18 किमी तक खड़ा हो जाने वाला गरजता बादल, जिससे मूसलाधार बारिश, बिजली, ओले और डाउनबर्स्ट निकलते हैं। दक्षिण एशिया की मानसूनी बारिश इसी बादल की बनाई हुई है।
मूल बातेंकपासी वर्षा मेघ क्या है?
कपासी वर्षा मेघ (क्यूम्युलोनिम्बस, संक्षेप में Cb) का नाम लैटिन के “ढेर लगे बरसाती बादल” से आया है, और आसमान में यही सबसे बड़ा तथा सबसे ताक़तवर बादल है। हर गरज के साथ तूफान, हर ओलावृष्टि और भारी बारिश की लगभग हर घटना के पीछे यही खड़ा रहता है। एक परिपक्व मीनार 12 से 18 किलोमीटर ऊँची हो सकती है, उसमें करीब पाँच लाख टन पानी भरा रहता है, और अपने जीवनकाल में संघनन के ज़रिए वह बहुत बड़ी मात्रा में ऊर्जा छोड़ती है।
उष्णकटिबंधीय दक्षिण एशिया में, जहाँ नम मानसूनी हवा को ज़मीन की तेज़ तपिश मिलती है, बारिश का सबसे बड़ा हिस्सा यही बादल देता है। चार हालात में इसे बनते देखा जाता है:
- मानसून के दिनों में रोज़ (जून से सितंबर), लगभग पूरे उपमहाद्वीप पर।
- मानसून-पूर्व में प्रचंड रूप में (मार्च से मई), पूर्वी भारत और बांग्लादेश की मशहूर काल बैसाखी या नॉरवेस्टर आँधियों के रूप में।
- चक्रवातों की पट्टियों के भीतर, जहाँ सबसे भारी बारिश और सबसे नुकसानदेह हवाएँ इन्हीं से निकलती हैं।
- सूखे मौसम में पहाड़ी इलाकों पर, जहाँ दोपहर की गर्मी अकेले ही संवहन छेड़ देती है।
ज़मीन से फ़र्क़ साफ़ दिखता है। आम कपासी बादल रुई के फाहे की तरह तैरता रहता है, जबकि यह बादल आँखों के सामने ऊपर की ओर बढ़ता जाता है।
पाँच लाख टन पानी को ऊपर कौन टिकाए रखता है
इतनी बड़ी मीनार खड़ी होने के लिए चार चीज़ें एक साथ चाहिए — मौसम विज्ञानी इन्हें संवहन की चार शर्तें कहते हैं।
- नमी — हवा में पानी की भाप भरपूर हो, आमतौर पर ओसांक 18°C या उससे ऊपर।
- अस्थिरता — तापमान का ऐसा ढाँचा जिसमें नीचे की गर्म हवा ऊपर की ठंडी हवा में उठती चली जाए, यानी ह्रास दर आर्द्र रुद्धोष्म दर से ज़्यादा हो।
- उठान — सतह की हवा को ऊपर धकेलने वाला धक्का: ज़मीन की तपिश, वाताग्र, पहाड़ की ढलान या हवाओं का अभिसरण।
- पवन कतरनी — ऊँचाई के साथ हवा की दिशा या रफ़्तार का बदलना। प्रचंड तूफ़ानों के लिए यही शर्त निर्णायक है, क्योंकि इसी से स्क्वॉल लाइन और सुपरसेल जैसी संगठित बनावटें बनती हैं।
मानसून-पूर्व के दक्षिण एशिया में चारों शर्तें एक साथ पूरी हो जाती हैं। सतह का तापमान 38 से 44°C तक चढ़कर अस्थिरता पैदा करता है, बंगाल की खाड़ी से आती नमी ओसांक ऊँचा रखती है, दोपहर की तपिश संवहन को चिंगारी देती है और ऊपरी पछुआ हवाएँ कतरनी दे जाती हैं। नतीजा ओलों, बिजली और तोड़-फोड़ करने वाली हवाओं वाली नॉरवेस्टर आँधी होता है।
बन जाने के बाद मेघ तीन चरणों में पकता है। कपासी चरण 10 से 20 मिनट चलता है, बादल 4 से 8 किमी तक चढ़ जाता है और बारिश अभी शुरू नहीं हुई होती। परिपक्व चरण 20 से 60 मिनट का होता है — बारिश अपनी सबसे तेज़ रफ़्तार पर, साथ में बिजली, गरज और कभी ओले; ठंडी भारी हवा 80 किमी/घंटा से ऊपर की रफ़्तार से पेंदे से बाहर गिरती है और निहाई फैलने लगती है। क्षय चरण 10 से 30 मिनट में निपट जाता है: नीचे गिरती हवा ऊपर उठती धारा का रास्ता काट देती है और बादल चौड़ाई में फैलकर घंटों तक आसमान में पड़ा रहता है।
