ऐसा इलाक़ा जिसका तापमान, बारिश और मौसमों का क्रम दशकों तक मोटे तौर पर एक जैसा रहता है। दक्षिण एशिया ने गरम रेगिस्तान, मानसूनी तट, सवाना पठार, सूखी सर्दी वाला मैदान और स्थायी बर्फ़ — सब एक ही उपमहाद्वीप में समेट रखे हैं।
जलवायुजलवायु क्षेत्र क्या है?
रात भर की एक ट्रेन आपको गरम रेगिस्तान से उठाकर सिंचाई वाले मैदान में छोड़ सकती है। एक छोटी उड़ान उस तट से, जहाँ साल में कई मीटर पानी गिरता है, उस भीतरी इलाक़े तक पहुँचा देती है जो वृष्टि-छाया में पड़ा है और बार-बार सूखे में फिसल जाता है। “भारत की जलवायु” को एक ही चीज़ मान लेने पर यही सारा फ़र्क़ ग़ायब हो जाता है।
जलवायु क्षेत्र इसी फ़र्क़ को पकड़ने का तरीक़ा है। यह ऐसा इलाक़ा होता है जिसका लंबे समय का मौसम मोटे तौर पर एक ही ढंग से बरतता है — तापमान की वैसी ही रेंज, बारिश का वैसा ही कुल, और सबसे बढ़कर मौसमों का वैसा ही क्रम। यह दशकों के अवलोकनों का निचोड़ है, आने वाले दिनों का अनुमान नहीं।
लेबल एक सीधा सवाल हल करता है: यहाँ सामान्य क्या है? किसान को यह बताता है कि कौन-सा फ़सल कैलेंडर इस जगह बैठेगा, इंजीनियर को कि नाली को कितना पानी ढोना पड़ेगा, और सफ़र पर निकले आदमी को कि सामान उमस के हिसाब से बाँधना है या ठंडी रातों के हिसाब से। गुरुवार को बारिश होगी या नहीं, यह लेबल नहीं बताता; उसके लिए मौसम पूर्वानुमान ही काम आता है।
कोपेन के अक्षर: जलवायु को कोड में कैसे बाँधा जाता है
जलवायु वैज्ञानिक व्लादिमीर कोपेन का बनाया वर्गीकरण, जिसे उनके बाद भी बार-बार सुधारा गया, आज तक सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाली प्रणाली है। यह जलवायु को तापमान और वर्षा के आधार पर छाँटता है और नतीजा छोटे-छोटे अक्षर-कोड में लिख देता है।
पहला अक्षर बड़ा समूह बताता है:
- A — उष्णकटिबंधीय: हर महीना गरम, ठंड का कोई असली मौसम नहीं
- B — शुष्क: साल भर में वाष्पीकरण वर्षा से ज़्यादा
- C — शीतोष्ण या उपोष्ण: सर्दियाँ नरम
- D — महाद्वीपीय: सर्दियाँ सचमुच कड़ी
- E — ध्रुवीय या ऐल्पाइन: गरम मौसम आता ही नहीं
दूसरा और तीसरा अक्षर तस्वीर को बारीक करते हैं। A समूह में f का मतलब है कोई शुष्क मौसम नहीं, m का मतलब बेहद बरसाती साल के भीतर एक छोटा शुष्क दौर — यही “मानसूनी” किस्म है — और w का मतलब साफ़-साफ़ सूखी सर्दी। B समूह में W रेगिस्तान के लिए है और S स्टेपी या अर्ध-शुष्क के लिए, जबकि h गरम बताता है और k ठंडा। C समूह में w फिर सूखी सर्दी का निशान है और a गरम गर्मी का — इन्हीं से बनता है Cwa, वह कोड जो उत्तर भारत के बड़े हिस्से पर चिपका हुआ है।
कोपेन अकेली प्रणाली नहीं है। भारत और पाकिस्तान के कृषि नियोजक अपना अलग कृषि-जलवायु ज़ोनिंग इस्तेमाल करते हैं, जो कोपेन से कहीं ज़्यादा बारीक है — क्योंकि धान की पट्टी और बाजरे की पट्टी एक ही कोपेन अक्षर साझा कर सकती हैं और फिर भी उन्हें बिलकुल अलग सलाह चाहिए।
जलवायु क्षेत्र भारत और दक्षिण एशिया में
उपमहाद्वीप लगभग पूरी कोपेन वर्णमाला को एक ही नक़्शे में समेट लेता है।
