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अल नीनो

प्रशांत महासागर के बीचोंबीच और पूरबी हिस्से का सतही पानी महीनों तक सामान्य से गर्म रह जाने की स्थिति, जो अक्सर भारतीय मानसून को कमज़ोर करती है और दक्षिण एशिया के कई हिस्सों में सूखे तथा गर्मी का ख़तरा बढ़ा देती है।

घटनाएँ

अल नीनो क्या है?

पेरू के मछुआरों ने इसे सबसे पहले पहचाना था। कुछ वर्षों में क्रिसमस के आसपास समुद्र का पानी गुनगुना हो जाता और जाल पहले जैसे भरकर नहीं लौटते। उन्होंने इस गरमाहट को नाम दिया अल नीनो — “बालक ईसा”।

आज मौसम विज्ञान इसी नाम से प्रशांत महासागर के बीचवाले और पूरबी उष्णकटिबंधीय हिस्से के सतही पानी का सामान्य से काफ़ी ज़्यादा गर्म हो जाना समझता है। यह गरमाहट आमतौर पर 9 से 12 महीने टिकती है और हर 2 से 7 साल में लौट आती है। इसका उलटा चरण, ला नीना, ठंडे प्रशांत का होता है। दोनों मिलकर अल नीनो–दक्षिणी दोलन यानी ENSO बनाते हैं — धरती पर साल-दर-साल जलवायु बदलने की सबसे बड़ी अकेली वजह।

भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश में बैठे पाठक के लिए यह दूर की बात नहीं है। प्रशांत का यह बुख़ार मानसून को कमज़ोर कर सकता है या उसकी तारीख़ खिसका सकता है, और गर्मियों का तापमान चढ़ा सकता है। 2015-16 तथा 2023-24 — दोनों अल नीनो वर्षों में भारतीय मानसून की बारिश घटी और मानसून-पूर्व की लू ज़्यादा तीखी रही।

व्यापारिक हवाएँ ढीली पड़ती हैं, गर्म पानी पूरब लौटता है

सामान्य हालात में भूमध्यरेखीय प्रशांत पर व्यापारिक हवाएँ पूरब से पश्चिम चलती हैं और सतह का गर्म पानी इंडोनेशिया तथा ऑस्ट्रेलिया की तरफ़ धकेलती रहती हैं। पश्चिमी प्रशांत में जमा यह गर्म कुंड नम हवा को ऊपर उठाता है, और वही उठती हवा एशियाई तथा ऑस्ट्रेलियाई मानसून को ईंधन देती है। दक्षिण अमेरिका के तट पर गहराई का ठंडा पानी ऊपर आता रहता है — इसे उत्थान कहते हैं।

अल नीनो में यही व्यवस्था ढीली पड़ जाती है। व्यापारिक हवाएँ कमज़ोर होती हैं, कभी-कभी उलटकर बहने लगती हैं, और उसके बाद क्रम इस तरह चलता है:

  1. सतह का गर्म पानी वापस दक्षिण अमेरिका की ओर खिसकता है।
  2. प्रशांत का गर्म कुंड और उसके साथ-साथ बारिश का इलाक़ा पूरब सरक जाता है।
  3. इंडोनेशिया और पश्चिमी प्रशांत सूखने लगते हैं।
  4. दक्षिण अमेरिका का पश्चिमी तट पहले से गर्म और भीगा हो जाता है।
  5. पूरा वायुमंडलीय परिसंचरण, जिसे वॉकर परिसंचरण कहते हैं, गड़बड़ा जाता है।

गरमाहट और बारिश के इस फेरबदल की लहरें अगले पूरे साल दुनिया भर के मौसम में महसूस होती रहती हैं।

अल नीनो भारत और दक्षिण एशिया में

अल नीनो और भारतीय मानसून का रिश्ता आँकड़ों में मज़बूत है, पर तय नहीं। अल नीनो वाले लगभग 60% वर्षों में मानसून की बारिश सामान्य से कम रही है — बाक़ी वर्षों में नहीं। हिंद महासागर द्विध्रुव, मैडेन-जूलियन दोलन और बर्फ़ के ढके रहने जैसी दूसरी वजहें उसका असर काट भी सकती हैं और बढ़ा भी।

दक्षिण एशिया में आम तौर पर दिखने वाले असर:

रिकॉर्ड में दर्ज अल नीनो वर्ष और उस साल का भारतीय मानसून:

1997-98 वाली पंक्ति याद रखने लायक़ है। अल नीनो की घोषणा अपने आप सूखे की घोषणा नहीं होती — वह जोखिम बढ़ने की ख़बर है, नतीजे की नहीं।

कमज़ोर मानसून का बिल कौन भरता है

खेत सबसे पहले चोट खाता है। बारिश 5 से 15% घट जाए तो बुआई पिछड़ती है, और केरल पर मानसून देर से पहुँचे तो उसके पीछे के हर राज्य का कैलेंडर खिसक जाता है। सूखा जहाँ बार-बार लौटता है — मध्य और दक्षिण भारत, पाकिस्तान तथा श्रीलंका के हिस्से — वहाँ अल नीनो वाला साल पहले से पतली हालत पर और दबाव डालता है।

