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जल चक्र

समुद्र, हवा, ज़मीन और नदियों के बीच पानी का कभी न रुकने वाला फेरा — भाप बनकर उठना, बादल बनना, बरसना और बहकर लौट जाना। सारा मौसम और सारा जीवन इसी फेरे पर टिका है।

मूल बातें

जल चक्र क्या है?

मानसून की किसी शाम छत पर टपकी बूँद कुछ ही दिन पहले शायद बंगाल की खाड़ी की लहरों पर डोल रही थी। जल चक्र (हाइड्रोलॉजिकल चक्र) पानी की इसी अनवरत आवाजाही का नाम है — महासागरों, वायुमंडल, ज़मीन, बर्फ़ और भूजल के बीच। इसे घुमाने वाली ताक़त लगभग पूरी तरह सूरज की ऊर्जा है, और मौसम, खेती व पीने का पानी सब इसी के भरोसे हैं।

हर साल क़रीब 5,05,000 घन किलोमीटर पानी यह फेरा पूरा करता है। इसमें 4,34,000 घन किलोमीटर (86%) समुद्रों से भाप बनकर उठता है और 71,000 घन किलोमीटर (14%) ज़मीन से, मिट्टी और पौधों के रास्ते। उतना ही पानी वर्षा बनकर लौटता है। हवा के रास्ते लगभग 46,000 घन किलोमीटर पानी हर साल समुद्र से ज़मीन की ओर खिसकता है, और नदियाँ उतना ही वापस समुद्र को सौंपकर खाता बराबर करती हैं।

उपमहाद्वीप में इस चक्र की सालाना धड़कन का नाम दक्षिण-पश्चिम मानसून है। चार महीनों में हिंद महासागर अनुमानतः 3,000 घन किलोमीटर जलवाष्प एशिया की ज़मीन की ओर भेजता है, और वही नमी बारिश बनकर बरसती है, जिसके भरोसे पूरे क्षेत्र का जीवन चलता है।

भाप से नदी तक: पानी के छह पड़ाव

पहला — वाष्पीकरण। धूप समुद्र, झील और नदी की सतह तपाती है, और पानी के अणुओं को इतनी ऊर्जा मिल जाती है कि वे सतह छोड़कर भाप के रूप में हवा में निकल जाते हैं। दुनिया भर के महासागरों से औसतन हर साल लगभग 1.2 मीटर पानी उड़ता है; बंगाल की खाड़ी में यह दर लगभग 1.66 मीटर सालाना है (सेनगुप्ता व अन्य, 2006)। गरम पानी के ऊपर कम नमी वाली हवा हो, तो वाष्पीकरण तेज़ होता है।

दूसरा — वाष्पोत्सर्जन। पौधे पत्तियों के महीन छिद्रों (स्टोमेटा) से जलवाष्प छोड़ते हैं। सतह की भाप और पौधों से निकली इस भाप को मिलाकर वाष्प-वाष्पोत्सर्जन कहते हैं। अमेज़न, पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर भारत के जंगल इसी रास्ते भारी मात्रा में पानी आसमान में लौटाते हैं।

तीसरा — संघनन। ऊपर चढ़ती सूखी हवा हर किलोमीटर पर लगभग 10 °C ठंडी होती है। तापमान ओसांक तक गिरते ही भाप हवा में तैरते बारीक कणों (एरोसोल) पर संघनित होकर बादल की बूँदें बनाती है। बादल के एक घन मीटर में 0.5 से 5 ग्राम तक तरल पानी होता है।

चौथा — ढुलाई। हवाएँ बादलों को कभी-कभी हज़ारों किलोमीटर ढो ले जाती हैं। बंगाल की खाड़ी की नमी पूर्वोत्तर भारत के चेरापूंजी तक पहुँचती है, और अटलांटिक की नमी पश्चिम अफ़्रीकी मानसून के सहारे साहेल तक पहुँचती है।