हर मेघ अकेला नहीं रहता। कुछ बहु-कोशिका समूह या सुपरसेल में बदलकर कई घंटे टिकते हैं, और स्क्वॉल लाइन के रूप में सैकड़ों किलोमीटर लंबी कतार बना लेते हैं।
निहाई, गुंबद और थन: इस बादल को नीचे से कैसे पढ़ें
पेंदा लगभग 500 मीटर पर रहता है, गहरा धूसर और अक्सर चपटा — यही वह तल है जहाँ उठती हवा संघनन के स्तर से टकराती है, और भारी बारिश यहीं से गिरती है। धड़ 3 से 10 किमी के बीच फैला रहता है; यहाँ 50 से 100 किमी/घंटा की ऊपर उठती धाराएँ गर्म नम हवा को ढो रही होती हैं, और यहीं अतिशीतित पानी, बर्फ़ के रवे और बढ़ते हुए ओले मिलते हैं। चोटी 12 से 18 किमी पर स्थिर समतापमंडल से टकराती है और आगे ऊपर जाने के बजाय अगल-बगल फैल जाती है; इसी से निहाई यानी लोहार की ऐनविल जैसी चपटी शक्ल बनती है, जो जनक तूफ़ान से सैकड़ों किलोमीटर दूर तक खिंच सकती है।
सबसे ताक़तवर तूफ़ानों में प्रमुख धारा क्षोभसीमा को भी भेद जाती है और निहाई के ऊपर बादल का गुंबद उभर आता है — ओवरशूटिंग टॉप, जो उपग्रह की तस्वीर में और नीचे से भी पहचाना जा सकता है। निहाई के निचले हिस्से पर कभी-कभी थैली जैसे उभार लटके दिखते हैं, जिन्हें मैमेटस कहा जाता है; ये भीतर की उथल-पुथल बताते हैं और अक्सर क्षय चरण में उभरते हैं।
नीचे खड़े आदमी के लिए पहचान के सूत्र सीधे हैं: बादल का आँखों के सामने ऊपर बढ़ना, फूलगोभी जैसी उबलती चोटी का चपटी निहाई में बदल जाना, पेंदे का काला पड़ना और उससे बारिश की लकीरें लटकना। सबसे भरोसेमंद पैमाना गरज की देरी है — चमक के 30 सेकंड के भीतर गरज सुनाई दे, तो तूफ़ान 10 किमी के भीतर है। बनते हुए मेघ को देखते ही आश्रय ढूँढ़ना शुरू कर दीजिए, क्योंकि आमतौर पर 30 से 60 मिनट में वह सिर पर होता है।
कपासी वर्षा मेघ भारत और दक्षिण एशिया में
भारतीय मानसून की बारिश मुख्य रूप से इन्हीं मेघों के संवहन से आती है। मध्य भारत के किसी ज़िले पर एक सामान्य मानसूनी दिन कुछ यूँ गुज़रता है: दोपहर में अलग-अलग कोशिकाएँ खड़ी होती हैं, और उनमें से कुछ आपस में मिलकर ज़्यादा देर चलने वाले समूह बन जाती हैं। “सक्रिय” मानसून के दिनों में ये मेघ ज़्यादा संख्या में और ज़्यादा बड़े बनते हैं, “ब्रेक” वाले दिनों में इनकी गिनती गिर जाती है — कैलेंडर पर बारिश का उतार-चढ़ाव असल में इसी गिनती का उतार-चढ़ाव है।
मेघालय इसका एक चरम उदाहरण है। चेरापूँजी और मॉसिनराम धरती की सबसे बरसाती जगहों में गिनी जाती हैं, जहाँ हर साल 11,000 मिमी से ज़्यादा पानी गिरता है। यह आँकड़ा लगातार चलती कपासी वर्षा मेघ गतिविधि का नतीजा है: बंगाल की खाड़ी से आती नमी को खासी पहाड़ियाँ ज़बरदस्ती ऊपर धकेलती हैं और मानसून भर नए मेघ बनते रहते हैं।
पूर्वी भारत और बांग्लादेश में मार्च से मई के बीच यही बादल अपने सबसे हिंसक रूप में दिखता है। रात में इनका बनना भी इस इलाके में आम है, क्योंकि उष्णकटिबंध में ज़मीन रात को ज़्यादा ठंडी नहीं होती। चक्रवातों के भीतर तस्वीर और अलग होती है — वहाँ सैकड़ों मेघ एक साथ खड़े रहते हैं, लगातार नए बनते हुए और गर्म समुद्री सतह से ताक़त लेते हुए।
बिजली, ओले और डाउनबर्स्ट: एक मेघ के नीचे का नुकसान
एक ही परिपक्व मेघ से कई तरह के खतरे एक साथ निकलते हैं।
- बिजली — प्रचंड मेघों से बार-बार बिजली गिरती है, और चमक की नली का तापमान 30,000°C तक पहुँच जाता है।
- मूसलाधार बारिश — अक्सर एक घंटे में 30 से 100 मिमी; बादल फटने जैसी घटनाओं में 150 मिमी प्रति घंटा से भी ऊपर।