जलाशयों का स्तर गिरना सिर्फ़ सिंचाई की बात नहीं है; गर्मियों की पनबिजली भी उसी पानी से बँधी है, और दोनों एक साथ घटते हैं।

सेहत पर मार दो रास्तों से आती है। अप्रैल–मई की लू तीखी होती है, और बारिश न पड़ने से जो धूल-धुआँ बौछारें नीचे बैठा देती हैं वह तैरता रह जाता है — AQI ऊँचा बना रहता है। इसीलिए योजना बनाने वालों को अल नीनो वाले साल को सूखे और लू, दोनों का जोखिम-काल मानकर पानी का भंडारण और फसल की योजना पहले से तय करनी चाहिए।

दक्षिण-पूर्व एशिया: सूखी पीट और सीमा पार जाता धुआँ

दक्षिण एशिया में अल नीनो का असर बदलता रहता है, पर दक्षिण-पूर्व एशिया और इंडोनेशिया में वह लगभग भरोसेमंद ढंग से सूखा लेकर आता है।

ONI: प्रशांत का बुख़ार किस पैमाने से नापा जाता है

सबसे ज़्यादा देखा जाने वाला सूचक ONI है — नीनो 3.4 क्षेत्र (5°N–5°S, 120°W–170°W) में समुद्र-सतह के तापमान विचलन का 3 महीने का चलता औसत। उसका पाठ इस तरह पढ़ा जाता है:

NOAA, ऑस्ट्रेलिया का मौसम ब्यूरो और जापान की मौसम एजेंसी, तीनों ENSO का पूर्वानुमान जारी करते हैं। भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) अपने मानसून पूर्वानुमान में ENSO की स्थिति खुलकर गिनता है — इसीलिए उसकी घोषणा में प्रशांत महासागर का ज़िक्र आता है।

गर्म होती दुनिया में अल नीनो का क्या होगा

एक सवाल बरसों से खुला है: क्या वैश्विक तापवृद्धि अल नीनो को ज़्यादा बार या ज़्यादा तीव्र बना रही है? IPCC की AR6 रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि मध्यम से बहुत ऊँचे उत्सर्जन वाले परिदृश्यों में 21वीं सदी के उत्तरार्ध तक ENSO से जुड़ी बारिश की घट-बढ़ के और प्रबल होने की बहुत अधिक संभावना है, जबकि आने वाली सदी में ENSO से जुड़े समुद्र-सतह तापमान के बदलाव पर जलवायु मॉडल एकमत नहीं हैं।

जो तय है वह यह है कि अल नीनो के नतीजे — गर्मी, सूखा, आग — अब पहले से चढ़ी हुई तापमान की लकीर के ऊपर आ रहे हैं: घटना उतनी ही ताक़तवर हो तब भी शुरुआती बिंदु ऊँचा है, इसलिए नुक़सान ज़्यादा।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या इस वक़्त अल नीनो चल रहा है? ENSO की स्थिति हर महीने अद्यतन होती है, इसलिए उसे NOAA के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र या IMD के पन्ने पर देखना ही सही तरीक़ा है। 2023-24 का अल नीनो 2024 के मध्य में ख़त्म हुआ। NOAA के जलवायु पूर्वानुमान केंद्र ने जून 2026 तक फिर से अल नीनो की स्थिति दर्ज की, और अक्टूबर 2026 में बताया कि यह अल नीनो अब भी ज़ोर पकड़ रहा है।

क्या अल नीनो का मतलब हमेशा ख़राब मानसून है? नहीं। अल नीनो वाले सिर्फ़ लगभग 60% वर्षों में भारतीय मानसून कम रहा है। हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD) और मैडेन-जूलियन दोलन उसका असर काट सकते हैं; धनात्मक IOD तो कई बार अल नीनो वाले मानसून को बचा ले जाता है।

अल नीनो और ला नीना में फ़र्क़ क्या है? ये ENSO के दो उलटे चरण हैं। अल नीनो में प्रशांत का मध्य और पूरबी हिस्सा गर्म, ला नीना में ठंडा। ला नीना अक्सर भारत में ज़्यादा मज़बूत मानसून और बंगाल की खाड़ी में ज़्यादा चक्रवात लाती है।

अल नीनो कितने समय तक रहता है? आमतौर पर 9 से 12 महीने, कभी-कभी 18 महीने तक। तीव्र अल नीनो बसंत में (मार्च–मई) पनपते हैं, सर्दियों में (नवंबर–फ़रवरी) चरम पर पहुँचते हैं और अगले बसंत तक ढल जाते हैं।

अपने शहर पर इसका असर कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर आज का मौसम और AQI दिखाता है, इसलिए कमज़ोर मानसून वाले साल में बारिश और हवा दोनों वहीं से देखी जा सकती हैं। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोच्चि के पन्ने सबसे काम के हैं — कोच्चि उसी केरल तट पर है जहाँ मानसून सबसे पहले पहुँचता है।

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