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बर्फ़

बादल से गिरने वाली जमी हुई वर्षा, जो बर्फ़ के क्रिस्टल के रूप में नीचे आती है। दिसंबर से मार्च तक हिमालय, काराकोरम और हिंदूकुश इसी से ढके रहते हैं, और यही परत दक्षिण एशिया की नदियों के लिए बेहद अहम है।

मूल बातें

बर्फ़ क्या है?

बर्फ़ जमी हुई बारिश नहीं है। बादल के जिस हिस्से में तापमान हिमांक से नीचे रहता है, वहाँ जलवाष्प तरल बने बिना सीधे बारीक बर्फ़ीले क्रिस्टलों पर जमती जाती है और हर क्रिस्टल धीरे-धीरे बड़ा होता जाता है। ऐसे कई क्रिस्टल आपस में उलझकर वह हल्का गुच्छा बनाते हैं जिसे हम गिरता हुआ फाहा कहते हैं।

ज़मीन तक वह फाहा बचेगा या नहीं, यह बादल और सतह के बीच पड़ी पूरी हवा तय करती है। पूरा स्तंभ हिमांक से नीचे रहा तो क्रिस्टल जस के तस नीचे पहुँचते हैं और बर्फ़ गिरती है। बीच में कोई गरम परत मिल गई तो वे आधे पिघलते हैं — वही स्लीट है। परत मोटी या ज़्यादा गरम हुई तो क्रिस्टल पूरे पिघल जाते हैं और नीचे सिर्फ़ बारिश पहुँचती है। इतने से ही तय हो जाता है कि पहाड़ी सड़क सफ़ेद होगी या सिर्फ़ गीली।

दक्षिण एशिया के लिए बर्फ़ दूर की चीज़ नहीं, पानी की बुनियाद है। हर सर्दी यह हिमालय (कश्मीर, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम, अरुणाचल, नेपाल, भूटान), काराकोरम (गिलगित-बाल्टिस्तान, हुंज़ा), हिंदूकुश (ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा, अफ़ग़ानिस्तान) और तिब्बती पठार पर जमा होती है। यही परत, ग्लेशियरों के पिघलाव के साथ मिलकर, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र घाटियों को पानी देती है, और उस पानी पर एक अरब से ज़्यादा लोग पीने, सिंचाई तथा पनबिजली के लिए निर्भर हैं। हर नदी इस पिघले पानी पर कितनी टिकी है, इसमें बड़ा फ़र्क़ है: सिंधु के लिए यह बेहद अहम है, ब्रह्मपुत्र के लिए अहम, और गंगा के लिए इसकी भूमिका मामूली ही है।

पश्चिम से आई हवा, और मिलीमीटर में गिनी गई बर्फ़ और बारिश

पश्चिमी हिमालय की ज़्यादातर बर्फ़ मानसून की देन नहीं है। उसे पश्चिमी विक्षोभ लाते हैं — मध्य-अक्षांश के कम दबाव वाले तंत्र, जो भूमध्य सागर के ऊपर या उससे और पूर्व में बनते हैं, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान पार करते हैं, और फिर पाकिस्तान तथा उत्तर भारत पर अपनी नमी छोड़ देते हैं। सर्दी भर इनकी एक के बाद एक आवाजाही ही तय करती है कि उस साल पहाड़ों पर कितनी परत चढ़ेगी।

वर्षा के हिसाब में बर्फ़ की गिनती मोटाई से नहीं होती। उसे पिघलाकर उसके बराबर पानी की गहराई में नापा जाता है, क्योंकि भुरभुरी और दबी हुई बर्फ़ की एक ही मोटाई से पानी अलग-अलग निकलता है। पर पहाड़ी केंद्रों के लिए जो सालाना आँकड़े मिलते हैं, वे सिर्फ़ बर्फ़ के नहीं, बल्कि बारिश और बर्फ़ मिलाकर हर रूप में साल भर गिरी कुल वर्षा के हैं: गुलमर्ग (जम्मू-कश्मीर) में 1,449.2 मिमी, स्कर्दू (पाकिस्तान) में लगभग 222 मिमी और शिमला (हिमाचल) में 1,487.3 मिमी।

