ऐसी गरम जलवायु जिसमें जाड़े का कोई मौसम नहीं होता और सूखा दौर छोटा रहता है, क्योंकि भारी मानसूनी बारिश पूरे साल का पानी पहले ही जमा कर देती है। दक्षिण एशिया में यह मालाबार और कोंकण तटों, बांग्लादेश के बड़े हिस्से और पूर्वोत्तर में मिलती है।
जलवायुउष्णकटिबंधीय मानसून जलवायु क्या है?
कोच्चि, मंगलौर या चटगाँव में रहने वाले रोज़ इसी जलवायु में जीते हैं। जाड़ा वहाँ आता ही नहीं, और बरसात इतनी भरपूर होती है कि बाद के गिने-चुने सूखे महीने पानी का संकट नहीं, बस एक ठहराव लगते हैं। साल भर का ज़्यादातर पानी कुछ ही महीनों में बरसता है, और बाक़ी साल उसी जमा पूँजी पर कटता है।
दुनिया में सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला जलवायु वर्गीकरण, कोपेन, इसे Am कोड देता है: बड़ा A उष्णकटिबंधीय समूह का, छोटा m मानसून का। इसके एक ओर बारहों महीने भीगी उष्णकटिबंधीय वर्षावन जलवायु (Af) है, दूसरी ओर लंबे, कड़े सूखे वाली उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु (Aw)।
नाम थोड़ा भरमाता है। Am हवाओं से नहीं, तापमान और वर्षा के आँकड़ों से परिभाषित होता है। दक्षिण एशिया इसकी मिसाल है, पर बारिश का यही ढर्रा कैरिबियन के कुछ हिस्सों और अमेज़न के किनारों पर भी मिलता है, जहाँ इसके पीछे मानसूनी हवाओं का कोई पलटाव नहीं होता।
18°C, 60 मिमी और एक घटाव: कोपेन की तीन कसौटियाँ
तीन सवाल तय क्रम में पूछे जाते हैं, और इन्हें जानना काम का है, क्योंकि दो सटे हुए भारतीय ज़िलों की जलवायु-सीमा अक्सर कुछ मिलीमीटर बारिश पर टिकी होती है।
- क्या जगह उष्णकटिबंधीय (A समूह) है? हर महीने का औसत तापमान कम से कम 18°C होना चाहिए। दिल्ली या लाहौर की जनवरी इसके लिए बहुत ठंडी है, सो पूरा उत्तरी मैदान और सारे पहाड़ यहीं छँट जाते हैं।
- क्या यह वर्षावन (Af) है? सबसे सूखे महीने में भी 60 मिमी या उससे ज़्यादा पानी गिरे, तो जलवायु Af है — बारहमासी गीली। पश्चिमी घाट के कुछ छोटे टुकड़े इसी खाने में बैठते हैं।
- Am या Aw? सबसे सूखा महीना 60 मिमी से नीचे रह जाए, तो साल भर की वर्षा (मिमी में) को पच्चीस से भाग दीजिए और नतीजा 100 में से घटा दीजिए। सबसे सूखे महीने को कम से कम इतना पानी मिला हो तो जगह Am है; न मिला हो तो Aw, यानी उष्णकटिबंधीय सवाना, जिसके तहत दक्कन का ज़्यादातर हिस्सा आता है।
इस श्रेणी की जान तीसरी कसौटी में है: सालाना कुल जितना बड़ा, दहलीज़ उतनी नीची। भारी बरसात वाली जगह का कोई महीना लगभग कोरा निकल जाए, तब भी वह Am में टिकी रहती है, क्योंकि बरसात पहले ही इतना पानी जमा कर चुकी होती है कि सूखे महीने मिट्टी की नमी, लबालब तालाबों और ऊँचे भूजल पर चलते हैं।
