सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों की तीव्रता बताने वाला 0 से 11+ तक का पैमाना। दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में यह सूचकांक अत्यधिक श्रेणी (11+) तक पहुँच सकता है।
मापनयूवी सूचकांक क्या है?
सूर्य की ऊर्जा का एक छोटा हिस्सा पराबैंगनी (UV) किरणों का होता है। आँख इन्हें देख नहीं पाती, पर त्वचा और आँख की कोशिकाओं पर इनका असर प्रकाश की बाक़ी तरंगों से कहीं तीखा होता है। यूवी सूचकांक इसी तीखेपन को एक सीधे अंक में बदल देता है।
पैमाना 0 से शुरू होता है — रात, जब सूर्य क्षितिज के नीचे है — और 11 तथा उससे ऊपर तक जाता है, जिसे अत्यधिक कहते हैं। हर इकाई का अर्थ है प्रति वर्ग मीटर 25 मिलीवाट त्वचा-प्रभावी विकिरण। WHO, WMO, UNEP और ICNIRP ने मिलकर इसे 1994 में तय किया था, और आज यह दुनिया भर में एक ही अर्थ रखता है।
अंक जितना ऊपर, तीन तरह का नुक़सान उतना तेज़: त्वचा पर झुलसन, समय से पहले बुढ़ापा और कैंसर; आँख में मोतियाबिंद तथा कॉर्निया की क्षति; और रोग प्रतिरोध, यानी त्वचा की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया का दब जाना।
दक्षिण एशिया के लिए यह रोज़मर्रा की सेहत का सवाल है, फिर भी ध्यान सबसे कम इसी पर जाता है। दिल्ली, मुंबई और चेन्नई में यूवी सूचकांक अत्यधिक श्रेणी तक पहुँच सकता है।
पाँच श्रेणियाँ, और झुलसने तक का समय
WHO ने पूरे पैमाने को पाँच खानों में बाँट रखा है, और हर खाने के साथ एक व्यावहारिक सलाह जुड़ी है:
| यूवी सूचकांक | श्रेणी | गोरी त्वचा के झुलसने का समय | क्या करें |
|---|---|---|---|
| 0–2 | निम्न | 60+ मिनट | ख़ास एहतियात ज़रूरी नहीं |
| 3–5 | मध्यम | 30–45 मिनट | चश्मा, टोपी, SPF 15+ |
| 6–7 | उच्च | 20–30 मिनट | SPF 30+, टोपी, दोपहर में छाया |
| 8–10 | बहुत उच्च | 15–20 मिनट | SPF 50+, पूरा शरीर ढकें, 11 से 3 बजे तक बाहर नहीं |
| 11+ | अत्यधिक | 15 मिनट से कम | पूरी सुरक्षा; दोपहर में बाहर बिलकुल नहीं |
एक ग़लतफ़हमी यहाँ साफ़ कर लेना ज़रूरी है। दक्षिण एशिया में साँवली त्वचा आम है, और उसमें दिखने वाली झुलसन लगभग दो से चार गुना देर में उभरती है। इससे मान लेना आसान हो जाता है कि साँवली त्वचा को धूप से कोई ख़तरा ही नहीं — पर ज़रूरत से ज़्यादा धूप हर रंग की त्वचा को नुक़सान पहुँचा सकती है। गोरी त्वचा वालों में त्वचा कैंसर का जोखिम साँवली त्वचा वालों से ज़्यादा होता है, हालाँकि त्वचा कैंसर साँवली त्वचा वालों को भी होता है। यानी जोखिम कम है, शून्य नहीं।
यूवी सूचकांक भारत और दक्षिण एशिया में
इसकी जड़ भूगोल में है। दक्षिण एशिया कर्क रेखा के आसपास बैठा है, इसलिए गर्मियों की दोपहर में सूर्य की ऊँचाई लगभग 90° तक पहुँच जाती है — किरण सीधे सिर के ऊपर से, वायुमंडल का सबसे छोटा रास्ता तय करके आती है। इसीलिए यहाँ यूवी सूचकांक नियमित रूप से बहुत उच्च से अत्यधिक श्रेणी तक पहुँचता है।
मार्च से अक्टूबर के बीच दोपहर के सामान्य मान:
- दिल्ली, लखनऊ, पटना — 10 से 12
- मुंबई, पुणे, अहमदाबाद — 11 से 13
- चेन्नई, बेंगलुरु, हैदराबाद — 11 से 13