बर्फ़ भारत और दक्षिण एशिया में

भारत में सबसे भारी बर्फ़बारी कश्मीर घाटी के हिस्से आती है — श्रीनगर, गुलमर्ग और पहलगाम में दिसंबर से फ़रवरी तक। हिमाचल में मनाली, शिमला, धर्मशाला और कुल्लू को मध्यम से भारी बर्फ़ मिलती है; उत्तराखंड में औली, मसूरी, मुनस्यारी और चोपता मध्यम श्रेणी में आते हैं; सिक्किम में लाचेन, लाचुंग और नाथूला मध्यम से भारी; और अरुणाचल में तवांग तथा सेला दर्रा भारी। बहुत ऊँचे दर्रों पर बाक़ी महीनों में भी छिटपुट बौछारें पड़ जाती हैं।

पाकिस्तान में गिलगित-बाल्टिस्तान — स्कर्दू, हुंज़ा और ख़प्लू — के ऊँचे पहाड़ों पर भारी बर्फ़ गिरती है, हालाँकि वहाँ की घाटियों का तल ख़ुद सूखा रहता है। ख़ैबर-पख़्तूनख़्वा के उत्तरी हिस्से, यानी नारन, काग़ान और स्वात घाटी, भारी बर्फ़ में गिने जाते हैं; मरी तथा गल्यात मध्यम श्रेणी में हैं; और बलूचिस्तान में क्वेटा को बर्फ़ कभी-कभार ही मिलती है। नेपाल के सोलुखुंबू, मुस्तांग और डोल्पा में हर साल भारी बर्फ़ पड़ती है, तथा भूटान के ऊँचे दर्रों और उत्तरी ज़िलों में हर साल मध्यम से भारी। बांग्लादेश और श्रीलंका इस सूची से बाहर हैं: वहाँ उतनी ऊँचाई वाला कोई भूभाग ही नहीं है।

पिघलने के महीने: नहर, खेत और बिजलीघर

सर्दी में जमा हुई बर्फ़ का असली काम तब शुरू होता है जब वह पिघलती है। पिघलाव मई से जुलाई के बीच अपने चरम पर रहता है, पर नदी-बहाव में उसका हिस्सा हर घाटी में बहुत अलग है: सुदूर पश्चिमी (सिंधु क्षेत्र के) हिमालयी जलग्रहण क्षेत्रों में सालाना बहाव का 50 प्रतिशत तक, सुदूर पूर्वी (त्सांगपो, यानी ऊपरी ब्रह्मपुत्र के) जलग्रहण क्षेत्रों में लगभग 25 प्रतिशत, और बाक़ी जगहों पर 20 प्रतिशत से कम। नहरों में पानी, पनबिजली के टरबाइनों पर दबाव और मैदानी शहरों की आपूर्ति — तीनों का हिसाब इसी बहाव से बैठता है।

उलटा भी उतना ही सच है। जिस साल सर्दी में बर्फ़ कम पड़े, उसका बिल अगली गर्मी में चुकाना पड़ता है। 2022 की पाकिस्तान बाढ़ को वसंत की लू से तेज़ हुए बर्फ़ के पिघलाव ने भी आंशिक रूप से बढ़ाया था, हालाँकि उसकी मुख्य वजह मानसून की अति-भारी बारिश थी। पनबिजली पर निर्भरता भूटान, नेपाल, पाकिस्तान और भारत में सबसे ज़्यादा है, और नीचे की ओर के किसानों की सिंचाई इसी पानी के भरोसे चलती है।

ऊपर सरकती बर्फ़रेखा

आगे का हिसाब और कड़ा है। ग्लेशियर सिकुड़ने के साथ नदियों का बहाव पहले चढ़ेगा और फिर गिरेगा; ज़्यादातर जगह यह चोटी 2050 तक आने का अनुमान है।

