गरज वाले बादल में आवेश अलग हो जाने से पैदा हुआ विद्युत निर्वहन, जो बादल के भीतर, दो बादलों के बीच या बादल और ज़मीन के बीच कौंधता है। भारत में मौसम की किसी भी दूसरी आपदा से ज्यादा जानें बिजली लेती है।
घटनाएँबिजली क्या है?
तड़ित, वज्रपात, आकाशीय बिजली — नाम कई हैं, परिघटना एक: वायुमंडल में होने वाला एक विशाल स्थिरवैद्युत निर्वहन, जिसके साथ आँख चौंधिया देने वाली चमक और गर्जन की आवाज़ आती है। एक ही लपट में करीब 30 करोड़ वोल्ट और 30,000 एम्पियर की धारा बहती है, और उसके रास्ते की हवा लगभग 30,000°C तक तप जाती है — सूरज की सतह से करीब पाँच गुना ज्यादा।
भारत के पाठक के लिए यह दूर की वैज्ञानिक जिज्ञासा नहीं है। मौसम की बाकी सारी आपदाएँ — चक्रवात, बाढ़, लू — और भूकंप तक जोड़ लें, तब भी बिजली उन सबसे मिलाकर ज्यादा लोगों को मारती है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों में हर साल 2,000–3,000 मौतें दर्ज होती हैं। मरने वालों में सबसे बड़ा हिस्सा मध्य और पूर्वी भारत के किसानों और खुले में काम करने वाले मजदूरों का है, जो प्री-मानसून और मानसून के गरज-तूफान वाले महीनों में खेत के बीच पकड़े जाते हैं।
बादल के भीतर आवेश कैसे बँट जाता है
ऊँचे कपासी वर्षा मेघ के भीतर हवा एक जगह टिकती नहीं। तेज़ ऊर्ध्वप्रवाह और अधोप्रवाह बर्फ के क्रिस्टल, अतिशीतित जल-बूँदों और ग्रोपल (नरम ओले) को लगातार आपस में टकराते रहते हैं, और हर टक्कर थोड़ा-सा विद्युत आवेश एक कण से दूसरे पर छोड़ जाती है। इसका नतीजा बादल के भीतर एक साफ बँटवारा होता है:
- हल्के बर्फ के क्रिस्टल धनात्मक आवेश लेकर ऊपर, बादल की चोटी की ओर उठ जाते हैं।
- भारी ग्रोपल कण ऋणात्मक आवेश लेकर बादल के तल पर जमा होते रहते हैं।
हवा खुद बिजली की बहुत बुरी चालक है और दो आवेश क्षेत्रों के बीच दीवार की तरह खड़ी रहती है। पर यह दीवार अनंत मजबूत नहीं। जैसे ही वोल्टेज हवा की रोकने की क्षमता, यानी करीब 30 लाख वोल्ट प्रति मीटर, से आगे निकलता है, हवा टूट जाती है और एक चालक रास्ता खुल जाता है। यही टूटन बिजली है।
निर्वहन तीन तरह का हो सकता है, और तीनों का खतरा एक जैसा नहीं:
- बादल के भीतर ही, एक ही मेघ के दो आवेश क्षेत्रों के बीच — यह सबसे आम है, करीब 75 प्रतिशत।
- दो अलग बादलों के बीच।
- बादल से ज़मीन तक — करीब 25 प्रतिशत, और यही वह किस्म है जो लोगों की जान लेती है और संपत्ति तोड़ती है।
ज़मीन की ओर आती बिजली सीधी लकीर में नहीं गिरती। वह सीढ़ी-दर-सीढ़ी, शाखाओं में बँटे रास्तों से नीचे उतरती है, और जिस क्षण कोई शाखा ज़मीन को छूती है, उसी रास्ते से एक चमकीला प्रतिगामी स्ट्रोक ऊपर की ओर दौड़ता है। आँख जो एक झटके की चमक देखती है, वह असल में यही लौटती हुई धारा है।
बिजली भारत और दक्षिण एशिया में
लाइटनिंग रेज़िलिएंट इंडिया अभियान की वार्षिक आकाशीय बिजली रिपोर्ट 2020–2021 के मुताबिक अप्रैल 2020 से मार्च 2021 के बीच भारत में करीब 1.85 करोड़ बार बिजली गिरी। यह साल भर एक-सी नहीं बँटी होती:
- प्री-मानसून (अप्रैल–मई): पूर्वी भारत में भीषण गरज-तूफान — बंगाल, बिहार, ओडिशा और असम में इन्हें काल बैसाखी या नॉरवेस्टर कहा जाता है।
- मानसून (जून–सितंबर): उपमहाद्वीप के ज्यादातर हिस्सों में लगभग रोज़ाना तूफानी बादल।
- मानसून-पश्चात (अक्टूबर–नवंबर): तटीय तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश।
जिन इलाकों में बिजली का घनत्व सबसे ज्यादा है, वे भी तय हैं:
- पूर्वी भारत — बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल और ओडिशा, जिस पट्टी को बिजली का गलियारा कहा जाता है।
- पूर्वोत्तर भारत — मेघालय, असम और त्रिपुरा।
- मध्य भारत — मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़।
- पाकिस्तान के मानसूनी मैदान — पंजाब और सिंध।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के मुताबिक 2022 में बिहार में बिजली गिरने से 329 लोगों की मौत हुई; इससे ज्यादा मौतें सिर्फ मध्य प्रदेश (496) में दर्ज हुईं। मरने वालों में अधिकांश वे लोग होते हैं जिन्हें अचानक आए तूफान ने खेत में या किसी पेड़ के नीचे पकड़ लिया।
खेत में खड़ा आदमी ही सबसे ऊँची चीज होता है
