माध्य समुद्र तल से किसी जगह की ऊँचाई। हर 1,000 मीटर की चढ़ाई पर हवा औसतन लगभग 6.5 °C ठंडी हो जाती है — इसीलिए शिमला और दार्जिलिंग ठंडे रहते हैं, जबकि उनके नीचे के मैदान तपते हैं।
मूल बातेंसमुद्र तल से कितना ऊपर: ऊँचाई का मतलब
ऊँचाई (एलिवेशन) बताती है कि कोई जगह माध्य समुद्र तल से कितनी ऊपर बसी है। मौसम केंद्र और पूर्वानुमान मॉडल यह आँकड़ा साथ में इसलिए छापते हैं कि बाक़ी लगभग हर चीज़ इसी पर टिकी है। तापमान, हवा का दबाव, नमी, बारिश और बर्फ़ — सब ऊपर चढ़ने के साथ बदलते हैं, और बहुत जल्दी बदलते हैं।
दक्षिण एशिया के एक ही नक्शे पर ऊँचाई का लगभग पूरा संभव दायरा समा जाता है। पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में फैला गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा समुद्र से बस कुछ मीटर ऊपर है। वहाँ से कुछ सौ किलोमीटर उत्तर की ओर हिमालय, काराकोरम और हिंदूकुश खड़े हैं, धरती की सबसे ऊँची ज़मीन। नेपाल-चीन सीमा पर एवरेस्ट लगभग 8,849 मीटर का है, गिलगित-बाल्टिस्तान में K2 लगभग 8,611 मीटर का, और सिक्किम-नेपाल सीमा पर कंचनजंगा लगभग 8,586 मीटर का, जो भारत का सबसे ऊँचा बिंदु भी है। इन दोनों छोरों के बीच पठार, घाटियाँ और पहाड़ी क़स्बे हैं, और इस इलाक़े की आबादी का बड़ा हिस्सा असल में वहीं रहता है।
एक बारीक फ़र्क़ याद रखने लायक़ है। सटीक भाषा में “एलिवेशन” ज़मीन की ऊँचाई के लिए आता है और “ऑल्टिट्यूड” हवा में किसी चीज़ की ऊँचाई के लिए। हवाई जहाज़ की ऑल्टिट्यूड होती है, क़स्बे की एलिवेशन। हिंदी दोनों के लिए “ऊँचाई” ही बोलती है, पर किसी क़स्बे या मौसम केंद्र के नाम के साथ लिखी ऊँचाई उसकी ज़मीन की ऊँचाई होती है।
पतली हवा और गिरता पारा: ह्रास दर का हिसाब
ऊपर जाने पर दबाव इसलिए घटता है कि सिर के ऊपर टिका वायुमंडल कम रह जाता है। समुद्र तल के पास यह गिरावट तेज़ होती है, और लगभग 5,500 मीटर तक पहुँचते-पहुँचते दबाव तट वाले दबाव का क़रीब आधा बचता है। हवा का कोई टुकड़ा जब ऊपर उठकर इस कम दबाव में पहुँचता है, तो फैल जाता है। फैलने में उसकी अपनी ऊर्जा ख़र्च होती है, इसलिए वह आसपास को कोई गर्मी दिए बिना ही ठंडा हो जाता है। विज्ञान इसे रुद्धोष्म शीतलन कहता है।
तीन दरें काम की हैं:
- पर्यावरणीय ह्रास दर यह बताती है कि शांत हवा में ऊँचाई के साथ तापमान सचमुच कितना गिरता है। इसका औसत लगभग 6.5 °C प्रति 1,000 मीटर है, और दो क़स्बों की तुलना करते समय यही अंक लगाना चाहिए।
- शुष्क रुद्धोष्म दर उस उठती हवा पर लागू होती है जो अभी संतृप्त नहीं हुई। यह क़रीब 9.8 °C प्रति 1,000 मीटर है।
- संतृप्त रुद्धोष्म दर नरम है, लगभग 5 °C प्रति 1,000 मीटर। भाप संघनित होते समय गुप्त ऊष्मा छोड़ती है, जो ठंडक का कुछ हिस्सा काट देती है। मानसून के बादल इतनी ऊँची मीनारें इसी वजह से खड़ी कर पाते हैं।
असली जगहों पर यह गणित तुरंत समझ में आता है। चंडीगढ़ लगभग 320 मीटर पर है और वहाँ से सड़क के रास्ते क़रीब 119 किलोमीटर दूर शिमला लगभग 2,200 मीटर पर। सिर्फ़ ऊँचाई का यह फ़ासला लगभग 12 °C की ठंडक का हिसाब बैठा देता है। पहाड़ी स्टेशनों का पूरा वजूद इसी एक अंतर पर टिका है।
