ज़मीन के पास हवा के जमाव बिंदु से नीचे उतरने पर सतहों पर जम जाने वाले बर्फ़ के क्रिस्टल। उत्तर भारत और पाकिस्तान में दिसंबर-जनवरी की आम परेशानी, जो सरसों, चना और आलू जैसी रबी फसलों को चौपट कर सकती है।
मूल बातेंपाला क्या है?
पाला बर्फ़ के क्रिस्टल की वह पतली परत है जो घास, पत्तों, काँच, गाड़ी के शीशे और खुली मिट्टी पर तब जम जाती है जब ज़मीन के पास हवा का तापमान जमाव बिंदु यानी 0°C से नीचे उतर जाता है। ओस से इसका रिश्ता सीधा है — ओस में नमी पानी की बूँद बनकर बैठती है, पाले में वही नमी बूँद बने बिना सीधे ठोस बर्फ़ में बदल जाती है।
उत्तर भारत के पाठक के लिए यह कोई किताबी शब्द नहीं। सिंधु-गंगा का मैदान — पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तरी राजस्थान और पाकिस्तान के इन्हीं अक्षांशों वाले इलाके, यानी वहाँ का पंजाब और ख़ैबर पख़्तूनख़्वा की ऊँचाइयाँ — हर सर्दी इससे गुज़रते हैं। सबसे ज़्यादा दिसंबर और जनवरी में, और अक्सर किसी तेज़ पश्चिमी विक्षोभ के गुज़र जाने के बाद, जब मध्य एशिया से आई ठंडी हवा मैदानों पर बैठ जाती है।
खेती के लिहाज़ से यह साल की सबसे बड़ी चिंता है। खड़ी रबी फसलें — सरसों, चना, मटर, आलू, टमाटर और चारा — उस रात भारी चोट खाती हैं जब बढ़वार के नाज़ुक दौर में रात का तापमान जमाव बिंदु से नीचे चला जाए।
साफ़ रात, थमी हवा: पाला किन छह सीढ़ियों से बनता है
पहली शर्त साफ़ आसमान है। बादल न हों तो ज़मीन अपनी गर्मी सीधे अंतरिक्ष में बिखेर देती है और कोई चादर उसे रोकती नहीं। दूसरी शर्त हवा का थम जाना है — हवा चले तो ऊपर की गुनगुनी परत नीचे मिल जाती है और ज़मीन उतनी ठंडी नहीं हो पाती। तीसरी शर्त नीची परतों में नमी का होना है, क्योंकि जमने के लिए भाप चाहिए। इसके बाद ज़मीन, घास और मिट्टी की सतह 0°C से नीचे उतरती है; हवा की भाप बीच में पानी बने बिना सीधे बर्फ़ में बदलती है; और सुबह हर खुली सतह पर सफ़ेद परत दिख जाती है।
यहाँ एक बात अक्सर उलझाती है। मौसम केंद्र का थर्मामीटर ज़मीन से क़रीब दो मीटर ऊपर लगा होता है, जबकि रात में ज़मीन उस ऊँचाई की हवा से 2-4°C ज़्यादा ठंडी हो सकती है। इसीलिए पाला तब भी पड़ सकता है जब बुलेटिन में न्यूनतम तापमान 2-4°C के आसपास दिख रहा हो। सरकारी गिनती में “पाले वाला दिन” वही होता है जिसमें ज़मीन का तापमान 0°C या उससे नीचे रहा हो, भले दर्ज हवा का तापमान जमाव बिंदु से थोड़ा ऊपर रहा हो।
कितना पाला पड़ेगा, यह कुछ और चीज़ों पर टिका है: हवा की रफ़्तार — जितनी कम, ज़मीन उतनी ठंडी; बादलों की मात्रा, क्योंकि साफ़ रातें बादल वाली रातों से ज़्यादा ठंडी होती हैं; मिट्टी की नमी; खेत में खड़ी वनस्पति का प्रकार; और सतह का रंग, क्योंकि हल्के रंग की सतहें दिन में धूप कम सोखती हैं।
चार किस्में, और वह काला पाला जो दिखता ही नहीं
दक्षिण एशिया में सबसे आम विकिरण पाला है। यह साफ़ और शांत रात में बनता है, जब ज़मीन गर्मी इतनी तेज़ी से अंतरिक्ष को लौटाती है कि हवा उसकी भरपाई नहीं कर पाती। घास, पत्तों और खड़ी गाड़ियों पर सफ़ेद परत चढ़ जाती है, जो दोपहर से पहले उड़ भी जाती है।
रोएँदार पाला भारी, पंखनुमा क्रिस्टल बनाता है और तब जमता है जब हवा जमाव बिंदु से नीचे संतृप्त हो जाए। देखने में यह शानदार लगता है — टहनियाँ बर्फ़ के गहनों से लद जाती हैं। मरी, गल्यात और शिमला जैसी तलहटियों में यह आम नज़ारा है।
