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वर्षा

बादलों से गिरकर ज़मीन तक पहुँचने वाला तरल पानी, जिसे मिलीमीटर (mm) में नापा जाता है। 1 मिमी बारिश का मतलब है एक वर्ग मीटर ज़मीन पर एक लीटर पानी।

मूल बातें

वर्षा क्या है?

बादल में बनी पानी की बूँदें जब इतनी भारी हो जाती हैं कि हवा उन्हें थाम नहीं पाती, तो वे नीचे गिरती हैं और ज़मीन तक पहुँचती हैं। यही वर्षा है — अवक्षेपण (precipitation) का तरल रूप। इसे मिलीमीटर में नापा जाता है, और यह मिलीमीटर उस पानी की गहराई बताता है जो किसी बिलकुल समतल और पानी न सोखने वाली सतह पर जमा हो जाता, बशर्ते न वह बहकर निकलता और न भाप बनकर उड़ता।

रोज़मर्रा की भाषा में समझें तो 1 मिमी बारिश का मतलब है हर वर्ग मीटर पर एक लीटर पानी। एक हेक्टेयर खेत पर वही 1 मिमी दस हज़ार लीटर बैठता है, और एक वर्ग किलोमीटर पर दस लाख लीटर।

दक्षिण एशिया में यह आँकड़ा किसी और मौसमी संख्या जैसा नहीं है। पीने का पानी, सिंचाई, पनबिजली, भूजल का रिचार्ज, नदियों का बहाव, जंगल और खेती की कमाई — सब इसी पर टिके हैं। दक्षिण-पश्चिम मानसून से बनने वाला बारिश का सालाना ढर्रा पूरे क्षेत्र का कैलेंडर, उसकी अर्थव्यवस्था और रहन-सहन तय करता है।

एक मिलीमीटर कौन और कैसे गिनता है

नापने का बुनियादी औज़ार वर्षामापी (rain gauge) है — एक बेलन जिसके ऊपर तय क्षेत्रफल वाली कीप लगी होती है और जो एक निश्चित अंतराल में गिरा पानी इकट्ठा करती है। भारत में यह अंतराल आमतौर पर 24 घंटे का होता है, स्थानीय समय के अनुसार सुबह 8:30 बजे से अगली सुबह 8:30 बजे तक। इसी वजह से “कल की बारिश” का सरकारी आँकड़ा आधी रात से आधी रात तक का नहीं होता। नए स्वचालित वर्षामापी एक-एक मिनट का रिकॉर्ड रखते हैं।

भारत का मापन नेटवर्क कुछ इस तरह काम करता है:

बड़े शहरों में लगे डॉप्लर मौसम रडार 200 से 400 किलोमीटर के दायरे में उसी समय बारिश का अंदाज़ा लगाते हैं। GPM, IMERG और INSAT-3D जैसे उपग्रह-आधारित अनुमान वहाँ भी आँकड़ा देते हैं जहाँ ज़मीन पर कोई यंत्र मौजूद नहीं।

हल्की, भारी और अति भारी: IMD की सीढ़ी

24 घंटे के कुल के हिसाब से भारत मौसम विज्ञान विभाग बारिश को इन श्रेणियों में बाँटता है:

श्रेणी24 घंटे का कुल
बारिश नहीं0 मिमी
बहुत हल्की वर्षा0.1–2.4 मिमी
हल्की वर्षा2.5–15.5 मिमी
मध्यम वर्षा15.6–64.4 मिमी
भारी वर्षा64.5–115.5 मिमी
बहुत भारी वर्षा115.6–204.4 मिमी
अति भारी वर्षा204.5 मिमी या उससे ज़्यादा

सीढ़ी का सबसे ऊपरी पायदान भी कितना छोटा पड़ सकता है, यह 2005 के मुंबई मेघ-प्रस्फोट से समझ आता है: 24 घंटे में 944 मिमी, यानी “अति भारी” की सीमा से कहीं ऊपर।

घंटे के हिसाब से पैमाना अलग चलता है — 2.5 मिमी प्रति घंटे से कम हल्की, 2.5 से 10 मिमी मध्यम, 10 से 50 मिमी भारी, और 100 मिमी प्रति घंटे से ऊपर मेघ-प्रस्फोट (cloudburst)। दो अलग पैमाने होने का नतीजा यह है कि एक ही दिन को घंटे के हिसाब से “भारी” और पूरे दिन के हिसाब से “मध्यम” कहा जा सकता है। मोबाइल पर आने वाली चेतावनी और अख़बार में छपा आँकड़ा इसीलिए कभी-कभी एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।

वर्षा भारत और दक्षिण एशिया में

एक ही उपमहाद्वीप के भीतर बारिश का फ़र्क़ इतना बड़ा है कि दो शहरों की सीधी तुलना बेमानी हो जाती है।

सबसे गीली जगहें:

सबसे सूखी जगहें:

इलाक़े के हिसाब से भारत का सालाना औसत भी उतना ही बँटा हुआ है: पूर्वोत्तर में 1,500 से 3,000 मिमी, कोंकण और पश्चिमी घाट में 2,500 से 6,000 मिमी, सिंधु-गंगा के मैदान में 700 से 1,500 मिमी, उत्तर-पश्चिम यानी राजस्थान और गुजरात में 200 से 500 मिमी, और कर्नाटक, आंध्र प्रदेश व तमिलनाडु के भीतरी हिस्सों में 600 से 1,000 मिमी।

