रुव की तरफ़ भेज सकती हैं, और जेट कमज़ोर पड़े या दो हिस्सों में बँट जाए तो उष्णकटिबंधीय तंत्र और उत्तर तक भटक सकते हैं।
बंगाल की खाड़ी के तूफ़ान का आम रास्ता इस पर टिका है कि ऊपर हवाओं का ढाँचा कैसा है: ज़्यादातर तूफ़ान उत्तर-पश्चिम की ओर, यानी ओडिशा, बंगाल या बांग्लादेश की तरफ़ बढ़ते हैं, पर कुछ मुड़कर म्यांमार की ओर निकल जाते हैं। तट पर बसे परिवार के लिए तूफ़ान उसके ज़िले पर उतरेगा या राह बदल लेगा, इसका जवाब आंशिक रूप से कई किलोमीटर ऊपर लिखा होता है।
गरम होता आर्कटिक, लहराती धारा
आर्कटिक के गरम होने से ध्रुवीय जेट कमज़ोर पड़ रही है। ध्रुव और उष्णकटिबंध के बीच तापमान का जो अंतर इस धारा को ताक़त देता है, वह घट रहा है, और हो सकता है कि कुछ इलाक़ों में धारा धीमी और ज़्यादा लहरदार होती जा रही हो। जलवायु परिवर्तन का यह असर कई रूप ले सकता है: मौसम का ढाँचा एक जगह अटककर लू, शीत लहर या सूखा लंबा खींच दे; धारा की लहर गहरे दक्षिण तक झुककर सर्दियों के तूफ़ान प्रचंड कर दे; उपोष्ण जेट खिसककर मानसून के समय पर अप्रत्यक्ष असर डाले।
इन असरों का आकार कितना है, इस पर वैज्ञानिक अभी एकमत नहीं; बहस तो इस पर भी जारी है कि 1979 के बाद से धारा नापने लायक़ हद तक ज़्यादा “लहरदार” हुई भी है या नहीं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
जेट धारा कितनी तेज़ बहती है? आम तौर पर 150 से 250 km/h, लेकिन सबसे ताक़तवर कोर में यह 400 km/h पार कर जाती है। हमारे हिस्से की बात करें तो सर्दियों में हिमालय के ऊपर टिकी पछुआ जेट के कोर में हवा 200 से 300 km/h के बीच रहती है।
क्या ज़मीन से जेट धारा को देखा जा सकता है? कभी-कभी, हाँ। बहुत ऊँचे आसमान में हवा की दिशा में सीधी कतार बाँधे पक्षाभ बादलों की पतली धारियाँ जेट की धुरी का पता दे सकती हैं। जेट की ऊँचाई पर उड़ते पायलट को आसमान साफ़ दिखता है, पर उसी साफ़ हवा में रफ़्तार अचानक बदलती रहती है।
क्या उत्तर भारत की सर्दियों की बारिश जेट धारा बरसाती है? सीधे तौर पर नहीं। पानी असल में पश्चिमी विक्षोभ बरसाते हैं; उपोष्ण जेट उन्हें पूर्व की ओर पाकिस्तान और भारत तक हाँककर लाती है। यह मार्गदर्शन न हो, तो ये तंत्र दक्षिण एशिया तक पहुँच ही न पाएँ।
जेट धारा के नक्शे कौन छापता है? विमानन मौसम की ख़ास वेबसाइटें जेट धारा के नक्शे छापती हैं, और ECMWF तथा GFS 300 hPa स्तर की हवा का पूर्वानुमान मुफ़्त देते हैं। ज़मीन पर पड़ने वाले असर, जैसे चक्रवात का रास्ता और मानसून ट्रफ़, के लिए मौसम ऑनलाइन शहर-स्तर का पूर्वानुमान देता है: दिल्ली, मुंबई और पटना।