बहाव वाला पाला तब पड़ता है जब पूरी ठंडी वायुराशि किसी इलाके में सरक आए। यह विकिरण पाले से ज़्यादा देर टिकता है, लेकिन दक्षिण एशिया में कम दिखता है — तीखी शीतलहर की घटनाओं तक सीमित रहता है।
सबसे ख़तरनाक किस्म काला पाला है, जिसे मार देने वाला पाला भी कहते हैं। हवा इतनी सूखी होती है कि सफ़ेद परत बनती ही नहीं, फिर भी पौधे के ऊतक भीतर से जम जाते हैं। कुछ घंटों बाद वनस्पति काली पड़ने लगती है। पंजाब और हरियाणा में गेहूँ और सरसों इसी की चपेट में आते हैं।
पाला भारत और दक्षिण एशिया में
सबसे तीखा पाला पाकिस्तानी पंजाब में पड़ता है — मुल्तान, बहावलपुर और फ़ैसलाबाद में यह हर साल की बात है। भारतीय पंजाब और हरियाणा में अमृतसर, बठिंडा और हिसार जैसे शहर भी इसी सबसे तीखे दायरे में आते हैं; हिसार में 1982-2002 के दौरान हर सर्दी औसतन क़रीब 27 दिन ज़मीनी पाला दर्ज हुआ। राजस्थान में चुरू, बीकानेर और जैसलमेर की साफ़ रातें तीखा विकिरण पाला पैदा करती हैं, जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में — मेरठ, अलीगढ़, मथुरा — पाला मध्यम रहता है।
दिल्ली और आसपास के इलाके में कभी-कभार पाले वाली रातें आती हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में, यानी लखनऊ और पटना जैसे शहरों में, पाले वाली सुबहें मिलती हैं और शून्य से नीचे की रातें कभी-कभार। उत्तरी मध्य प्रदेश तथा छत्तीसगढ़ में पाला शीतलहर के साथ ही आता है।
दक्षिण की ओर बढ़ते ही तस्वीर पलट जाती है। मुंबई, हैदराबाद और बेंगलुरु में पाला कभी नहीं पड़ता, क्योंकि ये बहुत दक्षिण में हैं। तटीय इलाकों में समुद्र तापमान को संभाले रखता है, और केरल तथा तमिलनाडु पाले के इलाके हैं ही नहीं।
पहाड़ों का हिसाब अलग है। शिमला, मनाली और मसूरी में हर सर्दी तीखा पाला पड़ता है और कई बार बर्फ़बारी भी होती है। श्रीनगर और गुलमर्ग में गहरी सर्दी का पाला झीलों तक को जमा देता है। स्कर्दू और हुंज़ा में जमाव नियमित है, बर्फ़ के साथ-साथ। सिक्किम और अरुणाचल की ऊँचाइयों पर ऊँचे इलाक़े का पाला बार-बार लौटता है।
सरसों के फूल से आलू तक: एक रात का हिसाब
गेहूँ अक्टूबर-नवंबर में बोया जाता है, और जनवरी में जब फसल गाँठ बनाने के दौर में होती है, पाला उसके कल्लों को नुकसान पहुँचाता है। तीखे पाले में उपज का नुकसान होता है, और पाकिस्तानी पंजाब यह चोट हर साल खाता है।
सरसों फूल आने के समय सबसे नाज़ुक रहती है। पाला फूलों को ख़त्म कर सकता है, और दोबारा बुवाई महँगी पड़ती है — मौसम हाथ से निकल सकता है।
चने पर मार दो दौर में पड़ती है, फूल आने के समय और फली भरने के समय। राजस्थान तथा मध्य प्रदेश में पाला इसे बुरी तरह मारता है; तीखी घटनाओं में उपज का नुकसान होता है।
सब्ज़ियों में आलू, टमाटर, मटर और बैंगन बेहद संवेदनशील हैं — एक ही तीखी पाले वाली रात पूरी फसल चौपट कर सकती है। ग्रीनहाउस में खेती यह जोखिम घटाती है, मिटाती नहीं।
बाग़वानी में नींबू-वर्गीय फल, आम और केला जैसे उपोष्ण फल कमज़ोर पड़ते हैं। उत्तर भारत के आम के बाग़ — उत्तर प्रदेश और बिहार में — शुरुआती बौर के समय पाले की मार झेलते हैं। उलटफेर यह है कि हिमाचल और उत्तराखंड के सेब तथा आड़ू को सर्दी की ठिठुरन चाहिए ही होती है; उनके लिए पाला फ़ायदे की चीज़ है।