साल भर में यह पानी कब गिरता है, इसका ढर्रा भी तय है। सर्दी के जनवरी-फ़रवरी में लगभग 3% बारिश होती है, मार्च से मई के प्री-मानसून में लगभग 10%, जून से सितंबर के दक्षिण-पश्चिम मानसून में लगभग 75%, और अक्टूबर से दिसंबर के पोस्ट-मानसून में लगभग 12%। तीन-चौथाई पानी केवल चार महीनों में गिरने का सीधा अर्थ यह है कि पूरे साल की जल सुरक्षा जून से सितंबर के प्रदर्शन पर टिकी रहती है।

पहाड़ तय करते हैं कि पानी कहाँ गिरेगा

नमी से लदी मानसूनी हवाएँ जब पश्चिमी घाट या हिमालय से टकराती हैं, उन्हें ऊपर चढ़ना पड़ता है। ऊपर उठती हवा ठंडी होती जाती है और अपनी नमी हवा की दिशा वाली ढलान पर उड़ेल देती है। महाबलेश्वर और मेघालय की पहाड़ियों के हज़ारों मिलीमीटर इसी ऊर्ध्व धक्के का नतीजा हैं।

पहाड़ की दूसरी तरफ़ कहानी उलट जाती है। हवा की ओट में उतरती वही हवा सूख चुकी होती है, इसलिए महाराष्ट्र का भीतरी इलाक़ा, कर्नाटक का भीतरी हिस्सा और तिब्बत “वृष्टि छाया” में बैठे रहते हैं और वहाँ कहीं कम पानी गिरता है।

खेत, जलाशय और बीमा: आँकड़ा किस पर भारी पड़ता है

खरीफ़ की बुवाई मानसून के आने की तारीख़ और मौसम के कुल आँकड़े से बँधी होती है, इसलिए वर्षामापी का रिकॉर्ड किसान के लिए काग़ज़ी नहीं, नक़द मामला है। जलाशयों के जलग्रहण क्षेत्र में कितना पानी गिरा, इससे तय होता है कि साल भर कितनी पनबिजली बनेगी और नहरों में कितना पानी छोड़ा जा सकेगा।

एक घंटे और 24 घंटे के भारी आँकड़े अचानक आने वाली बाढ़ की वजह बनते हैं। उल्टी तरफ़, हफ़्तों तक जमा होती कमी सूखे की घोषणा तक ले जाती है। चक्रवात के साथ गिरा कुल पानी यह तय करता है कि नुक़सान तट तक सीमित रहेगा या भीतरी ज़िलों तक बाढ़ पहुँचेगी। फ़सल बीमा के भुगतान भी तय मिलीमीटर की सीमा पार होने पर ही शुरू होते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

1 मिमी बारिश तो बहुत कम लगती है, फिर इसका मतलब क्या? सुनने में यह मामूली लगती है, लेकिन एक हेक्टेयर खेत पर 1 मिमी का मतलब दस हज़ार लीटर पानी है। किसी छोटे शहर के 100 वर्ग किलोमीटर के जलग्रहण क्षेत्र पर वही 1 मिमी दस करोड़ लीटर बन जाता है। रोज़ के छोटे आँकड़े जुड़कर बहुत बड़ा पानी बनाते हैं।

“ट्रेस” वर्षा किसे कहते हैं? 24 घंटे में 0.1 मिमी से कम बारिश को ट्रेस कहा जाता है। दर्ज तो की जाती है, पर वर्षामापी में भरने लायक़ नहीं होती। आमतौर पर यह हल्की फुहार या कोहरे से टपकती बूँदों का नतीजा होती है।

बारिश का विश्व रिकॉर्ड कितना है? 24 घंटे का विश्व रिकॉर्ड रेयूनियों के फ़ॉक-फ़ॉक में जनवरी 1966 में चक्रवात डेनिस के दौरान दर्ज 1,825 मिमी है। मुंबई का रिकॉर्ड 944 मिमी है, जो 26 जुलाई 2005 को दर्ज हुआ। एक घंटे का रिकॉर्ड अमेरिका के होल्ट, मिसूरी में 1947 में दर्ज 305 मिमी है।

एक ही दिन की बारिश कहीं “भारी” और कहीं “मध्यम” क्यों बताई जाती है? क्योंकि घंटे का पैमाना और 24 घंटे का पैमाना अलग हैं। दोपहर में एक घंटे की 30 मिमी बारिश घंटे के हिसाब से “भारी” श्रेणी में आती है, पर अगर बाक़ी पूरा दिन सूखा रहा तो दिन भर का कुल “मध्यम” की सीमा में ही रहेगा। आँकड़ा पढ़ते समय यह देखना ज़रूरी है कि वह किस अवधि का है।

अपने शहर की ताज़ा बारिश कहाँ देखें? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर मौजूदा और आने वाले 7 दिन की वर्षा दिखाता है। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पटना, गुवाहाटी, कोच्चि और भुवनेश्वर के पन्ने इसी तरह खुलते हैं।

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