- कोलकाता, ढाका — 10 से 12
- कराची, लाहौर — 10 से 12
- श्रीलंका और मालदीव — 11 से 14, पूरे साल अत्यधिक श्रेणी में
- लेह, मनाली, पोखरा — 8 से 12, पर पतले वायुमंडल के कारण UVB की तीव्रता और भी ज़्यादा
सर्दियों में, नवंबर से फ़रवरी तक, तस्वीर दो हिस्सों में बँट जाती है। दिल्ली और पंजाब में मान गिरकर 5 से 7 पर आ जाता है — उच्च, पर सँभाला जा सकने लायक़। चेन्नई और बेंगलुरु सर्दियों में भी 8 से 10 पर बने रहते हैं, यानी बहुत उच्च, बारहों महीने। नतीजा सीधा है: दक्षिण भारत में सनस्क्रीन पूरे साल की ज़रूरत है, उत्तर भारत में मुख्यतः गर्मियों की।
छह चीज़ें जो इस अंक को ऊपर-नीचे करती हैं
सूर्य की ऊँचाई सबसे बड़ा कारण है। सूर्य जितना ऊँचा, यूवी उतना ऊँचा — शिखर सौर दोपहर पर, यानी स्थानीय सौर समय के लगभग 12:00 से 13:00 के बीच। व्यवहार में ख़तरे की खिड़की सुबह 11 से दोपहर 3 बजे तक मानी जाती है।
बादल का असर उतना सीधा नहीं जितना लगता है। घने बादल यूवी 50 से 90 प्रतिशत तक घटा देते हैं, पर पतले बिखरे बादल उसे परावर्तित करके नीचे भेज सकते हैं और मान 25 प्रतिशत तक बढ़ा भी देते हैं।
ऊँचाई हर 1,000 मीटर पर यूवी लगभग 10 प्रतिशत बढ़ा देती है। लेह और स्कर्दू में तापमान कम रहने के बावजूद यूवी अत्यधिक स्तर तक जाता है; ठंड और यूवी के बीच कोई रिश्ता नहीं।
ओज़ोन स्तंभ समताप मंडल में छलनी का काम करता है — ओज़ोन जितना कम, नीचे पहुँचने वाला यूवी उतना ज़्यादा। ओज़ोन छिद्र का असर ऊँचे अक्षांशों पर सबसे तीखा है, पर नियम पूरी पृथ्वी पर लागू होता है।
सतह से परावर्तन एक्सपोज़र दोगुना तक कर सकता है। बर्फ़ यूवी का 80 प्रतिशत तक वापस फेंकती है, रेत 25 प्रतिशत तक, घास सिर्फ़ 3 प्रतिशत। पहाड़ी स्थलों और समुद्र तटों पर छाते के नीचे बैठा व्यक्ति भी इसीलिए अच्छी-ख़ासी ख़ुराक पा जाता है।
वायु प्रदूषण का असर उलटा है: घनी धुँध और स्मॉग यूवी 10 से 30 प्रतिशत तक रोक लेते हैं। दिल्ली की सर्दियों वाली स्मॉग यूवी घटाती ज़रूर है, पर इसका यह मतलब नहीं कि उन दिनों बाहर रहना सुरक्षित हो गया — ख़तरा बस दूसरी शक्ल ले लेता है।
त्वचा, आँखें और वे लोग जिनका जोखिम सबसे ज़्यादा है
मान 6 से ऊपर पहुँचते ही सावधानी वैकल्पिक नहीं रह जाती। त्वचा के लिए ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन, SPF 30 या उससे ज़्यादा, हर खुले हिस्से पर — और हर दो घंटे में दोबारा, तैरने या पसीना आने के बाद भी। कपड़ों में हल्की पूरी बाँह की क़मीज़ ज़्यादा काम आती है, और टोपी वही जिसका किनारा चारों ओर निकला हो; कैप गर्दन और कान खुले छोड़ देती है। 11 से 3 बजे के बीच छाया में रहना सबसे सस्ता उपाय है।
आँखों के लिए UV400 मानक वाला चश्मा चाहिए; काँच का गहरा रंग अपने आप सुरक्षा नहीं देता। जीवन भर में जमा होने वाले यूवी एक्सपोज़र के साथ मोतियाबिंद का जोखिम बढ़ता जाता है।
कुछ लोगों के लिए यह सब और भी ज़रूरी है:
- बच्चे — क्षति जन्म से जमा होनी शुरू हो जाती है। बच्चों वाली सनस्क्रीन लगाएँ, हाथ-पैर ढँके रखें।
