बादलों से ज़मीन तक गिरने वाले पानी का हर रूप — बारिश, बूंदाबांदी, बर्फ़, स्लीट, ग्रॉपेल और ओले। हर रूप को मिलीमीटर में, तरल पानी की बराबर गहराई के हिसाब से नापा जाता है।
मूल बातेंवर्षा/बारिश क्या है?
मौसम विज्ञान में वर्षा का मतलब सिर्फ़ बारिश नहीं होता। यह शब्द उस हर चीज़ के लिए चलता है जो बादल से छूटकर ज़मीन तक पहुँचती है — तरल हो या जमी हुई। गिनती छह रूपों की होती है:
- बारिश — पानी की बूँदें, 0.5 मिमी से बड़ी।
- बूंदाबांदी — बहुत महीन बूँदें, 0.5 मिमी से छोटी।
- बर्फ़ — बर्फ़ के क्रिस्टल या उनके गुच्छे।
- स्लीट — जमी हुई बारिश की बूँदें, या आधी पिघली बर्फ़।
- ग्रॉपेल — नरम ओला; गोल बर्फ़ीली गोलियाँ।
- ओले — सख़्त बर्फ़ के गोले, जो तूफ़ानी बादल के ऊपर उठते प्रवाह में बार-बार चक्कर काटकर बड़े होते हैं।
जल चक्र में वर्षा लौटाने वाला हिस्सा है। समुद्र, झीलों और पौधों से पानी भाप बनकर ऊपर उठता है, हवा में तैरते बारीक कणों पर जमकर बादल बनाता है, और आख़िर में नीचे आता है। पूरी धरती पर यह चक्र हर साल क़रीब 5,05,000 घन किलोमीटर पानी इधर से उधर करता है।
दक्षिण एशिया में इनमें से रोज़ाना सामना एक ही रूप से होता है — बारिश। बर्फ़ यहाँ सिर्फ़ हिमालय में मायने रखती है, ओले मानसून-पूर्व तूफ़ानों के साथ आते हैं, बाक़ी रूप दुर्लभ हैं। इसीलिए हिंदी में “बारिश” और “वर्षा” एक-दूसरे की जगह चल जाते हैं।
बादल के भीतर बूँद कैसे बनती और गिरती है
बूँद बनने का नुस्ख़ा छह क़दमों का है, और हर क़दम अगले को तय करता है।
- नम हवा ऊपर उठती है — संवहन से, पहाड़ से टकराकर (ओरोग्राफ़िक लिफ़्ट), या ठंडी हवा के ऊपर गरम हवा चढ़ने से।
- ऊपर जाती हवा ठंडी होती है — जब तक हवा संतृप्त नहीं हो जाती, मोटे तौर पर हर किलोमीटर चढ़ाई पर 9.8 °C।
- जलवाष्प संघनित होती है — तापमान ओसांक तक गिरते ही भाप हवा के सूक्ष्म कणों पर जमने लगती है: धूल, पराग, कालिख, समुद्री नमक।
- नन्ही बूँदें बढ़ती हैं — गरम बादलों में आपस में टकराकर, ठंडे बादलों में बर्फ़-क्रिस्टल वाली बर्जेरॉन प्रक्रिया से।
- बूँद गिरने लायक़ भारी होती है — आमतौर पर तब, जब वह लगभग 100 माइक्रोमीटर या उससे बड़ी हो जाए।
- नीचे की परतें रूप तय करती हैं — गिरती बूँद जिन गरम या ठंडी परतों से गुज़रती है, वही तय करती हैं कि ज़मीन तक बारिश पहुँचेगी, स्लीट, बर्फ़ या ओला।
मिलीमीटर, रेन गेज और रडार: माप का तरीक़ा
वर्षा का हर रूप एक ही पैमाने पर दर्ज होता है — तरल-समतुल्य गहराई, मिलीमीटर में। ऐसा इसलिए, ताकि बारिश, बर्फ़ और ओलों को जोड़ा और आपस में तुलना की जा सके।
- 1 मिमी बारिश = प्रति वर्ग मीटर एक लीटर पानी।
- 10 मिमी बर्फ़ ≈ 1 मिमी बारिश (अनुपात क़रीब 10:1, पर यह बदलता रहता है)।
- ओलों को तौला जाता है और फिर उसी गहराई में बदल दिया जाता है।