धुएँ से बीमे तक: खेत को बचाने के तरीके
परंपरागत तरीक़े आज भी चलते हैं। पुआल जलाकर धुआँ करना खेत के ऊपर एक गरम चादर-सी बना देता है। पानी का छिड़काव इसलिए काम करता है कि पानी जमते वक़्त गर्मी छोड़ता है। पवन मशीनें ऊपर की गुनगुनी हवा को नीचे मिला देती हैं, और कपड़े की ओट पौधों के चारों ओर गर्मी रोक लेती है। बुवाई की जगह चुनना भी बचाव है — ढलान से ठंडी हवा नीचे बह जाती है, जबकि घाटी में वही हवा जमा होती रहती है।
आधुनिक पक्ष में, भारत मौसम विज्ञान विभाग पाले की चेतावनी एक से तीन दिन पहले जारी करता है। शोध पाला-सहिष्णु क़िस्में तैयार कर रहा है। प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना चुनिंदा राज्यों में पाले से हुए नुकसान को कवर करती है। पाला-रोधी रसायनों का छिड़काव कोशिका झिल्ली को थोड़े समय की सुरक्षा दे देता है।
पाले वाली सुबह और शहर की साँस
पाले वाली रातों के साथ अक्सर स्थिर तापीय प्रतिलोमन बैठ जाता है, जो प्रदूषण को ज़मीन के पास ही क़ैद कर लेता है। दिल्ली, लाहौर और लखनऊ में भारी पाले वाली सुबहों के बाद सुबह के घंटों में PM2.5 ऊपर चढ़ जाता है, धुंध में दृश्यता और गिरती है, साँस की तकलीफ़ की शिकायतें बढ़ती हैं, और बाहर कसरत करना समझदारी नहीं रह जाती। दिल्ली के सर्दियों वाले धुआँ भरे दिन अक्सर इन्हीं सबसे ठंडी, पाले से लदी सुबहों के पीछे-पीछे आते हैं।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
किस तापमान पर पाला पड़ता है? पाला तब भी बन सकता है जब दो मीटर की ऊँचाई पर हवा का तापमान 2-4°C दिखे, क्योंकि रात में ज़मीन उस हवा से 2-4°C ज़्यादा ठंडी हो सकती है। सरकारी रिकॉर्ड में पाले वाला दिन वही गिना जाता है जिसमें ज़मीन का तापमान 0°C या उससे नीचे रहा हो, चाहे दर्ज हवा का तापमान जमाव बिंदु से थोड़ा ऊपर क्यों न हो।
साफ़ रातों में ही पाला क्यों पड़ता है? बादलों की चादर न हो तो ज़मीन अपनी गर्मी सीधे अंतरिक्ष को लौटा देती है। एक ही शुरुआती तापमान से चलें तो साफ़ रात बादल वाली रात के मुक़ाबले ज़्यादा ठंडी हो जाती है। हवा भी मायने रखती है: थमी हुई हवा में ऊपर की गरम परत नीचे नहीं मिलती और ज़मीन बेरोक ठंडी होती जाती है।
क्या गर्मियों में भी पाला पड़ सकता है? सिर्फ़ बहुत ऊँचाई पर। भारतीय मैदानों में गर्मी के पाले का सवाल ही नहीं उठता। लद्दाख के ऊँचे दर्रों पर — ख़ारदुंग ला और तंगलंग ला जैसी 5,000 मीटर से ऊपर की जगहों पर — गर्मियों में भी रातों-रात पाला पड़ सकता है।
फसल के लिए बर्फ़ से ज़्यादा ख़तरनाक पाला क्यों है? बर्फ़ असल में रजाई का काम करती है — वह पौधों को ढँक लेती है और उन्हें और गहरे जमने से बचाती है। बर्फ़ के बिना पड़ा पाला पौधे के ऊतक को सीधे शून्य से नीचे के तापमान के हवाले कर देता है। यही वजह है कि उत्तरी अमेरिका में गेहूँ जैसी ठंड-सहिष्णु फसलें बर्फ़ीली सर्दियाँ निकाल ले जाती हैं।
अपने शहर या खेत का तापमान कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर मौजूदा तापमान और सात दिन का पूर्वानुमान दिखाता है, जिससे रात के न्यूनतम तापमान पर नज़र रखी जा सके। उत्तर के पाला-प्रवण इलाकों के लिए अमृतसर, दिल्ली, लखनऊ, पटना, जयपुर और भोपाल के पन्ने देखें; फ़र्क़ समझना हो तो मुंबई और हैदराबाद भी, जहाँ पाला कभी नहीं पड़ता।