पाँचवाँ — वर्षा। बादल की बूँदें धीरे-धीरे बड़ी होती रहती हैं; जब उनका वज़न ऊपर उठती हवा के धक्के पर भारी पड़ने लगता है, तो वे बारिश, बर्फ़, स्लीट या ओले बनकर नीचे आती हैं। आसमान से गिरने वाले इस सारे पानी को वर्षा/बारिश कहते हैं; पूरी पृथ्वी पर इसका सालाना औसत क़रीब 1,000 मिमी है।

छठा — बहाव और रिसाव। गिरे पानी का एक हिस्सा बहकर नदियों में जाता है, कुछ मिट्टी में रिसकर भूजल भरता है, और शेष तुरंत भाप बन जाता है या पौधों के रास्ते फिर हवा में लौट जाता है। नदियाँ इसे समुद्र तक पहुँचाकर फेरा पूरा करती हैं।

चार महीने भराई, आठ महीने खिंचाई: उपमहाद्वीप का जल-हिसाब

अक्टूबर से मई तक निकासी का दौर है। भाप ज़ोरों से उठती है, पर बारिश कम होती है, और ज़मीन अपनी नमी हवा को सौंपती रहती है। जलाशय उतरते हैं, भूजल नीचे खिसकता है और सूखे का दबाव जमा होता जाता है।

जून से सितंबर में तस्वीर उलट जाती है। हिंद महासागर से नमी का भारी आयात होता है और भारत की सालाना बारिश का लगभग 75% इन्हीं चार महीनों में गिरता है। सिंधु-गंगा के मैदान को इस दौरान 700 से 1,500 मिमी पानी मिलता है, जबकि चेरापूंजी और मासिनराम में सालाना 11,000 से 12,000 मिमी बरसता है — ये धरती की सबसे गीली जगहों में गिनी जाती हैं। जलाशय भरते हैं, भूजल फिर से भरता है, नदियाँ लबालब बहती हैं।

अक्टूबर से दिसंबर के बीच बंगाल की खाड़ी के चक्रवात पूर्वी तट पर अतिरिक्त बारिश लाते हैं, और सर्दियाँ शुरू होते समय जलाशय लगभग पूरे भरे रहते हैं।

लौटते पानी का एक बड़ा रास्ता अकेली गंगा है, जो औसतन क़रीब 12,000 घन मीटर प्रति सेकंड, यानी साल में लगभग 380 घन किलोमीटर पानी बंगाल की खाड़ी में उड़ेलती है। भराई और खिंचाई का यही तीखा अंतर मानसून के चूकने को इतना ख़तरनाक बनाता है: एक भराई कमज़ोर रही, तो आठ महीने उसी कम पूँजी पर कटते हैं।

बोरवेल, बाँध और कंक्रीट: इंसान ने फेरे को कैसे मोड़ा

कुछ बदलाव सीधे हमारे हाथ के हैं। दुनिया भर में 62,000 से ज़्यादा बड़े बाँध नदियों के बहाव का समय बदल चुके हैं। भारत के कई राज्यों में भूजल हर साल 10 से 30 सेंटीमीटर नीचे जा रहा है। मीठे पानी की कुल खपत का 70% सिंचाई लेती है, जो नदी या भूजल का पानी खेतों के रास्ते हवा तक पहुँचा देती है। शहरों का कंक्रीट बारिश को ज़मीन में उतरने नहीं देता, इसलिए सतह पर बहता पानी बढ़ता है। कटते जंगल वाष्पोत्सर्जन घटाते हैं और स्थानीय बारिश का ढर्रा बदल देते हैं।

बाक़ी बदलाव गरम होती हवा से आ रहे हैं। तापमान हर एक डिग्री सेल्सियस बढ़ने पर हवा क़रीब 7% ज़्यादा नमी थाम सकती है। साथ ही, तूफ़ान आने पर बरसात ज़्यादा ज़ोर से होती है, और दो बरसातों के बीच सूखे दिन लंबे होते जाते हैं। पिघलते ग्लेशियर नदियों में पानी आने का समय बदलते हैं, पिघली बर्फ़ और गरम होकर फैलते पानी से समुद्र-तल चढ़ता है, और लू में भाप बनकर उड़ने वाला पानी बढ़ता है।