- गरम रेगिस्तान (BWh)। पश्चिमी राजस्थान और थार, सिंध का बड़ा हिस्सा, बलूचिस्तान के बड़े इलाक़े। भीषण गर्मी, बहुत कम और बेहद अनिश्चित बारिश, दिन और रात के तापमान में बड़ा अंतर। बीकानेर, जोधपुर और सुक्कुर इसी पट्टी में या इसके किनारे पर बैठे हैं।
- गरम अर्ध-शुष्क (BSh)। रेगिस्तान के चारों ओर का संक्रमण घेरा और भीतरी दक्कन से होकर गुज़रती एक लंबी पट्टी। बारिश आती तो है, पर भरोसे की नहीं। सूखे की मार सबसे ज़्यादा इसी श्रेणी पर पड़ती है।
- उष्णकटिबंधीय सवाना (Aw)। प्रायद्वीपीय भारत का ज़्यादातर हिस्सा — दक्कन का पठार, भीतरी कर्नाटक, तेलंगाना, भीतरी तमिलनाडु। एक गरम-सूखा मौसम, एक मानसूनी बरसाती मौसम, और सर्दी नाम की लगभग कोई चीज़ नहीं।
- उष्णकटिबंधीय मानसूनी (Am)। मालाबार और कोंकण तट, तटीय कर्नाटक और गोवा, अंडमान द्वीप, पूर्वोत्तर के कुछ हिस्से और तटीय बांग्लादेश। सालाना बारिश बहुत ऊँची, मगर चंद महीनों में सिमटी हुई। इसी के लिए अलग से उष्णकटिबंधीय मानसूनी जलवायु की प्रविष्टि बनी है।
- सूखी सर्दी वाली आर्द्र उपोष्ण (Cwa)। पंजाब से उत्तर प्रदेश और बिहार होते हुए उत्तरी पश्चिम बंगाल तथा बांग्लादेश तक फैला सिंधु-गंगा का मैदान। गरम गर्मियाँ, मानसूनी बारिश, और एक सचमुच ठंडी, सूखी, कोहरे वाली सर्दी।
- ऐल्पाइन और ठंडा रेगिस्तान। हिमालय, काराकोरम और हिंदूकुश। पेड़ों की सीमा के ऊपर कोड ठंडी स्टेपी से टुंड्रा तक और ऊँचे ग्लेशियरों पर स्थायी बर्फ़ तक पहुँच जाते हैं। लद्दाख़ की भीतरी घाटियाँ ठंडे रेगिस्तान हैं: वे इसलिए सूखी नहीं हैं कि गरम हैं, बल्कि इसलिए कि पहाड़ नमी को वहाँ पहुँचने से पहले ही निचोड़ लेते हैं।
तीनों देशों में सबसे कम विविधता बांग्लादेश में है — वह लगभग पूरा का पूरा गरम, नम, मानसून-प्रधान सिरे पर बैठा है। फिर भी वहाँ भी दक्षिण-पूर्व के पहाड़ी इलाक़े डेल्टा से अलग बरताव करते हैं।
सीमाएँ वहीं क्यों बैठी हैं, और वे खिसक क्यों रही हैं
इन सीमाओं को खींचने का ज़्यादातर काम तीन चीज़ें करती हैं।
ऊँचाई। तापमान ऊँचाई के साथ गिरता है, इसलिए एक ही ढलान पर कई क्षेत्र एक के ऊपर एक जम जाते हैं। शिमला और पंजाब के मैदान नक़्शे पर पास-पास हैं और जलवायु में एक-दूसरे के आसपास भी नहीं।
वृष्टि-छाया। पश्चिमी घाट मानसून को इतनी कुशलता से रोक लेते हैं कि हवा की ओर वाली ढलानें धरती की सबसे भीगी आबाद जगहों में गिनी जाती हैं, जबकि भीतरी दक्कन — पूरब में बस कुछ सौ किलोमीटर दूर — अर्ध-शुष्क रह जाता है। हिमालय यही काम और बड़े पैमाने पर तिब्बती तरफ़ के लिए और लद्दाख़ के लिए करता है।
नमी के स्रोत से दूरी। मानसून उपमहाद्वीप पर उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ते-बढ़ते कमज़ोर पड़ता जाता है, इसीलिए बारिश आम तौर पर बंगाल की खाड़ी के तट से थार की तरफ़ घटती चली जाती है।
ये सीमाएँ पत्थर पर खुदी नहीं हैं। कोपेन की शुष्क-जलवायु कसौटी वर्षा के साथ-साथ तापमान पर भी टिकी है, इसलिए गरम होता वायुमंडल ऐसी जगह की श्रेणी तक बदल सकता है जहाँ बारिश में कोई फ़र्क़ नहीं आया। नक़्शा बनाने वाले अध्ययन पाते हैं कि दक्षिण एशिया के कुछ हिस्सों में शुष्क और अर्ध-शुष्क श्रेणियाँ फैल रही हैं और ऊँचाई वाली श्रेणियाँ ढलान पर ऊपर की ओर सिमट रही हैं। इसीलिए किसी भी जलवायु नक़्शे को उसी दौर की तस्वीर मानकर पढ़िए जिसके आँकड़ों से वह बना है — जलवायु परिवर्तन इन लेबलों को भी धीरे-धीरे हिला रहा है।