बर्फ़ तक पहुँचने से पहले: कमाई और ख़तरा

सर्दियों की बर्फ़ पहाड़ी अर्थव्यवस्था का बड़ा खंभा है। मनाली, शिमला, औली, गुलमर्ग, सोनमर्ग और मसूरी हर साल लाखों सैलानी खींचते हैं। पाकिस्तान में नारन-काग़ान, मरी और हुंज़ा घाटी घरेलू तथा खाड़ी देशों के सैलानियों को बुलाती हैं; नेपाल में अन्नपूर्णा और एवरेस्ट क्षेत्रों का शीतकालीन ट्रेक लोकप्रिय है; भूटान का महँगा शीतकालीन पर्यटन ड्रुक एयर के रास्ते चलता है। हाल के सीज़नों की बात करें तो 2024 के क्रिसमस से ठीक पहले मनाली के पास हुई भारी बर्फ़बारी ने सोलंग और अटल सुरंग के बीच गाड़ियाँ फँसा दीं।

ख़तरे भी उतने ही ठोस हैं। 3,500 मीटर से ऊपर जाने पर एक-दो दिन ठहरकर शरीर को ढालना ज़रूरी है, और 2,500 मीटर से ऊपर पहाड़ी बीमारी हो सकती है। मनाली-रोहतांग, सोनमर्ग-ज़ोजिला और स्कर्दू-ख़प्लू की सड़कों पर हिमस्खलन वाले हिस्से पड़ते हैं। ऊँचाई पर पारा शून्य से 10 से 30 डिग्री नीचे तक उतरता है, और अगर पवन शीत शून्य से 28 डिग्री नीचे या उससे भी ठंडा हो, तो खुली त्वचा 30 मिनट के भीतर जम सकती है। बर्फ़ीले तूफ़ान सड़कें बंद कर देते हैं और गाड़ियाँ फँसा देते हैं, और भारी बर्फ़ के साथ बिजली का जाना आम बात है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

भारत में बर्फ़ देखने की सबसे अच्छी जगहें कौन सी हैं? कश्मीर में गुलमर्ग, सोनमर्ग और पहलगाम; हिमाचल तथा उत्तराखंड में मनाली, शिमला, औली और मसूरी; उत्तराखंड में ही मुनस्यारी और चोपता; सिक्किम में नाथूला और त्सोंगमो झील; और अरुणाचल में तवांग तथा सेला दर्रा। सबसे भारी बर्फ़बारी के लिए दिसंबर से फ़रवरी के बीच जाइए।

क्या दिल्ली या मुंबई में कभी बर्फ़ गिरती है? लगभग कभी नहीं। दिल्ली की सबसे ठंडी जनवरी की रातें कभी-कभी 3–4 डिग्री सेल्सियस तक उतर जाती हैं, पर वहाँ की हवा बर्फ़ के लिए बहुत सूखी और बहुत गरम रहती है। मुंबई का आधुनिक रिकॉर्ड में सबसे कम तापमान 1962 में 7.4 डिग्री सेल्सियस दर्ज हुआ था। भारत के किसी बड़े मैदानी शहर में पिछले 200 साल में बर्फ़बारी दर्ज नहीं हुई है।

बर्फ़ पर ट्रेक के लिए कौन सा महीना सही है? सिर्फ़ बर्फ़ देखनी हो तो दिसंबर के आख़िर से फ़रवरी की शुरुआत तक। पूरे साज़ो-सामान के साथ बर्फ़ पर चलना हो तो जनवरी से मार्च। हल्के मौसम में वसंत की बर्फ़ चाहिए तो अप्रैल-मई, जैसे रूपकुंड और संदकफू के रास्तों पर। और मानसून से बचकर हिमालयी ट्रेक करना हो तो अक्टूबर-नवंबर।

अपने शहर का पूर्वानुमान कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर वर्षा का पूर्वानुमान दिखाता है, और बर्फ़ीले इलाक़ों में उसी में बर्फ़बारी शामिल रहती है। उत्तर और पूर्व भारत के लिए शुरुआत इनसे कर सकते हैं: दिल्ली, अमृतसर, लखनऊ, जयपुर, पटना और गुवाहाटी।

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