दहलीज़ें एकदम सटीक हैं, पर वर्षा के आँकड़े उतने पक्के नहीं, इसलिए छपे नक़्शे किनारों पर असहमत रहते हैं। मुंबई इस रेखा के इतने पास है कि अलग-अलग डेटासेट उसे अलग श्रेणी में रखते हैं। रेखा के आर-पार मौसम ज़रा भी नहीं बदलता, सिर्फ़ काग़ज़ पर नाम बदलता है।
मालाबार से चटगाँव तक: Am पट्टी का फैलाव
उपमहाद्वीप में यह पट्टी समुद्र-तटों और सबसे भीगे निचले मैदानों का पीछा करती है।
- मालाबार तट — केरल और तटीय कर्नाटक, जिनमें तिरुवनंतपुरम, कोच्चि और मंगलौर आते हैं — इसकी सबसे साफ़ मिसाल है। दक्षिण-पश्चिमी मानसून के रास्ते में खड़े पश्चिमी घाट हवा की ओर वाली ढलानों पर हर साल कई हज़ार मिलीमीटर पानी निचोड़ लेते हैं।
- कोंकण तट और गोवा यही ढर्रा उत्तर की ओर ले जाते हैं, बस सूखा मौसम ज़रा ज़्यादा तीखा है।
- तटीय बांग्लादेश और चटगाँव की पट्टी को बंगाल की खाड़ी से बहुत भारी मानसूनी बारिश मिलती है; सूखा समय सर्दियों में सिमटा रहता है।
- पूर्वोत्तर की तलहटी — असम, मेघालय, त्रिपुरा और अरुणाचल प्रदेश के हिस्से — उसी धारा से पानी पाती है, जिसे पहाड़ ऊपर चढ़ने को मजबूर करते हैं। दुनिया की सबसे ज़्यादा बारिश झेलने वाली कुछ बस्तियाँ यहीं हैं।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह नक़्शा पूरा करता है। साल का पहिया हर जगह एक ढंग से घूमता है:
- दिसंबर से मार्च: सूखा, धूप भरा और तुलना में आरामदेह समय।
- अप्रैल और मई: साल के सबसे गरम और दमघोंटू महीने। जून से मानसूनी बादल तापमान पर ढक्कन रख देते हैं, इसलिए चरम गर्मी बरसात से पहले ही निकल जाती है।
- जून से सितंबर या अक्टूबर: बरसात, जब आर्द्रता लगभग संतृप्ति छूती है और हफ़्तों बादल छाए रहते हैं।
सबसे गरम और सबसे ठंडे महीने के बीच बस कुछ डिग्री का अंतर रहता है। यहाँ मौसम का असली पैमाना पारा नहीं, वर्षा है।
नारियल, लैटेराइट और खपरैल: भारी बरसात के साथ जीना
खेती। केरल और कर्नाटक तट की बारहमासी फ़सलें — नारियल, रबर, सुपारी, काली मिर्च, इलायची और दूसरे मसाले — तभी फलती हैं जब सूखे महीने इतने छोटे रहें कि पेड़ों को सचमुच की प्यास न झेलनी पड़े। तटीय बांग्लादेश में यही लय धान और जूट को सँभालती है, और खारे किनारों पर झींगा पालन को।
मिट्टी और पानी। बरस-दर-बरस की भारी बारिश मिट्टी के पोषक तत्व धो ले जाती है; पश्चिमी तट की लैटेराइट मिट्टी इसीलिए लाल और लोहे से भरी है और उसमें खाद का हिसाब सँभलकर रखना पड़ता है। पारंपरिक जल-तंत्र यहाँ दुर्लभ पानी की खोज के लिए नहीं, अतिरिक्त पानी सहेजने के लिए बने हैं।
घर और दिनचर्या। खड़ी ढलान वाली खपरैल छतें, गहरे छज्जे और ऊँचे चबूतरों पर उठे घर चार महीने की तेज़ बरसात का जवाब हैं। बरसात में घर की परेशानी धूल नहीं, सीलन और फफूँद है। निर्माण, शादियाँ और सैलानी — तीनों इसीलिए सूखे महीनों में सिमटते हैं।