फ़सल कैलेंडर, नाली का नाप, और वह सब जो औसत छिपा लेता है
जिस किसान की फ़सल बारिश पर टिकी है, उसके लिए लेबल आधी कहानी है। दो जगहें एक ही Aw ठप्पा साझा कर सकती हैं और इस मामले में बहुत अलग हो सकती हैं कि बारिश कितने भरोसे से आती है — और बिना सिंचाई वाली खेती में कुल बारिश से ज़्यादा उसी भरोसे की क़ीमत है।
ढाँचा बनाने वालों के काम भी यही लेबल आता है। नाली और पुलिया का नाप, छत का ढाल, दीवार की मोटाई, स्कूल की छुट्टियों का कैलेंडर — ये सब इस पर तय होते हैं कि जगह सामान्य तौर पर कैसी रहती है, किसी एक साल में कैसी रही इस पर नहीं।
पर औसत ठीक वही चीज़ें छिपा लेता है जो चोट पहुँचाती हैं। क्षेत्र का लेबल चरम घटनाओं के बारे में कुछ नहीं कहता। सिंधु-गंगा के मैदान पर लगा Cwa का ठप्पा न मानसून से पहले आने वाली झोंकेदार आँधी की चेतावनी देता है, न जनवरी की शीतलहर की, न उस सर्दियों वाले धुएँ-कोहरे की जो तापीय व्युत्क्रमण के नीचे जम जाता है। मौसम, फ़सल या इमारत की योजना बनाते समय क्षेत्र से उम्मीदें तय कीजिए; अगले हफ़्ते के लिए पूर्वानुमान देखिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत का ज़्यादातर हिस्सा किस कोपेन जलवायु क्षेत्र में आता है? कोई एक जवाब है ही नहीं, और असल बात यही है। प्रायद्वीप के सबसे बड़े हिस्से पर उष्णकटिबंधीय सवाना (Aw) है, उत्तरी मैदानों पर सूखी सर्दी वाली आर्द्र उपोष्ण (Cwa), उत्तर-पश्चिम पर गरम रेगिस्तान और अर्ध-शुष्क श्रेणियाँ, भीगे तटों पर उष्णकटिबंधीय मानसूनी, और हिमालय पर ऐल्पाइन तथा बर्फ़ वाली श्रेणियाँ।
मौसम और जलवायु में फ़र्क़ क्या है? मौसम वायुमंडल की अभी की और अगले कुछ दिनों की हालत है। जलवायु दशकों के पैमाने पर उसी जगह के मौसम का सांख्यिकीय बरताव है। दिल्ली की एक ठंडी सुबह दिल्ली की जलवायु के बारे में कुछ नहीं कहती; तीस साल की सुबहें कहती हैं।
पश्चिमी घाट का एक पहलू दूसरे से इतना भीगा क्यों है? वजह वृष्टि-छाया है। मानसूनी हवाओं को पश्चिमी ढलान पर ऊपर चढ़ना पड़ता है, वे ठंडी होती हैं और अपनी नमी वहीं गिरा देती हैं। पूरब की तरफ़ उतरते-उतरते हवा अपना ज़्यादातर पानी गँवा चुकी होती है, इसलिए भीतरी दक्कन तुलना में सूखा रह जाता है।
क्या दक्षिण एशिया के जलवायु क्षेत्र बदल रहे हैं? वर्गीकरण बारिश के साथ तापमान पर भी टिका है, इसलिए अकेला गरम होना भी एक सीमा सरका सकता है। बार-बार किए गए मानचित्रण पाते हैं कि शुष्क श्रेणियाँ फैल रही हैं और ऊँचाई वाली श्रेणियाँ ऊपर की ओर खिसक रही हैं। यह बदलाव धीमा है और किसी एक साल में नहीं, लंबे रिकॉर्ड में दिखाई देता है।
रोज़मर्रा में किसी क्षेत्र का मिज़ाज कैसे परखूँ? एक ही तारीख़ पर अलग-अलग क्षेत्रों के शहर आमने-सामने रखकर देखिए। मानसूनी तट के लिए कोच्चि और मुंबई, दक्कन के सवाना के लिए हैदराबाद, सूखी सर्दी वाले मैदान के लिए लखनऊ और पटना, और पूर्वोत्तर के भीगे कोने के लिए गुवाहाटी। कुछ हफ़्ते इन्हें साथ देखने पर लेबल किताबी नहीं रह जाता।