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मौसम पूर्वानुमान

उपग्रह, रडार और सुपरकंप्यूटर मॉडल के आधार पर आगे आने वाले मौसम का अनुमान — पाँच दिन का पूर्वानुमान लगभग 90 प्रतिशत मामलों में सही, सात दिन का लगभग 80 प्रतिशत मामलों में।

पूर्वानुमान

मौसम पूर्वानुमान क्या है?

मौसम पूर्वानुमान यानी किसी तय जगह और तय समय के लिए वायुमंडल की आगे की हालत का अनुमान — तापमान, बारिश, हवा की रफ़्तार, नमी और बादलों का घेरा। यह अंदाज़ा किसी एक यंत्र से नहीं निकलता, बल्कि तीन खंभों पर टिका है: इसी वक़्त का मौसम नापने वाले प्रेक्षण, यानी उपग्रह, ज़मीनी केंद्र, रडार, गुब्बारे, विमान और जहाज़; संख्यात्मक मौसम भविष्यवाणी के मॉडल, जो भौतिकी के समीकरणों से वायुमंडल को आगे की ओर चलाकर दिखाते हैं; और मौसम वैज्ञानिक, जो कच्चे नतीजे को अपने इलाक़े की जानकारी के साथ पढ़ते और सुधारते हैं।

दक्षिण एशिया में यह काम बाक़ी दुनिया से कहीं भारी पड़ता है, क्योंकि यहाँ मौसम सीधे ज़िंदगी से टकराता है। मानसून की चाल का असर पूरे इलाक़े पर पड़ता है, एक चक्रवात हज़ारों जानें ले सकता है, लू फ़सल भी झुलसाती है और बिजली की माँग भी एकदम से ऊपर उठा देती है, और सर्दियों में उत्तर भारत तथा पाकिस्तान के मैदानों में हवा की गुणवत्ता जन-स्वास्थ्य का सबसे बड़ा सवाल बन जाती है। यहाँ पूर्वानुमान शौक़ की चीज़ नहीं, रोज़ की ज़रूरत है।

प्रेक्षण से सुपरकंप्यूटर तक: छह सीढ़ियों का सफ़र

फ़ोन पर दिखने वाली एक छोटी-सी लाइन — “कल बारिश की संभावना 70 प्रतिशत” — के पीछे छह पड़ाव होते हैं, और ये चौबीसों घंटे चलते रहते हैं।

आँकड़े जुटाना। भूस्थिर उपग्रह INSAT-3D और ध्रुवीय कक्षा वाले उपग्रह ऊपर से बादल, तापमान और नमी की परतें नापते हैं। ज़मीन पर दुनिया भर में लगभग 10,000 मौसम केंद्र हैं, जिनमें 1,008 स्वचालित केंद्र अकेले भारत में IMD चलाता है। लगभग 800 जगहों से दिन में दो बार रेडियोसॉन्ड गुब्बारे छोड़े जाते हैं, और भारत के 38 से ज़्यादा डॉप्लर रडार तूफ़ान का भीतरी ढाँचा देखते हैं। ऊपर उड़ते विमानों से AMDAR प्रेक्षण तथा समुद्री बोया से पानी का तापमान और लहरें मिलती रहती हैं।

आँकड़ों का समावेशन। ये सारे प्रेक्षण हर छह घंटे पर मॉडल के भीतर डाले जाते हैं, ताकि गणना की शुरुआती तस्वीर असलियत के जितना क़रीब हो सके उतनी बने। ECMWF जिस 4D-Var तरीक़े पर चलता है, वह बीते कुछ घंटों के इतिहास को भी इसी काम में लगाता है।

संख्यात्मक गणना। ECMWF, GFS, JMA, UKMet और IMD के मॉडल द्रव-गतिकी तथा ऊष्मागतिकी के समीकरण हल करते हैं। ग्रिड का पैमाना इस काम का असली वज़न बताता है: ECMWF के 9 किमी वाले मॉडल में 137 ऊर्ध्वाधर स्तर, पूरी धरती पर 65,99,680 क्षैतिज ग्रिड बिंदु, और गणना का हर क़दम 450 सेकंड का। नतीजा 10 से 14 दिन तक निश्चित पूर्वानुमान के रूप में निकलता है; 30 से 46 दिन की बात सिर्फ़ एन्सेम्बल, यानी कई समांतर गणनाओं के समूह, के रूप में कही जाती है।