- ओले — मटर के दाने से लेकर क्रिकेट गेंद तक के आकार के।
- डाउनबर्स्ट — अचानक आने वाले 60 से 150 किमी/घंटा के ज़मीनी झोंके।
- बवंडर — दक्षिण एशिया में दुर्लभ, लेकिन ऐतिहासिक रूप से बवंडरों से होने वाली मौतों की संख्या दुनिया में सबसे ज़्यादा बांग्लादेश में रही है।
- अचानक बाढ़ — थोड़े समय में गिरी बहुत सारी बारिश का सीधा नतीजा।
खेत के लिहाज़ से सबसे महँगी चोट ओलों की होती है, क्योंकि क्रिकेट गेंद जितना ओला खड़ी फ़सल को एक ही शाम में बिछा देता है। कच्चे घरों, टिन की छतों और होर्डिंग के लिए असली खतरा डाउनबर्स्ट है, जो बिना चेतावनी आता है और कुछ मिनटों में निकल जाता है। शहरों में नुकसान का सबसे आम रास्ता अचानक बाढ़ है — एक ही घंटे में सौ मिमी पानी गिरे तो नालियाँ उसे ले नहीं पातीं। खुले में काम करने वालों के लिए सबसे बड़ा खतरा बिजली बनी रहती है।
पायलटों को प्रचंड मेघों से बीस मील दूर रहने की सलाह क्यों दी जाती है
विमानन में इस बादल के साथ कोई रियायत नहीं बरती जाती। पायलटों को सलाह दी जाती है कि प्रचंड मेघों को कम से कम 20 मील के क्षैतिज फ़ासले से बचाकर निकलें, और वजहें तीन हैं: भीतर की भीषण उथल-पुथल, ओलों से ढाँचे को होने वाला नुकसान और बिजली का गिरना। इतनी बड़ी दूरी रखने का कारण बनावट में छिपा है — निहाई जनक तूफ़ान से सैकड़ों किलोमीटर दूर तक फैल सकती है, इसलिए खिड़की से दिखती मीनार से दूरी नाप लेना सुरक्षा का पैमाना नहीं होता। उपग्रह पर दिखता ओवरशूटिंग टॉप बता देता है कि सबसे तेज़ धारा कहाँ है, और उड़ान की योजना में यही निशान सबसे काम आता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
कपासी वर्षा मेघ इतने ऊँचे क्यों हो जाते हैं? भीतर उठती गर्म नम हवा अस्थिर होती है — चढ़ते-चढ़ते भी वह अपने आसपास की हवा से गर्म और हल्की बनी रहती है, इसलिए रफ़्तार पकड़ती जाती है और उष्णकटिबंध में 15 से 18 किमी पर समतापमंडल से टकराने तक नहीं रुकती। ताक़त भाप के बूँदों में बदलते समय छूटने वाली गुप्त ऊष्मा से आती है।
क्या हर कपासी वर्षा मेघ खतरनाक होता है? ज़्यादातर से भारी बारिश, बिजली और झोंकेदार हवा में से कुछ न कुछ निकलता ही है। बड़े ओले और बवंडर सिर्फ़ प्रचंड या सुपरसेल श्रेणी वालों से आते हैं। फिर भी छोटे मेघ को हल्के में लेना गलती है, क्योंकि जानलेवा बिजली उससे भी गिर सकती है।
ये कितनी देर टिकते हैं? अकेली कोशिका बनने से बिखरने तक 30 से 60 मिनट लेती है। बहु-कोशिका और सुपरसेल जैसी संगठित बनावटें 2 से 8 घंटे चलती हैं। चक्रवात के भीतर सैकड़ों मेघ लगातार नए बनते रहते हैं, इसलिए वहाँ यह सिलसिला थमता ही नहीं।
क्या रात में भी बन सकते हैं? हाँ। उष्णकटिबंध में ज़मीन रात को ज़्यादा ठंडी नहीं होती, और गर्म समुद्री सतह पर तो यह सिलसिला रात में तेज़ भी हो जाता है — चक्रवात अक्सर रातों-रात ताक़त पकड़ते हैं। बांग्लादेश और पूर्वोत्तर भारत में रात के मानसूनी तूफ़ान आम हैं।
अपने शहर के लिए तूफ़ान का पूर्वानुमान कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर बारिश की संभावना और मौसम कोड दिखाता है, जिनमें 95 से 99 का कोड गरज के साथ तूफान बताता है। कोलकाता, पटना, भोपाल, गुवाहाटी और भुवनेश्वर के पन्ने इसी काम के लिए बने हैं।