यह नियम अटल नहीं है। सर्दियों की साफ़ रातों में ठंडी हवा ढलानों से नीचे फिसलकर घाटी के तल में भर जाती है, और तब घाटी का निचला हिस्सा ऊपर की ढलानों से ज़्यादा ठंडा हो सकता है। ऊँचाई के साथ पारा गिरने का क्रम उलट जाने को तापमान व्युत्क्रमण कहते हैं, और कश्मीर घाटी तथा हिमाचल की नदी-घाटियों में यह रोज़मर्रा की बात है।
डेल्टा से लद्दाख तक: दक्षिण एशिया की चार मंज़िलें
पहली मंज़िल, मैदान। सिंधु-गंगा का मैदान पंजाब से बंगाल डेल्टा तक लगभग बिना ढलान के बिछा है। मुल्तान से पटना तक गर्मी की तपिश लगभग एक जैसी इसी कारण रहती है, और बाढ़ का पानी इतनी दूर तक इसी कारण फैलता है। बांग्लादेश का अधिकांश भाग समुद्र तल से 10 मीटर से भी कम ऊपर है। तूफानी लहर और नदियों की बाढ़ के आगे यह देश इतना खुला क्यों है, इसकी जड़ में यही एक तथ्य है।
दूसरी मंज़िल, पठार। दक्कन कुछ सौ मीटर ऊपर उठा हुआ है। इसीलिए बेंगलुरु, पुणे और हैदराबाद की गर्मियाँ उसी अक्षांश के तटीय शहरों से साफ़ तौर पर ज़्यादा सहने लायक़ होती हैं। क्वेटा के आसपास बलूचिस्तान का पठार इतना ऊँचा है कि वहाँ असली कड़ाके का जाड़ा पड़ता है।
तीसरी मंज़िल, पहाड़ी स्टेशन। अंग्रेज़ों ने इन्हें ठीक इसी ठंडक की तलाश में बसाया था। मोटे तौर पर इनकी ऊँचाई यह है:
| पहाड़ी शहर | लगभग ऊँचाई (मीटर) |
|---|---|
| शिमला | 2,200 |
| स्कार्दू | 2,200 |
| मसूरी | 2,000 |
| दार्जिलिंग | 2,000 |
| गंगटोक | 1,650 |
| श्रीनगर | 1,600 |
| शिलांग | 1,500 |
उपोष्णकटिबंधीय देश के भीतर इनमें से हर एक समशीतोष्ण मौसम की एक छोटी-सी जेब है।
चौथी मंज़िल, ऊँचा देश। लद्दाख के क़स्बे काफ़ी ऊँचाई पर बसे हैं और लेह लगभग 3,500 मीटर पर। वहाँ ठंड है, हवा बेहद सूखी है और धूप तीखी है — पहाड़ी जंगल नहीं, ऊँचाई का रेगिस्तान। उससे भी ऊपर हिमालय और काराकोरम में जमी बर्फ़ वह पानी सँभालकर रखती है जो सूखे महीनों में सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र को बहता रखता है।
पहाड़ से टकराती हवा: बारिश, वृष्टि-छाया और हिम रेखा
पहाड़ हवा को केवल ठंडा नहीं करते, उसे ऊपर चढ़ने पर मजबूर भी करते हैं। चढ़ती हवा ठंडी होती है, उसकी भाप संघनित होती है और वह बरस पड़ती है। इस पर्वतीय वर्षा से दक्षिण एशिया की बारिश के सबसे तीखे फ़र्क़ समझ आते हैं। पश्चिमी घाट की जिन ढलानों से हवा सीधी आकर टकराती है, वे तर-ब-तर हो जाती हैं, जबकि उनके ठीक भीतर का दक्कन वृष्टि-छाया में पड़ता है। मेघालय की खासी पहाड़ियों पर बंगाल की खाड़ी से आती हवा एक खड़ी कगार से टकराकर अचानक ऊपर धकेली जाती है, और इसी धक्के की बदौलत मासिनराम और चेरापूंजी का नाम दुनिया की उन आबाद बस्तियों में आता है जहाँ सबसे ज़्यादा पानी बरसता है।
दीवार के पीछे यही ज्यामिति उल्टा काम करती है। लद्दाख और हिमालय-पार की घाटियाँ इसलिए शुष्क हैं कि हवा की नमी रास्ते में, हवा की ओर वाली ढलानों पर ही निचोड़ ली जाती है, और जो हवा वहाँ पहुँचती है उसमें बरसाने को कुछ बचा नहीं होता।
तीसरा असर हिम रेखा का है — वह ऊँचाई जिसके ऊपर सर्दियों की वर्षा पानी नहीं, बर्फ़ बनकर गिरती है। कोई पश्चिमी विक्षोभ इस रेखा को कहाँ तक नीचे उतारता है, इस पर बहुत कुछ निर्भर है। हिमाचल या कश्मीर की किसी ढलान पर गिरी बारिश उसी समय बहकर निकल जाती है, जबकि उसी जगह गिरी बर्फ़ महीनों तक जमा पानी की तरह पड़ी रहती है।
रसोई, साँस, धूप और खेत: पहाड़ पर रोज़ का फ़र्क़