पश्च-प्रसंस्करण। कच्चा आउटपुट सीधे लोगों तक नहीं पहुँचता — पुराने स्थानीय रिकॉर्ड से उसका झुकाव ठीक होता है, प्रायिकता वाले आँकड़े बनते हैं (“बारिश की 70 प्रतिशत संभावना” इसी सीढ़ी की उपज है), कई मॉडल मिलाकर साझा उत्पाद तैयार होते हैं और छोटे इलाक़ों के लिए क्षेत्रीय मॉडल बारीक रिज़ॉल्यूशन पर अलग से चलता है।

इंसानी जाँच। गंभीर मौसम की हर चेतावनी हाथ से जाँची जाती है, और चक्रवात का रास्ता तथा उसकी ताक़त कई मॉडल साथ-साथ देखकर तय की जाती है।

प्रसारण। यहाँ से बात टीवी, रेडियो, अख़बार और मोबाइल ऐप तक, तथा विमानन, सेना, समुद्री कामकाज और खेती की अलग-अलग ब्रीफ़िंग तक पहुँचती है। मौसम ऑनलाइन Open-Meteo के ज़रिये ECMWF के आँकड़े लेकर हर शहर पृष्ठ पर घंटेवार और दैनिक पूर्वानुमान देता है, और पन्ना आँकड़े सीधे आपके ब्राउज़र में मँगाता है, इसलिए बीच में कोई सर्वर देर नहीं लगाता।

मौसम पूर्वानुमान भारत और दक्षिण एशिया में

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) की स्थापना 1875 में हुई थी और आज यह 38 से ज़्यादा डॉप्लर रडार चलाता है। विभाग शून्य से तीन घंटे तक के नाउकास्ट अलग से जारी करता है और उनके साथ पाँच दिन तक का पूर्वानुमान भी; उसकी गंभीर मौसम चेतावनियाँ राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) के सचेत ऐप के ज़रिये फ़ोन तक पहुँचती हैं, और मॉनसून मिशन तथा मिशन मौसम जैसे कार्यक्रम इसी गुणवत्ता को सुधारने के लिए बने हैं।

पाकिस्तान मौसम विभाग (PMD) अपना राष्ट्रीय रडार और मौसम केंद्रों का जाल चलाता है और चक्रवात तथा बाढ़ की चेतावनी जारी करता है। बांग्लादेश मौसम विभाग (BMD) चक्रवात के वे चेतावनी संकेत जारी करता है जिन्हें चक्रवात तैयारी कार्यक्रम आगे लोगों तक पहुँचाता है; 2020 में चक्रवात अम्फान के लिए बांग्लादेश ने 14,636 आश्रय केंद्र तैयार किए थे, और वहाँ निकासी की कारगर व्यवस्था ने लाखों जानें बचाई हैं। नेपाल का जल-विज्ञान एवं मौसम विज्ञान विभाग (DHM) मानसून के आगमन-वापसी पर नज़र रखता है तथा हिमनद झीलों के फटने की चेतावनी देता है, और भूटान, श्रीलंका तथा मालदीव अपनी-अपनी राष्ट्रीय सेवाएँ चलाते हैं।

इस इलाक़े के चार अहम पूर्वानुमानों की सटीकता इस तरह है:

किस फ़ैसले पर कितना भरोसा करें

सटीकता कोई एक अंक नहीं है; वह इस बात से बदलती है कि आप कितना आगे देख रहे हैं। इस बात को रोज़ के कामों पर लागू करके देखिए। “दफ़्तर जाते वक़्त भीगूँगा क्या” का जवाब घंटेवार पूर्वानुमान देता है, और एक से दो दिन आगे की बात पर पूरा भरोसा किया जा सकता है। सफ़र या किसी आयोजन की तारीख़ तय करनी हो तो पाँच दिन वाला पूर्वानुमान काम का है, और खुले में होने वाली शादी के लिए उसमें थोड़ी गुंजाइश और छोड़िए; सातवें दिन के ब्योरे पर दाँव मत लगाइए। खेती और कारोबार की योजना इससे ऊपर की परत पर बनती है — IMD का अप्रैल-मई वाला मानसून पूर्वानुमान बुआई के फ़ैसलों के लिए पढ़ा जाता है, तटीय कारोबार चक्रवात आउटलुक देखकर तैयारी करते हैं, और बिजली की ख़रीद मौसमी तापमान के अनुमान पर टिकती है।

गंभीर मौसम अलग दर्जे का मामला है: चक्रवात, बाढ़ और लू की सरकारी चेतावनी कभी हल्के में न लें। “वॉच” और “वॉर्निंग” का फ़र्क़ भी याद रखिए — वॉर्निंग का मतलब है ख़तरा सिर पर है, टालने का वक़्त नहीं बचा।