उपकरण भी तय हैं। रेन गेज सिलिंडर या टिपिंग-बकेट सेंसर होते हैं। स्नो गेज गरम रखे जाते हैं, ताकि बर्फ़ पिघलकर तरल रूप में नपे। हेल पैड थर्मोकोल की प्लेटें हैं, जिन पर ओलों के गड्ढों का व्यास मापा जाता है। डॉप्लर रडार परावर्तकता से वर्षा की दर आँकता है, और उपग्रह पैसिव माइक्रोवेव (GPM) तथा दृश्य-इन्फ़्रारेड सेंसरों से वहाँ भी आँकड़ा देते हैं, जहाँ एक भी गेज नहीं लगा।
वर्षा/बारिश भारत और दक्षिण एशिया में
उपमहाद्वीप में वर्षा का फैलाव बेहद असमान है।
सबसे ज़्यादा पाने वाली जगहें:
- मासिनराम, मेघालय — 11,872 मिमी सालाना, जो धरती पर सबसे ऊँचे आँकड़ों में गिना जाता है।
- चेरापूंजी — 11,777 मिमी।
- पश्चिमी घाट के स्टेशन — 4,000 से 7,000 मिमी।
- तटीय बांग्लादेश — 3,000 से 4,000 मिमी।
सबसे कम पाने वाली जगहें:
- पश्चिमी राजस्थान — 100 से 300 मिमी।
- लद्दाख़ और तिब्बती पठार — 50 से 150 मिमी।
- बलूचिस्तान, पाकिस्तान — 100 से 250 मिमी।
- उत्तरी सिंध — 100 से 200 मिमी।
साल भर का बँटवारा भी उतना ही तीखा है। भारत की कुल वर्षा का 75 प्रतिशत जून से सितंबर के बीच गिरता है, यानी दक्षिण-पश्चिम मानसून में। अक्टूबर से दिसंबर के पूर्वोत्तर मानसून के हिस्से में 12 प्रतिशत आता है, मार्च से मई के मानसून-पूर्व मौसम में 10 प्रतिशत, और जनवरी-फ़रवरी की सर्दी में सिर्फ़ 3 प्रतिशत।
कुछ इलाक़े इस ढर्रे से हटकर चलते हैं। तमिलनाडु में असली बरसात अक्टूबर से दिसंबर का पूर्वोत्तर मानसून है। उत्तर-पश्चिमी हिमालय में सर्दियों की बर्फ़बारी पश्चिमी विक्षोभों से आती है और कुल हिसाब में उसका हिस्सा बड़ा है। मालदीव तथा श्रीलंका को दोनों मानसून पानी देते हैं।
रूपों की भौगोलिक तस्वीर भी साफ़ है। तटीय शहरों में बारिश साल भर मिलती है, भीतरी इलाक़ों में मानसून के महीनों में सिमट जाती है। बर्फ़ सर्दियों में कश्मीर, हिमाचल, लद्दाख़ और उत्तराखंड में गिरती है, सिक्किम तथा अरुणाचल की ऊँचाइयों पर, पाकिस्तान के स्कार्दू, गिलगित और मरी में, और भूटान के ऊँचे दर्रों पर। ओले नॉर्वेस्टर तूफ़ानों के साथ पूर्वी भारत, बांग्लादेश और पूर्वी मध्य प्रदेश में आम हैं। स्लीट कश्मीर में सर्दी के आख़िर में कभी-कभार दिखती है, ग्रॉपेल पहाड़ी स्टेशनों के ठंडे तूफ़ानों में, और जमा देने वाली बारिश बेहद दुर्लभ है।
खेत, भूजल और ओलों का नुक़सान
ज़मीन पर गिरने के बाद पानी तीन रास्ते बाँट लेता है। कुछ हिस्सा सतह पर बहकर नदियों तक जाता है, कुछ मिट्टी में रिसकर भूजल भरता है, बाक़ी भाप बनकर या पौधों के ज़रिए लौट जाता है। यह बँटवारा मिट्टी, ढलान, वनस्पति और बारिश की तीव्रता के साथ बहुत बदलता है — उतनी ही मात्रा कुछ घंटों में गिरे तो ज़्यादातर बह जाती है, कई दिनों में बँटकर गिरे तो कुएँ और बोरवेल तक पहुँचती है। भारत में बारिश, बर्फ़बारी और ग्लेशियरों के पिघलने से हर साल क़रीब 4,000 अरब घन मीटर पानी आता है; भाप बनकर और पौधों के वाष्पोत्सर्जन से होने वाले नुक़सान के बाद उपलब्ध पानी लगभग 1,869 अरब घन मीटर आँका गया है।