ख़तरे। खड़ी ढलानों पर तेज़ बारिश पश्चिमी घाट और पूर्वोत्तर की पहाड़ियों में भूस्खलन लाती है। निचले तटीय बांग्लादेश में बाढ़ बारिश, नदियों के उफान और चक्रवात की तूफानी लहर से आती है, कभी-कभी तीनों से एक साथ। सबसे भारी बारिश के बाद मच्छरों से फैलने वाली बीमारियाँ पूरी पट्टी में बढ़ती हैं।
घाट के उस पार, मैदान के ऊपर: पड़ोसी जलवायु से तुलना
मालाबार तट से भीतर चलिए तो दक्कन की सवाना जलवायु शुरू हो जाती है। गरमी वहाँ भी साल भर है, मगर घाट के पूरब की वृष्टि-छाया बारिश घटा देती है और सूखे मौसम को इतना खींच देती है कि पानी की असली तंगी आ जाती है।
उत्तर की तरफ़ बढ़ें तो उष्णकटिबंध ही पीछे छूट जाता है। सिंधु-गंगा के मैदान में ठंडी सर्दी और मानसून से पहले की बेरहम गर्मी है — यह आर्द्र उपोष्ण जलवायु है, उष्णकटिबंधीय नहीं।
सबसे ज़्यादा सिखाने वाला अपवाद तमिलनाडु का तट है। दक्षिण-पश्चिमी मानसून के दिनों में यह घाट की वृष्टि-छाया में रहता है और ज़्यादातर बारिश उत्तर-पूर्वी मानसून से पाता है। नतीजतन चेन्नई के सबसे गीले महीने वही होते हैं जब कोच्चि सूखने लगता है — “दक्षिण भारत का तट” कहना काफ़ी नहीं, पूछना पड़ता है कि कौन-सा।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत के कौन-से शहर इस जलवायु में आते हैं? सबसे साफ़ नाम पश्चिमी तट के हैं: तिरुवनंतपुरम, कोच्चि, मंगलौर और गोवा-कोंकण का तट; पूर्वोत्तर के कुछ हिस्से भी। मुंबई उष्णकटिबंधीय सवाना जलवायु की सीमा पर है, इसलिए डेटासेट बदलते ही उसकी श्रेणी बदल जाती है।
Am और Aw में असली फ़र्क़ क्या है? गरमी और सूखा मौसम दोनों में है। फ़र्क़ सालाना कुल का है: Am में वह इतना बड़ा है कि सूखे महीने झटका नहीं देते, जबकि दक्कन और भीतरी प्रायद्वीप वाले Aw में सूखा मौसम सचमुच की किल्लत लाता है।
क्या यह जलवायु और मानसून एक ही चीज़ हैं? नहीं। मानसून हवाओं का मौसमी पलटाव है; Am तापमान और वर्षा की दहलीज़ों से तय एक सांख्यिकीय श्रेणी है। दक्षिण एशिया में दोनों साथ चलते हैं, नाम भी यहीं से आया, पर विचार दो हैं।
केरल या कोंकण घूमने कब जाएँ? दिसंबर से मार्च के बीच, जब बारिश थम चुकी होती है और उमस उतर जाती है। अप्रैल-मई सबसे गरम और चिपचिपे महीने हैं, और जून से सितंबर तक लगातार भारी बारिश के साथ पहाड़ों में भूस्खलन का डर रहता है।
इस जलवायु का हाल लाइव कहाँ देखूँ? कोच्चि का मौसम इस श्रेणी की सबसे सीधी झलक देता है, और मुंबई Am और Aw की सीमा का हाल दिखाता है। उलटा कैलेंडर देखना हो तो चेन्नई को कोच्चि के बगल में रखिए। उत्तरी मैदान इस श्रेणी से बाहर क्यों हैं, यह जनवरी में दिल्ली का पारा बता देगा।