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ओले

प्रचंड गरज वाले तूफ़ान से गिरने वाले बर्फ़ के ठोस गोले — मटर जितने (5 मिमी) से लेकर क्रिकेट गेंद जितने (61–75 मिमी) तक। खड़ी फ़सल, गाड़ियों और छतों को भारी नुक़सान पहुँचाते हैं।

मूल बातें

ओले क्या हैं?

मार्च से मई के बीच किसी तपे दिन के बाद आसमान गरजता है, और आँगन में बूँदों के साथ सफ़ेद कंकड़ उछलने लगते हैं, जबकि किसान खेत की ओर देखकर सहम जाता है। यही ओले हैं: बर्फ़ के ठोस गोले या बेडौल टुकड़े, जो सिर्फ़ प्रचंड गरज के साथ तूफ़ान से गिरते हैं। हिमपात, स्लीट या जमने वाली बारिश के उलट ये बादल के भीतर ऊपर-नीचे घूमकर मोटे होते हैं। इसके लिए बहुत तेज़ ऊर्ध्वधारा चाहिए, जो आमतौर पर सुपरसेल या ज़ोरदार बहु-कोशिका तूफ़ानों में ही मिलती है।

आकार मटर के दाने से लेकर, रिकॉर्ड मामलों में, 20 सेंटीमीटर से ऊपर यानी वॉलीबॉल तक जाता है। दुनिया का सबसे भारी दर्ज ओला 14 अप्रैल 1986 को बांग्लादेश के गोपालगंज में गिरा था। उसका वज़न 1.02 किलो था, एक छोटी ईंट से भी ज़्यादा, और उसी तूफ़ान ने 92 जानें ले लीं।

दक्षिण एशिया में ओले मानसून-पूर्व की नॉरवेस्टर आँधियों (काल बैसाखी) के साथ आते हैं, और कभी-कभार मानसून के प्रचंड तूफ़ानों के साथ भी। खेती के लिए यह बड़ा ख़तरा है: गेहूँ, सरसों, चना, सेब, आम और अंगूर के बाग़ और रबी की खड़ी फ़सल कुछ ही मिनटों में ज़मीन पर बिछ सकती है।

बादल के भीतर प्याज़ जैसी परतें कैसे चढ़ती हैं

बादल में ओले की ढलाई चार कच्चे माल से होती है, और चारों एक ही वक़्त, एक ही बादल में मौजूद होने चाहिए:

  1. गहरा कपासी वर्षा मेघ, जो हिमांक स्तर (5–6 किमी) से काफ़ी ऊपर तक खड़ा हो।
  2. कम से कम 50 km/h की ऊर्ध्वधारा, ताकि बर्फ़ के कण हवा में टँगे रह सकें।
  3. अतिशीतित पानी की भरपूर मात्रा — ऐसी बूँदें, जो 0°C से नीचे भी तरल बनी रहती हैं।
  4. वक़्त — बादल के भीतर आमतौर पर 5–10 मिनट।

सफ़र बादल के ठंडे ऊपरी हिस्से में एक नन्हे बीज, यानी छोटे हिम-क्रिस्टल या जमी बूँद से शुरू होता है। नीचे सरकते हुए यह अतिशीतित पानी से गुज़रता है, जो छूते ही इस पर जम जाता है। तभी ऊर्ध्वधारा इसे दोबारा ऊपर फेंक देती है, जहाँ एक और परत चढ़ती है। ऐसे कई फेरे प्याज़ जैसे गोल छल्ले बना देते हैं — ओले को बीच से काटें, तो ये छल्ले दिख जाते हैं। जब ओला इतना भारी हो जाए कि ऊर्ध्वधारा उसे थाम न सके, तब वह ज़मीन पर गिर पड़ता है। ऊर्ध्वधारा जितनी तेज़ होगी, तूफ़ान उतने ही बड़े ओले बना सकता है।

दक्षिण एशिया में ओले कहाँ सबसे ज़्यादा गिरते हैं

दक्षिण एशिया में ओलों के सबसे बड़े ठिकाने सिंधु-गंगा का मैदान और पूर्वी भारत हैं, ख़ासकर मार्च से मई के बीच। इन हफ़्तों में तीन हालात एक साथ जुटते हैं: ज़मीन का तापमान 35–42°C तक चढ़ जाता है, निचले स्तर पर बंगाल की खाड़ी की नमी भीतर घुसती है, और ऊपर बहती तेज़ पछुआ हवाएँ वायुमंडल को अस्थिर कर देती हैं।

बार-बार भारी ओलावृष्टि झेलने वाले इलाक़े:

2014 में विदर्भ पर फ़रवरी-मार्च में बेमौसम ओले गिरे; फ़सलों का नुक़सान लगभग 4,000 करोड़ रुपये आँका गया और कम से कम 28 लोगों की मौत हुई। 2023 में महाराष्ट्र की मानसून-पूर्व ओलावृष्टि ने अंगूर और आम की फ़सल लगभग साफ़ कर दी।