प्रेशर कुकर क्यों ज़रूरी है। कम दबाव में पानी कम तापमान पर ही उबलने लगता है — 2,000 मीटर पर लगभग 93 °C पर। शिमला या स्कार्दू में खाना पकने में सचमुच ज़्यादा देर लगती है, और पहाड़ी रसोई में प्रेशर कुकर लगभग अनिवार्य हो जाता है।
साँस फूलना। लगभग 2,500 मीटर से ऊपर ऑक्सीजन की कमी बाहर से आए लोगों पर असर दिखाने लगती है। मैदान से सीधे लद्दाख या ऊँचे हिमालयी दर्रों तक पहुँचने वालों के लिए ऊँचाई की बीमारी एक वास्तविक ख़तरा है। चढ़ाई धीरे-धीरे करना और शरीर को कुछ दिन ढलने देना ही मानी हुई सलाह है।
धूप से झुलसना। ऊपर हवा कम है, इसलिए पराबैंगनी किरणें कम छनकर आती हैं। हवा ठंडी लगे तब भी यूवी सूचकांक समुद्र तल से ऊँचा रहता है, और बर्फ़ उन किरणों का एक हिस्सा लौटाकर सीधे चेहरे पर फेंक देती है।
खेत का सबसे निचला कोना। साफ़ सर्द रातों में ठंडी हवा ढलान से नीचे उतरकर निचले हिस्से में जमा होती है, इसलिए पहाड़ों में पाला अक्सर खेत के सबसे निचले हिस्से में सबसे ज़्यादा नुक़सान करता है।
पहाड़ी शहर का पूर्वानुमान कठिन क्यों होता है
किसी भी मौसम साइट को पढ़ते समय यह बात काम आती है। वैश्विक मौसम मॉडल ज़मीन की बनावट को मोटे ग्रिड पर दिखाते हैं। इसलिए किसी पहाड़ी क़स्बे की ऊँचाई मॉडल की नज़र में उसकी असली ऊँचाई से सैकड़ों मीटर अलग हो सकती है।
खड़ी ढलानों वाले इलाक़े में सैकड़ों मीटर की यह चूक कई डिग्री की तापमान-त्रुटि बन जाती है। पहाड़ी शहरों के पूर्वानुमान मैदानों के मुक़ाबले व्यवस्थित रूप से ज़्यादा कठिन रहते हैं, और इसकी जड़ मौसम-विज्ञान में नहीं, ज्यामिति में है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
हर 1,000 मीटर ऊपर जाने पर तापमान कितना गिरता है? शांत हवा में औसतन 6.5 °C। उठती हुई असंतृप्त हवा इससे तेज़, क़रीब 9.8 °C प्रति 1,000 मीटर की दर से ठंडी होती है, और भाप से भरी संतृप्त हवा धीमे, लगभग 5 °C प्रति 1,000 मीटर।
दोनों दक्षिण में हैं, फिर बेंगलुरु चेन्नई से ठंडा क्यों रहता है? बेंगलुरु दक्कन के पठार पर कुछ सौ मीटर ऊपर बसा है, जबकि चेन्नई ठीक समुद्र किनारे है। ऊँचाई का यह अंतर कुछ डिग्री का फ़र्क़ डालता है, और रात में पठार तट की तुलना में ज़्यादा ठंडा हो जाता है।
क्या ज़्यादा ऊँचाई का मतलब हमेशा ज़्यादा बारिश है? नहीं। ऊँचाई बारिश सिर्फ़ हवा की ओर वाली ढलान पर बढ़ाती है, जहाँ हवा को ऊपर चढ़ना पड़ता है। पहाड़ के पीछे, वृष्टि-छाया में, असर ठीक उल्टा होता है — लद्दाख इसी कारण रेगिस्तान है।
दिल्ली के मुक़ाबले लेह में साँस लेना कठिन क्यों लगता है? ऊँचाई के साथ वायुमंडलीय दबाव घटता है, इसलिए 3,500 मीटर पर ली गई हर साँस में 200 मीटर पर ली गई साँस से कहीं कम ऑक्सीजन के अणु होते हैं। शरीर कुछ दिनों में ढल जाता है, और धीमी चढ़ाई की सलाह इसी लिए दी जाती है।
ऊँचाई का असर ख़ुद परखना हो तो किन शहरों को मिलाकर देखूँ? मैदान के पटना, दक्कन के पठार पर बसे हैदराबाद, समुद्र किनारे के चेन्नई और साथ में दिल्ली का पूर्वानुमान एक ही दिन साथ-साथ खोलिए और दिन का अधिकतम तथा रात का न्यूनतम तापमान आमने-सामने रखिए। हर फ़र्क़ ऊँचाई का नहीं होता — अक्षांश और समुद्र की नज़दीकी भी अपना हिस्सा जोड़ते हैं — इसलिए पढ़ते समय यह भी ध्यान रखिए कि कौन-सा शहर किस ज़मीन पर बसा है।