- बाहर काम करने वाले — उष्णकटिबंधीय इलाक़ों में व्यावसायिक त्वचा कैंसर का सबसे बड़ा जोखिम इन्हीं पर है।
- प्रकाश-संवेदी दवाएँ लेने वाले — कुछ एंटीबायोटिक और सूजनरोधी दवाएँ त्वचा को धूप के प्रति ज़्यादा संवेदनशील बना देती हैं।
- सफ़ेद दाग़, गोरी त्वचा, या परिवार में त्वचा कैंसर का इतिहास — दोपहर की धूप से सख़्ती से बचें।
भरपूर धूप, फिर भी विटामिन डी की कमी
पराबैंगनी किरणों का UV-B हिस्सा त्वचा में विटामिन डी बनाता है, इसलिए इतनी धूप वाले क्षेत्र में कमी का सवाल ही नहीं उठना चाहिए। हक़ीक़त उलटी है, और इसके चार कारण गिने जाते हैं: सांस्कृतिक पहनावा शरीर का अधिकांश हिस्सा ढँके रखता है; जीवनशैली वातानुकूलित दफ़्तरों और घरों के भीतर बीतती है; प्रदूषण UV-A के मुक़ाबले UV-B को ज़्यादा रोकता है; और साँवली त्वचा विटामिन डी धीमी गति से बनाती है।
हल दोपहर में धूप सेंकना नहीं है। WHO की सलाह है कि चेहरा, हाथ और बाँहें हफ़्ते में दो-तीन बार बिना ढँके और बिना सनस्क्रीन के धूप में रखे जाएँ — बिना सुरक्षा वाली त्वचा को झुलसने में जितना समय लगता है, उसके आधे समय तक (त्वचा प्रकार II के लिए यूवी सूचकांक 7 पर यह लगभग 12 मिनट होता है)। दक्षिण एशिया में विटामिन डी के लिए इतना काफ़ी है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
यूरोप के मुक़ाबले दक्षिण एशिया में यूवी इतना ज़्यादा क्यों रहता है? अक्षांश का फ़र्क़ है। दक्षिण एशिया का ज़्यादातर हिस्सा 5°N से 35°N के बीच पड़ता है, और दोपहर में सूर्य लगभग सिर के ऊपर रहता है। यूरोप का अधिकांश हिस्सा 45°N से 60°N के बीच है, जहाँ सूर्य आसमान में कहीं नीचे रहता है और किरण को वायुमंडल का लंबा रास्ता तय करना पड़ता है। लंदन में गर्मियों की दोपहर का यूवी लगभग 7 होता है; मुंबई में यह अत्यधिक श्रेणी (11+) तक पहुँच सकता है।
क्या बादल वाले दिन यूवी ज़्यादा होता है? आमतौर पर नहीं। मोटे बादल यूवी 50 से 90 प्रतिशत तक घटा देते हैं। पर पतले बिखरे बादल किरणों को नीचे की ओर परावर्तित कर सकते हैं और असरदार ख़ुराक 10 से 25 प्रतिशत तक बढ़ा देते हैं। सबसे ख़तरनाक दिन वही आंशिक बादल वाले होते हैं, जब लोग मान लेते हैं कि धूप तेज़ नहीं है।
क्या खिड़की के काँच के पीछे भी त्वचा जल सकती है? जलन नहीं होगी, पर नुक़सान होता रहेगा। लंबी तरंग वाली UV-A किरणें काँच से पार निकल जाती हैं और त्वचा के बुढ़ाने में हिस्सा डालती हैं। झुलसन पैदा करने वाली UV-B किरणें काँच रोक लेता है।
थोड़ी ही देर बाहर जाना हो तो क्या सनस्क्रीन ज़रूरी है? यूवी 8 से ऊपर हो और त्वचा II–III प्रकार की हो, तो रोज़ के 15 मिनट भी जुड़ते-जुड़ते बड़ी मात्रा बन जाते हैं। लंबी अवधि का अधिकांश नुक़सान इसी जमा होती ख़ुराक से आता है, एक-दो तेज़ दिनों से नहीं।
अपने शहर का यूवी पूर्वानुमान कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पन्ने पर मौजूदा यूवी सूचकांक और 7 दिन का पूर्वानुमान दिखाता है, श्रेणी के हिसाब से रंग में — स्कूल आने-जाने के समय, खेल और बाहर के काम की योजना के लिए सीधा काम का। देखें मुंबई, चेन्नई, दिल्ली, हैदराबाद, अहमदाबाद और कोलकाता।