वायुमंडल की कुछ गैसें ज़मीन से उठती गर्मी को सोखकर उसका एक हिस्सा वापस नीचे लौटा देती हैं, और इसी से धरती रहने लायक़ गर्म बनी रहती है। यह प्रभाव प्राकृतिक और ज़रूरी है; इंसानी उत्सर्जन ने इसे और तेज़ कर दिया है।
जलवायुग्रीनहाउस प्रभाव क्या है?
कोच्चि या चटगाँव की उमस भरी साफ़ रात भोर तक गर्म रहती है, जबकि थार के रेगिस्तान में वैसी ही रात पारा बीस डिग्री या उससे भी ज़्यादा गिरा सकती है। सूरज दोनों जगह डूब चुका है; फ़र्क़ ऊपर की हवा का है। तट की नम हवा ज़मीन से उठती अवरक्त गर्मी सोखकर उसका बड़ा हिस्सा नीचे लौटा देती है, और रेगिस्तान की सूखी हवा उसे अंतरिक्ष में जाने देती है।
पूरी पृथ्वी के पैमाने पर यही ग्रीनहाउस प्रभाव है। गर्मी सोखने वाली ये गैसें बिल्कुल न होतीं, तो धरती की सतह का औसत तापमान आज से लगभग 33°C कम होता — हिमांक से बहुत नीचे, न तरल पानी, न मानसून। यानी यह प्रभाव मुसीबत नहीं, उस जलवायु की शर्त है जिसके भरोसे दक्षिण एशिया खेती करता है।
दिक़्क़त यह है कि इस प्रभाव की एक घुंडी है, और जीवाश्म ईंधन जलाकर हम उसे लगातार ऊपर घुमा रहे हैं। कार्बन डाइऑक्साइड अब औद्योगिक युग से पहले वाली सांद्रता की डेढ़ गुना से भी ज़्यादा है, और भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश में दर्ज हो रही गर्माहट के पीछे यही अतिरिक्त सोखना है।
आर-पार निकलती धूप, रास्ते में अटकती गर्मी
नाम ख़ुद भ्रामक है। काँच वाला ग्रीनहाउस मुख्यतः इसलिए गर्म रहता है कि काँच गर्म हवा को ऊपर उठकर निकलने नहीं देता, यानी संवहन दबा देता है। वायुमंडल कुछ और करता है, इसीलिए यह प्रभाव रात और सर्दी में भी चलता रहता है।
विकिरण दो क़िस्म का है, और फ़र्क़ स्रोत के तापमान से आता है:
- आती धूप लगभग 5,500°C वाली सूर्य की सतह से, ज़्यादातर दृश्य प्रकाश और निकट-अवरक्त के रूप में पहुँचती है। वायुमंडल इसके लिए लगभग पारदर्शी है, सो यह सीधे ज़मीन तपाती है।
- धरती का लौटता विकिरण लगभग 15°C वाली सतह से, लंबी तरंगों वाले तापीय अवरक्त में निकलता है। यहाँ वायुमंडल पारदर्शी नहीं: जलवाष्प, कार्बन डाइऑक्साइड, मीथेन और दूसरी सूक्ष्म गैसों की अवशोषण-पट्टियाँ इसी दायरे में फैली हैं।
सोखी गई ऊर्जा हर दिशा में, नीचे की ओर भी, दोबारा छोड़ी जाती है। ज़मीन को ऊर्जा दो बार मिलती है — सूरज से और ऊपर की हवा से — इसलिए सारी ऊर्जा वापस छोड़ पाने के लिए उसे ऊँचे तापमान पर टिकना पड़ता है।
गैस और बढ़े तो वह ऊँचाई भी ऊपर खिसकती है जहाँ से ग्रह की गर्मी अंतरिक्ष में निकलती है। वहाँ हवा ठंडी है, ठंडी चीज़ कम कुशलता से विकिरण छोड़ती है, और पूरे स्तंभ को तब तक गर्म होना पड़ता है जब तक आने-जाने वाली ऊर्जा का बही-खाता बराबर न हो जाए।
भाप, कार्बन और मीथेन: किस गैस का कितना हाथ
हर गैस की भूमिका अलग है, और इसी से तय होता है कि नीति क्या बदल सकती है।