भारत के किसान के लिए असली चुनौती वही 75 प्रतिशत वाला आँकड़ा है। साल का तीन-चौथाई पानी चार महीनों में आता है, इसलिए बुआई, सिंचाई और कटाई का पूरा कैलेंडर उसी खिड़की से बँधा है। जहाँ सालाना आँकड़ा 100 से 300 मिमी के बीच रहता है, जैसे पश्चिमी राजस्थान में, वहाँ यह खिड़की और सँकरी पड़ जाती है।
ओले अलग किस्म का नुक़सान करते हैं, और उनका समय सबसे बुरा होता है। नॉर्वेस्टर तूफ़ान हर साल पूर्वी भारत, बांग्लादेश और पूर्वी मध्य प्रदेश में खड़ी फ़सल को चोट पहुँचाते हैं — ठीक तब, जब वह कटने के क़रीब होती है।
पूर्वानुमान कितनी दूर तक और कितना सही
हर समय-पैमाने का अपना औज़ार है।
- संख्यात्मक मौसम मॉडल (ECMWF, GFS और भारत का NCMRWF) एक से दस दिन तक देखते हैं।
- नाउकास्टिंग अगले शून्य से छह घंटे के लिए होती है और डॉप्लर रडार पर टिकी है।
- उप-मौसमी से मौसमी (S2S) पूर्वानुमान दो से छह हफ़्ते आगे तक जाते हैं।
- मौसमी मानसून पूर्वानुमान हर वसंत में IMD, ECMWF और NOAA जारी करते हैं।
पूर्वानुमान की सटीकता बीते सालों में बहुत बढ़ी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
वर्षा और बारिश में फ़र्क़ क्या है? वर्षा में सभी रूप शामिल हैं — बारिश, बर्फ़, स्लीट, ओले और बाक़ी। बारिश सिर्फ़ तरल पानी के लिए है। उष्णकटिबंधीय दक्षिण एशिया में दोनों लगभग एक ही बात हैं, पर पहाड़ी इलाक़ों की बात करते समय सही शब्द वर्षा ही है।
ऐप पर दिखने वाली “बारिश की संभावना” का मतलब क्या है? यह संभावना कि तय समय-खंड में किसी एक जगह पर नापने लायक़ वर्षा, यानी 0.1 मिमी या उससे ज़्यादा, गिरेगी। छह घंटे के लिए 60 प्रतिशत का अर्थ हुआ कि क्षेत्र की किसी भी जगह बारिश पड़ने की 60 प्रतिशत संभावना है — यह नहीं कि 60 प्रतिशत इलाक़ा भीगेगा।
बर्फ़ को मिलीमीटर में कैसे गिना जाता है? पिघलाकर, तरल-समतुल्य गहराई में। मोटे तौर पर 10 मिमी बर्फ़ से 1 मिमी पानी बनता है, हालाँकि यह अनुपात बदलता रहता है। स्नो गेज को गरम इसी वजह से रखा जाता है।
चेरापूंजी में इतनी बारिश क्यों होती है? चेरापूंजी खासी पहाड़ियों के दक्षिणी किनारे पर है और बंगाल की खाड़ी से आने वाली नम मानसूनी हवाओं के सामने पड़ता है। हवाओं को वहाँ तेज़ी से ऊपर चढ़ना पड़ता है और वे एक पतली पट्टी में भारी मात्रा में पानी छोड़ देती हैं। इस ओरोग्राफ़िक बढ़ोतरी से वर्षा आसपास के मैदानों के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा हो जाती है।
अपने शहर की बारिश का पूर्वानुमान कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर घंटेवार और दिनवार वर्षा का पूर्वानुमान दिखाता है। शुरुआत इनसे कर सकते हैं: मुंबई, चेन्नई, कोच्चि, गुवाहाटी, जयपुर और भुवनेश्वर।