ऊँचाई और आकार के हिसाब से WMO बादलों को दस वंशों में बाँटता है — रेशों जैसे पक्षाभ से लेकर आसमान छूते कपासी वर्षा मेघ तक — वही गरजता बादल जो दक्षिण एशिया की ज़्यादातर बारिश देता है।
मूल बातेंबादल के प्रकार क्या हैं?
बादल हवा में टँगी पानी की नन्ही बूँदों या बर्फ़ के रवों का वह ढेर है जो आँख को दिख जाता है। ऊपर उठती हवा ठंडी होकर अपने ओसांक तक पहुँचती है, और उसमें घुली भाप तैरते महीन कणों पर जमकर बूँद बन जाती है। दक्षिण एशिया में ऐसे कणों का टोटा कभी नहीं पड़ता — थार की धूल, अरब सागर का नमक, पराली और ईंट-भट्ठों का धुआँ, सब ऊपर मौजूद हैं। इसलिए यहाँ असली कमी लगभग हमेशा हवा के उठान और नमी की होती है, कणों की नहीं।
बादलों को नाम देना किताबी शौक़ नहीं है: शक्ल और ऊँचाई में वह प्रक्रिया दर्ज रहती है जिसने बादल को बनाया। सपाट धूसर चादर कहती है कि बड़े इलाके पर हवा धीरे-धीरे ऊपर सरकी। सख़्त किनारों वाली, फूलगोभी जैसी उबलती मीनार कहती है कि हवा एक सँकरे खंभे में तेज़ी से ऊपर भाग रही है। पहली से घंटों हल्की फुहार झरती है; दूसरी से चालीस मिनट की कड़कती बिजली, अचानक का झोंका और पानी में डूबी गलियाँ। मुंबई या ढाका वाले के लिए पूरा पूर्वानुमान इसी फ़र्क़ में छिपा है।
तीन मंज़िलें, दस वंश: कौन-सा बादल कहाँ बनता है
WMO बादलों को दस वंशों में बाँटता है: ज़्यादातर ऊँचाई की तीन पट्टियों में बैठते हैं, और एक अलग समूह उन बादलों का है जो किसी एक मंज़िल में नहीं टिकते, सीधे ऊपर बढ़ते हैं। उष्णकटिबंध का क्षोभमंडल ज़्यादा गहरा होता है, इसलिए यहाँ ये पट्टियाँ यूरोप से अलग ढंग से तय की जाती हैं। दक्षिण एशिया के ऊपर ऊँचे बादल मोटे तौर पर 6 किमी से करीब 18 किमी तक, मध्य स्तर के लगभग 2 से 8 किमी के बीच, और नीचे के ज़मीन से करीब 2 किमी तक मिलते हैं।
सबसे ऊपरी मंज़िल, जहाँ बादल बर्फ़ के रवों से बने होते हैं:
- पक्षाभ (सिरस) — बाल जैसे सफ़ेद रेशे, अक्सर किसी दूर के तूफ़ान की निहाई के उड़कर बिखरे टुकड़े।
- पक्षाभ स्तरी (सिरोस्ट्रेटस) — दूधिया झीना परदा, जो सूरज या चाँद के चारों ओर गोल प्रभामंडल बना देता है।
- पक्षाभ कपासी (सिरोक्यूम्युलस) — छोटी-छोटी लहरें, मानो मछली के शल्कों की कतार।
बीच की मंज़िल:
- मध्य स्तरी (आल्टोस्ट्रेटस) — बिना किसी बनावट की सपाट धूसर परत, जिसके पीछे सूरज कागज़ के जलचिह्न जैसा फीका झाँकता है।
- मध्य कपासी (आल्टोक्यूम्युलस) — टुकड़ों या लपेटों में बिखरे बादल; हिमालय के पास, जहाँ हवा पर्वत-श्रेणियों को लाँघती है, कभी-कभी लेंस जैसे चिकने।
निचली मंज़िल:
- स्तरी (स्ट्रेटस) — सबसे नीची परत; असल में वही कोहरा जो ज़रा-सा ऊपर उठ आया हो।
- स्तरी कपासी (स्ट्रेटोक्यूम्युलस) — गाँठदार, टूटी चादरें; समुद्र-तट की सुबह का आम आसमान।
- वर्षा स्तरी (निंबोस्ट्रेटस) — मोटी, गहरी, बारिश से लदी परत, जिसमें कोई आकार पहचान में नहीं आता। ठीक-ठीक कहें तो यह बीच की मंज़िल का बादल है, पर आमतौर पर निचली और ऊपरी मंज़िलों तक भी फैला रहता है।
सीधे ऊपर बढ़ने वाले:
- कपासी (क्यूम्युलस) — साफ़ मौसम के रुई जैसे गोले, जो दोपहर के साथ फूलते जाते हैं।
- कपासी वर्षा मेघ (क्यूम्युलोनिंबस) — संवहन की पूरी मीनार: तल ज़मीन के करीब, चोटी क्षोभसीमा से टकराकर निहाई की तरह चपटी। बिजली, ओले और नुकसानदेह झोंके पैदा करने वाला अकेला बादल यही है।