जलवायु परिवर्तन पर शोध के संकेत बेचैन करते हैं: गरम वायुमंडल में तगड़ी ऊर्ध्वधाराओं से कुछ इलाक़ों में ओले बड़े हो रहे हैं, ओलों का मौसम बेतरतीब होता जा रहा है और सर्दी व शुरुआती वसंत में बेमौसम ओले पहले से आम हैं, और उत्तर भारत तथा बांग्लादेश की मानसून-पूर्व ओलावृष्टि के आगे और तीखी होने का अनुमान है।

कंचे जितना या क्रिकेट गेंद जितना? आकार से टूट-फूट का अनुमान

रोज़मर्रा की चीज़ों से तुलना करके ओलों के अनुमानित आकार:

अमेरिकी बीमा रिकॉर्ड 2.5 सेमी (एक इंच) को वह दहलीज़ बताते हैं, जिसके ऊपर संपत्ति का नुक़सान गंभीर होने लगता है, यानी अखरोट वाली श्रेणी में ही।

बालियों, छतों और कारों पर ओलों की मार

सबसे भारी चोट खेती पर पड़ती है। फ़रवरी-मार्च 2014 में महाराष्ट्र के ओलों ने खड़े गेहूँ, ज्वार और चने को नुक़सान पहुँचाया।

खेत के बाहर चोट गाड़ियों और छतों पर पड़ती है। क्रिकेट गेंद जितने ओलों से गाड़ियों को गंभीर नुक़सान हो सकता है, छतों पर कंक्रीट की टाइलें चटकती हैं और धातु की चादरें पिचक जाती हैं।

भारत की प्रमुख फ़सल बीमा योजना, प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना (PMFBY), ओलों से हुआ नुक़सान कवर करती है, और यही भुगतान किसानों के इससे जुड़ने की एक बड़ी वजह है।

सिर पर ओले बरसें तो

  1. तुरंत किसी छत के नीचे पहुँचें। क्रिकेट गेंद जितना ओला सिर पर लगे, तो दिमाग़ी चोट हो सकती है।
  2. खुले मैदान से गाड़ी बेहतर है, पर उसे सड़क से हटाकर रोक दें, क्योंकि बौछार में आगे देखना मुश्किल हो जाता है।
  3. इमारत में खिड़कियों से दूर बैठें।
  4. बच्चों और बुज़ुर्गों को पहले सुरक्षित करें — ख़तरा उन्हीं को सबसे ज़्यादा है।
  5. थमने के बाद सड़क पर बिछी फिसलन भरी बर्फ़ से सावधान रहें।

खेत का बचाव पहले से होता है: मानसून-पूर्व के महीनों में नाज़ुक फ़सलों पर ओला-रोधी जाल, फ़सल बीमा, और IMD की गंभीर मौसम चेतावनियों पर नज़र।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

ओले ज़्यादातर गरम मौसम में क्यों गिरते हैं? ओलों को पालने वाली तेज़ ऊर्ध्वधारा आमतौर पर गरम मौसम के संवहन में बनती है। सर्दियों के बादल आमतौर पर इतने गहरे और उग्र नहीं होते कि बर्फ़ के कणों को बार-बार ऊपर उछाल सकें, हालाँकि कोई प्रबल पश्चिमी विक्षोभ सर्दी में भी ओले ला सकता है, जैसा जनवरी 2022 में उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में हुआ। दक्षिण एशिया में ओलों का मौसम मार्च से मई है, और नवंबर में भी इक्का-दुक्का घटनाएँ होती हैं।

क्या ओले छत पर लगे सोलर पैनल तोड़ सकते हैं? हाँ। अच्छे पैनल आमतौर पर 80 km/h से टकराते 25 मिमी के ओले झेलने के लिए परखे जाते हैं; इससे बड़े ओले दरार डाल सकते हैं, और जाल या सुरक्षा कवर यह जोखिम घटाते हैं।

बांग्लादेश और पूर्वी भारत पर ही इतनी मार क्यों पड़ती है? नीचे बंगाल की खाड़ी की नम हवा और ऊपर ठंडी, सूखी पछुआ हवा मिलकर वायुमंडल को बेहद अस्थिर बना देती हैं। नॉरवेस्टर के दिनों में संवहन के लिए उपलब्ध ऊर्जा, यानी CAPE, अक्सर 4,000 J/kg पार कर जाती है, और इसी से तेज़ ऊर्ध्वधाराएँ और ओले पनपते हैं।

क्या ओलावृष्टि को रोका जा सकता है? सिल्वर आयोडाइड से बादल-बीजन और ध्वनि-तोपें दशकों से आज़माई गई हैं, पर नतीजे मिले-जुले रहे और बड़े पैमाने पर कोई तरीक़ा वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हुआ। काम के उपाय बीमा, जाल और पक्के आसरे ही हैं।

मेरे शहर पर ओलों का ख़तरा कहाँ देखूँ? ओले बिना गरज के साथ तूफ़ान के नहीं गिरते, इसलिए असली संकेत तूफ़ान की चेतावनी है। मौसम ऑनलाइन के हर शहर-पन्ने पर बारिश का पूर्वानुमान और गंभीर मौसम के कोड दिखते हैं; कोड 95 से 99 के बीच हो, तो वह गरज के साथ तूफ़ान का है। आधिकारिक चेतावनी NDMA के सचेत ऐप पर आती है। कोलकाता, पटना, भोपाल, ढाका और लाहौर के पन्ने देखें।

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