भारत की जल-सुरक्षा के लिए मतलब साफ़ है। कुल बारिश बढ़ सकती है, लेकिन वह गिनती में कम पर ज़्यादा तेज़ बौछारों में आ सकती है और बीच में लंबे सूखे छोड़ सकती है। यह दोहरी चुनौती है: बाढ़ से निपटना भी कठिन होता जाता है और सूखे से भी।

समुद्र में ढेर, हवा में मुट्ठी भर: पानी कहाँ टिका है

किसी भी पल पृथ्वी का पानी बेहद असमान बँटा होता है:

हवा में टिका पानी धरती की केवल एक हफ़्ते की वर्षा जितना है, फिर भी वायुमंडल से गुज़रने वाला प्रवाह विशाल है, क्योंकि हवा की जलवाष्प औसतन 8 से 10 दिन में ही आगे निकल जाती है और उसकी जगह नई भाप ले लेती है।

मौसम के संख्यात्मक मॉडल (NWP) इसी आवाजाही का बारीकी से हिसाब लगाते हैं: मिट्टी की नमी, वनस्पति और तापमान से सतह का वाष्प-वाष्पोत्सर्जन, बादल-सूक्ष्मभौतिकी से बूँदों और बर्फ़ के कणों की बढ़त, और उसी से बारिश। ज़मीन और वायुमंडल को जोड़ने वाले मॉडल बहाव और मिट्टी की नमी का हिसाब भी रखते हैं। जल चक्र को और सटीक पकड़ना मौसम-मॉडल के विकास का एक सक्रिय मोर्चा है, और Open-Meteo व ECMWF को इन लगातार सुधारों का लाभ मिलता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पानी का एक अणु हवा में कितने दिन रहता है? औसतन 8 से 10 दिन। उठना, उड़ना, संघनित होना और बरसना — पूरा सिलसिला कुछ ही दिनों का है।

गरम हवा में इतनी नमी क्यों होती है? भाप थामने की क्षमता तापमान तय करता है। 0 °C पर संतृप्त हवा में लगभग 4.85 ग्राम प्रति घन मीटर जलवाष्प होती है, 30 °C पर 30.4 ग्राम — क़रीब छह गुना। उष्णकटिबंधीय उमस और मानसूनी बौछारों की तीव्रता की जड़ यही है।

क्या जल चक्र नया पानी बनाता है? नहीं, वह मौजूदा पानी को एक भंडार से दूसरे में खिसकाता भर है। अरबों वर्षों से धरती का कुल पानी लगभग स्थिर है; ज्वालामुखियों से थोड़ा जुड़ता है, बहुत थोड़ा अंतरिक्ष में खोता है। डायनासोरों ने जो पानी पिया, उसके अणु आज भी घूम रहे हैं।

धरती का ज़्यादातर पानी कहाँ है, और उसमें इंसान के काम का कितना है? लगभग सारा पानी समुद्र में है और बाक़ी का बड़ा हिस्सा बर्फ़ में बंद है, ज़्यादातर ध्रुवों पर। भूजल, झीलें और नदियाँ मिलकर भी समुद्र और बर्फ़ के आगे मामूली हिस्सा हैं। इंसान के इस्तेमाल लायक़ मीठा पानी पूरे भंडार का बहुत छोटा टुकड़ा भर है।

जल चक्र का अगला पड़ाव अपने शहर के लिए कहाँ देखूँ? फेरे का वह हिस्सा जो आपकी छत पर उतरने वाला है, शहर के पन्ने पर दिखता है: वहाँ आज के मौसम के साथ अगले सात दिनों का वर्षा पूर्वानुमान रहता है। मुंबई, चेन्नई और कोलकाता के पन्ने साथ-साथ खोलकर देखिए कि एक ही हफ़्ते में अलग-अलग इलाक़ों पर बादल कितना अलग बरसते हैं।

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