हिंदी नाम खुद कुंजी हैं। “पक्षाभ” यानी पंख जैसा रेशेदार, “स्तरी” यानी परतदार, “कपासी” यानी कपास के ढेर जैसा, और जिस नाम में “वर्षा” जुड़ा है, वह बरसता है। दो शब्द जोड़िए, तो बादल की शक्ल और इरादा दोनों सामने आ जाते हैं।
कोहरे की चादर से काल बैसाखी तक: उपमहाद्वीप का बादल-पंचांग
इस इलाके के मौसमों का पूरा पंचांग लगभग आसमान देखकर ही पढ़ा जा सकता है।
सर्दी। पंजाब से दिल्ली, लखनऊ और पटना होते हुए बांग्लादेश तक फैले सिंधु-गंगा के मैदान पर साफ़, शांत रातों में नीची स्तरी परतें और विकिरण कोहरा जम जाते हैं। गुज़रते पश्चिमी विक्षोभ उत्तर भारत और पाकिस्तान पर मध्य स्तरी और पक्षाभ स्तरी बादल बिछाते हैं — आने वाली बारिश और पहाड़ों पर बर्फ़बारी की अगली निशानी।
मानसून से पहले, मार्च से मई। ज़मीन की तीखी तपिश देर सुबह तक इक्के-दुक्के कपासी बादल खड़े करती है, जो शाम तक फूटकर कपासी वर्षा मेघ बन जाते हैं। पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, बिहार, झारखंड और ओडिशा में ये तूफ़ान काल बैसाखी या नॉरवेस्टर कहलाते हैं, और धूल की दीवार तथा प्रचंड झंझा के साथ आ धमकते हैं। उत्तर-पश्चिम के मैदानों में वही गर्मी आसमान को अक्सर बेबादल, धुँधला और सफ़ेद कर देती है: ऊपर टँगी धूल धूप बिखेरती है, पर संघनित होकर बूँद नहीं बनती।
दक्षिण-पश्चिम मानसून। सक्रिय दौर में पश्चिमी घाट, कोंकण तट, बंगाल का डेल्टा और ब्रह्मपुत्र घाटी गहरे वर्षा स्तरी बादलों से ढक जाते हैं, जिनमें कपासी वर्षा मेघ धँसे रहते हैं — घंटों की मद्धम धूसर रोशनी और बिना थमी बारिश। विराम आते ही परत छितरे कपासी और स्तरी कपासी बादलों में बिखर जाती है, और गर्मी लौट आती है। जब नम हवा ढलानों पर ज़बरदस्ती चढ़ाई जाती है, तब मेघालय और शिलांग के ऊपर की पहाड़ियाँ लगभग स्थायी रूप से बादलों में लिपटी रहती हैं।
मानसून की वापसी के बाद। बंगाल की खाड़ी में चक्रवातों का मौसम आता है, जिनकी सर्पिल पट्टियाँ कपासी वर्षा मेघों के विशाल, सुगठित मैदान होती हैं। फिर तमिलनाडु पर उत्तर-पूर्वी मानसून बरसता है।
छत से एक नज़र: आज का आसमान आपके काम के बारे में क्या कहता है
- सिर्फ़ पक्षाभ — आज बारिश नहीं, पर अक्सर किसी ऐसे मौसमी तंत्र का अगला सिरा जो एक-दो दिन दूर है।
- मध्य स्तरी परत जो मोटी होती और नीचे उतरती जाए — कुछ घंटों में बारिश, आमतौर पर हल्की से मध्यम और देर तक।
- वर्षा स्तरी — आप इसके नीचे पहुँच चुके हैं: लगातार बारिश, धुँधली रोशनी, और परत टिकी तो जलभराव।
- दोपहर भर ऊँचे होते कपासी — तूफ़ान आँखों के सामने तैयार हो रहा है; बाहर का काम समेट लीजिए।
- सख़्त निहाई वाला कपासी वर्षा मेघ — बिजली का ख़तरा, बारिश से पहले झोंकों का अचानक मोर्चा, शायद ओले, और दृश्यता में तेज़ गिरावट।
- स्तरी परत या कोहरा — बारिश से ज़्यादा आने-जाने की मुसीबत।
खुले आसमान के नीचे काम करने वालों के लिए यह सूची ख़ास काम की है। खेत में काम करते मज़दूर, छत पर काम करते राजमिस्त्री या ठेलेवाले के लिए दोपहर भर ऊँचा होता कपासी बादल इशारा है कि तूफ़ान बन रहा है और बाहर का काम जल्दी निपटा लेना चाहिए।