बिजली से मरने वालों की सूची में किसानों का नाम सबसे ऊपर क्यों रहता है, इसका जवाब भूगोल जितना सीधा है। बिजली ज़मीन तक का सबसे छोटा रास्ता ढूँढ़ती है, और समतल खेत में वह रास्ता अकसर वहाँ खड़ा इंसान ही होता है। धान की रोपाई और निराई ठीक उन्हीं महीनों में चलती है जब गरज वाले बादल सबसे ज्यादा बनते हैं।
दूसरी बड़ी वजह आसरा लेने की वह आदत है जो बचाव जैसी लगती है। खेत के बीच अकेला पेड़ आसपास की सबसे ऊँची चीज होता है, इसलिए बारिश से बचने के लिए उसके नीचे खड़ा होना सबसे घातक फैसला साबित होता है। बिजली के खंभे, लैंप पोस्ट और मोबाइल टावर जैसी ऊँची धातु की चीजें भी बार-बार मार खाती हैं। पानी भी सुरक्षित नहीं — तालाब, नदी और नाव पर मौजूद लोग खुले मैदान वालों जितने ही खतरे में रहते हैं।
गरज सुनाई दे जाए तो — 30/30 नियम और दामिनी ऐप
सबसे काम का नियम एक वाक्य में आ जाता है: अगर गरज सुनाई दे रही है, तो आप बिजली की पहुँच के भीतर हैं। बिजली अपने जनक तूफान से 15 किलोमीटर दूर तक गिर सकती है, यानी सिर के ऊपर साफ आसमान होने का मतलब सुरक्षा नहीं है।
दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाला 30/30 नियम दो हिस्सों का है:
- चमक दिखने और गरज सुनाई देने के बीच के सेकंड गिनिए। अगर यह अंतर 30 सेकंड से कम है, तो तूफान 10 किलोमीटर के भीतर है — तुरंत आसरा लीजिए।
- आखिरी गरज सुनने के बाद कम से कम 30 मिनट रुककर ही बाहर निकलिए।
सुरक्षित जगह दो ही हैं: पूरी तरह बंद पक्की इमारत, या बंद खिड़कियों वाली कठोर छत की गाड़ी, जिसका धातु का ढाँचा धारा को बैठे हुए लोगों के चारों ओर से निकाल देता है। खुला मैदान, समुद्र तट, पहाड़ की चोटी, छत, अकेला पेड़, ऊँचे धातु के खंभे और पानी — ये सब खतरे की जगहें हैं। घर के भीतर भी तार वाले फोन, नहाने का शॉवर और पानी की पाइप छूने से बचना चाहिए।
खेत में काम करने वालों के लिए सलाह थोड़ी और सीधी है: पहली गड़गड़ाहट पर काम रोककर पक्की छत के नीचे जाइए। अगर कोई आसरा न मिले, तो आसपास की सबसे नीची जगह पर पैर जोड़कर उकड़ूँ बैठिए और कानों पर हाथ रख लीजिए। ज़मीन पर पूरा लेटना कभी नहीं चाहिए — इससे शरीर का ज़मीन से लगा हिस्सा बढ़ जाता है।
चेतावनी की तरफ से भी अब सहारा मौजूद है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM), पुणे का दामिनी ऐप देशभर के सेंसर नेटवर्क के आधार पर 40 मिनट पहले बिजली गिरने का अनुमान देता है। IMD राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सचेत ऐप और राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरणों के जरिये भीषण गरज-तूफान की चेतावनी जारी करता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत में हर साल बिजली से कितनी मौतें होती हैं? करीब 2,000–3,000, और राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2022 के आँकड़ों में सबसे ज्यादा प्रभावित राज्यों में मध्य प्रदेश, बिहार, ओडिशा, उत्तर प्रदेश और झारखंड शामिल हैं। मरने वालों में ज्यादातर खुले खेत में काम करते किसान और मजदूर होते हैं।
क्या तूफान के दौरान मोबाइल फोन इस्तेमाल करना सुरक्षित है? घर के भीतर बिना तार वाला मोबाइल फोन इस्तेमाल करना सुरक्षित है। तार वाला लैंडलाइन नहीं — तार बिजली की धारा को इमारत के भीतर तक खींच लाता है।
क्या बिजली एक ही जगह दो बार गिर सकती है? हाँ। ऊँची चीजें — एफिल टावर, एम्पायर स्टेट बिल्डिंग, मोबाइल टावर — हर साल कई-कई बार मार खाती हैं। बिजली ज़मीन तक का सबसे छोटा रास्ता चुनती है, और ऊँची चीज वही रास्ता देती है।
बिजली और गरज में फर्क क्या है? बिजली वह विद्युत निर्वहन है जो आँख देखती है; गरज उस आवाज़ का नाम है जो लपट से अचानक गर्म हुई हवा के तेज़ी से फैलने पर पैदा होती है। रोशनी आवाज़ से तेज़ चलती है, इसलिए चमक पहले दिखती है और धमाका बाद में सुनाई देता है।
अपने शहर के लिए तूफान का खतरा कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन का घंटेवार पूर्वानुमान हर शहर के पन्ने पर वर्षा की संभावना और भीषण मौसम कोड (95–99 का मतलब गरज-तूफान) दिखाता है। देखिए पटना, कोलकाता, भोपाल, भुवनेश्वर और गुवाहाटी।