तितली, बादल फटना और पहाड़: चूक कहाँ से आती है

वायुमंडल अपनी बनावट में ही अराजक है: शुरुआती हालत की छोटी-सी ग़लती समय के साथ तेज़ी से बढ़ती जाती है, और इसी को तितली प्रभाव कहते हैं। लगभग दो हफ़्ते के बाद किसी एक मौसम घटना का अलग से अनुमान लगाना असंभव हो जाता है; उस दूरी पर सिर्फ़ वायुमंडल के सामान्य रुझान बताए जा सकते हैं।

कुछ चुनौतियाँ यहाँ बार-बार लौटती हैं। चक्रवात की ताक़त का अनुमान उसके रास्ते के अनुमान से आज भी ज़्यादा मुश्किल है। बादल फटने और संवहनी बारिश की जगह ठीक-ठीक बताना कठिन रहता है, क्योंकि ये घटनाएँ मॉडल के कोष्ठ से छोटी होती हैं। हिमालय और पश्चिमी घाट में ढलान का असर इतनी छोटी दूरी पर बदलता है कि मॉडल उसे पूरा नहीं पकड़ पाता, और समुद्री हवा का रोज़ का चक्र, शहरी ताप द्वीप तथा घाटियों में ठंडी हवा का जमाव भी इसी वजह से छूट जाते हैं। मैडेन-जूलियन दोलन (MJO) मानसून को प्रभावित करता है पर मॉडल में ठीक से नहीं बैठता।

भारत का मिशन मौसम कार्यक्रम, जिसका पहला चरण 2024-26 और दूसरा चरण 2026-31 का है, संख्यात्मक मौसम भविष्यवाणी के मॉडलों का रिज़ॉल्यूशन 12 किमी से बारीक करके 6 किमी तक लाने के लक्ष्य के साथ बनाया गया है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पूर्वानुमान कभी-कभी ग़लत क्यों निकल जाता है? वायुमंडल मूल रूप से अराजक है, इसलिए शुरुआत की छोटी ग़लतियाँ समय के साथ बड़ी होती जाती हैं। मॉडल का रिज़ॉल्यूशन तय कर देता है कि कितनी छोटी चीज़ पकड़ में आएगी — आँधी-तूफ़ान और पहाड़ी असर अक्सर इसी सीमा से बाहर रह जाते हैं, और दूर-दराज़ के इलाक़ों में प्रेक्षणों की कमी भी बनी रहती है। पाँच दिन का पूर्वानुमान लगभग 90 प्रतिशत मामलों में सही बैठता है और सात दिन का लगभग 80 प्रतिशत मामलों में; पूरी तरह सटीक भविष्यवाणी संभव ही नहीं है।

सबसे सटीक मौसम ऐप कौन-सा है? ECMWF पर आधारित पूर्वानुमान सबसे सटीक माने जाते हैं, और वे मौसम ऑनलाइन तथा Windy पर मिलते हैं; कच्चे आँकड़ों के लिए Open-Meteo और NOAA हैं। आधिकारिक चेतावनियों के लिए भारत में NDMA का सचेत, जिस पर IMD की चेतावनियाँ आती हैं, पाकिस्तान में PMD और बांग्लादेश में BMD देखिए।

मौसम का अनुमान कितने दिन आगे तक लगाया जा सकता है? अलग-अलग मौसम घटनाओं के लिए सात से दस दिन तक। आम रुझान चार से छह हफ़्ते आगे तक ECMWF के उप-मौसमी उत्पादों से मिल जाते हैं, और मौसमी औसत छह से बारह महीने आगे तक गतिकीय मौसमी मॉडलों से। दशकों की बात मौसम नहीं, जलवायु है, और वह जलवायु मॉडलों के दायरे में आती है।

क्या एआई पूर्वानुमान को बेहतर बना सकता है? हाँ, और काफ़ी तेज़ी से। Google का GraphCast, Huawei का Pangu-Weather और ECMWF का AIFS दिखा चुके हैं कि पुराने आँकड़ों पर प्रशिक्षित मॉडल कई पैमानों पर भौतिकी-आधारित मॉडलों के बराबर या उनसे आगे निकल सकते हैं। आगे का रास्ता संभवतः एआई और भौतिकी के मेल वाला होगा।

अपने शहर का पूर्वानुमान कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन के हर शहर पृष्ठ पर मौजूदा हालत हर घंटे अपडेट होती है, अगले 24 घंटे का घंटेवार और सात दिन का दैनिक पूर्वानुमान रहता है, साथ में AQI और ज़रूरत पड़ने पर लू, चक्रवात या तूफ़ान का अलर्ट भी। शुरुआत इनसे कीजिए: दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, कोलकाता, हैदराबाद, जयपुर और पटना।

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