सफ़र के लिए हिसाब अलग है। ज़मीन के पास टिकी स्तरी परत और कोहरा बारिश से ज़्यादा आवाजाही की मुसीबत हैं: उड़ानें देर से छूटती हैं, राजमार्गों पर गाड़ियाँ धीमी चलती हैं, और दोपहिया वाले को सामने का रास्ता मुश्किल से दिखता है। मोहल्ले की गलियों के लिए चिंता वर्षा स्तरी परत है, जो देर तक टिकी रहे तो जलभराव कर देती है।
ऑक्टा, सीलोमीटर और ठंडी चोटी: ज़मीन और अंतरिक्ष से बादल की पहचान
ज़मीनी पर्यवेक्षक बादल आवरण ऑक्टा में, यानी आसमान के आठवें हिस्सों में बताते हैं। हवाई अड्डे की रिपोर्ट इसे चार कोडों में ढालती है: FEW (1 से 2 ऑक्टा), SCT यानी छितरे (3 से 4), BKN यानी टूटी परत (5 से 7) और OVC यानी पूरा ढका (8)। साथ में लेज़र सीलोमीटर बादल के तल की ऊँचाई नापकर जोड़ता है।
ध्यान रहे, पूर्वानुमान का “आंशिक रूप से बादल” बताता है कि आसमान कितना ढका है, यह नहीं कि किस बादल ने ढका है। इसीलिए एक जैसे बादल आवरण वाले दो दिन बिलकुल अलग महसूस हो सकते हैं — एक पक्षाभ के झीने परदे वाला, दूसरा भारी कपासी मीनारों वाला।
ऊपर से भारत के इनसैट भूस्थिर उपग्रह इन बादल-मैदानों को लगातार देखते हैं। अवरक्त तस्वीरें चोटी का तापमान नापती हैं, और ऊँचाई के साथ वायुमंडल ठंडा होता जाता है, इसलिए बेहद ठंडी चोटी यानी बेहद ऊँचा बादल। तेज़ होते कपासी वर्षा मेघों के झुंड या गहराते चक्रवात को तट से बहुत पहले पकड़ने का मानक तरीक़ा यही है। बादल के भीतर बारिश ठीक कहाँ गिर रही है, यह उपग्रह नहीं, डॉप्लर मौसम रडार बताता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
बादल कुल कितनी तरह के होते हैं? WMO के वर्गीकरण में दस वंश, जिन्हें आगे जातियों और उप-किस्मों में बाँटा गया है। ज़मीन से दिखने वाला हर बादल इन्हीं दस में आता है, और दक्षिण एशिया के लिए काम की सूची और छोटी है: कपासी वर्षा मेघ, वर्षा स्तरी, स्तरी कपासी, कपासी, स्तरी और पक्षाभ।
मानसून की बारिश कौन-सा बादल लाता है? एक नहीं, दो — वर्षा स्तरी और कपासी वर्षा मेघ। दिन भर की धीमी, भिगोती झड़ी मोटी वर्षा स्तरी परत से आती है; तेज़ बौछारें, बिजली और अचानक आई बाढ़ उसी परत में धँसी कपासी वर्षा मीनारों का काम है।
मानसून से पहले आसमान सफ़ेद और धुँधला क्यों रहता है? यह ज़्यादातर बादल नहीं, धूल और एयरोसोल है। उत्तरी मैदानों की सूखी हवा में तैरते कण धूप को हर दिशा में बिखेरकर आसमान का रंग उड़ा देते हैं, पर बारिश की एक बूँद नहीं बनाते।
क्या बादल दिखे तो बारिश पक्की है? नहीं। ऊँचे पक्षाभ और साफ़ मौसम वाले कपासी कुछ नहीं बरसाते, और स्तरी कपासी की पतली परत दिन भर शहर पर टिककर भी सूखी रह सकती है। बूँदों को गिरने लायक भारी होने के लिए गहरा बादल चाहिए — फैलाव से ज़्यादा गहराई मायने रखती है।
शहर का पूर्वानुमान बादल का प्रतिशत बताता है, प्रकार नहीं — तो दोनों को कैसे मिलाऊँ? किसी भी शहर का पन्ना खोलिए: घंटे-दर-घंटे का बादल आवरण, बारिश की संभावना और 7 दिन का पूर्वानुमान वहाँ एक साथ रखे हैं। वह आँकड़ा बताता है कि आसमान कितना ढका है; कौन-सा बादल ढक रहा है, यह ऊपर की “छत से एक नज़र” वाली सूची से खुद पहचानिए। दोनों को साथ पढ़ेंगे तो दिन का अंदाज़ा अकेले प्रतिशत से कहीं पक्का बनेगा। मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, पटना, लखनऊ या ढाका से शुरुआत कीजिए।