- जलवाष्प प्राकृतिक प्रभाव में सबसे बड़ा हिस्सा रखती है, मगर हवा कितनी नमी थामेगी, यह तापमान तय करता है। भाप गर्माहट शुरू नहीं करती, उसे बढ़ाती है: ग्रह किसी और वजह से ज़रा गर्म हो, तो बढ़ी भाप उस असर को मोटे तौर पर दोगुना कर देती है, और इसे सीधे कोई क़ाबू नहीं करता।
- कार्बन डाइऑक्साइड असली नियंत्रक घुंडी है। लंबे समय तक टिकती है, संघनित होकर बरसती नहीं, और इसकी मात्रा उत्सर्जन से तय होती है।
- मीथेन सौ साल के हिसाब से टन-दर-टन कहीं ज़्यादा ताक़तवर है, पर लगभग एक दशक ही टिकती है। दक्षिण एशिया में इसके मुख्य स्रोत हैं गंगा के मैदान और बंगाल डेल्टा के पानी भरे धान के खेत, मवेशी (भारत में दुनिया की सबसे बड़ी मवेशी आबादियों में से एक है), कूड़े के ढेर और गैस के ढाँचे का रिसाव।
- नाइट्रस ऑक्साइड ज़्यादातर नाइट्रोजन उर्वरक से आती है, जो पंजाब, हरियाणा, सिंध और बांग्लादेश के सिंचित मैदानों में भरपूर डाला जाता है।
- निचले वायुमंडल की ओजोन प्रदूषक भी है और ग्रीनहाउस गैस भी। बड़े शहरों की गर्म, धूप भरी, गाड़ियों से लदी हवा में यह आसानी से बनती है।
गर्म रातें, तेज़ बौछारें, घटती बर्फ़: उपमहाद्वीप का हिसाब
इस इलाक़े में बदलाव की लिखावट रात के पारे में भी दिखती है। मज़बूत प्रभाव सूरज ढलने के बाद ठंडक धीमी कर देता है, इसलिए न्यूनतम तापमान भी अधिकतम के साथ-साथ चढ़ता है।
- उमस। गर्म हवा में भाप ज़्यादा रहती है, इसलिए तटों और पूर्वी मैदानों में वे दिन बढ़ रहे हैं जब ऊँचा तापमान और ऊँची आर्द्रता मिलकर पसीने की ठंडक बेअसर कर देते हैं।
- बौछारें। गर्म वायुमंडल ज़्यादा नमी ढोता है, इसलिए मानसून जब बरसता है तो कम समय में ज़्यादा पानी उड़ेल सकता है। मौसम भर का जोड़ बड़े परिसंचरण से तय होता है, पर एक-एक दौर की तीव्रता गर्माहट से कहीं सीधे जुड़ी है।
- मानसून से पहले की तपिश और तीखी पड़ रही है।
- हिमालय की बर्फ़। सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र का सूखे महीनों वाला बहाव बर्फ़ और ग्लेशियरों के पिघलने पर टिका है। गर्माहट यह भंडार धीरे-धीरे और हमेशा के लिए ख़र्च कर रही है, और निचले बहाव में दसियों करोड़ लोग बसे हैं।
- डेल्टा। बंगाल और सिंधु के डेल्टा में समुद्र-स्तर चढ़ रहा है।
रात की राहत छिन जाए तो: शरीर और खेत
दिन भर की जमा गर्मी शरीर रात में बाहर निकालता है। रात गर्म रहे तो यह मौक़ा नहीं मिलता। जिस लू से लोग रात भर में उबर जाते हैं और जिससे नहीं उबर पाते, उनके बीच की रेखा यहीं खिंचती है: दिल्ली, लखनऊ, कराची या ढाका में अस्पताल उन्हीं दौरों में भरते हैं जिनमें रातें भी गर्म रहती हैं।
खेती का रिश्ता दोतरफ़ा है। प्राकृतिक प्रभाव के बिना यहाँ कोई फ़सल ही न होती, पर पानी भरे धान के खेत, मवेशी और उर्वरक ख़ुद मीथेन व नाइट्रस ऑक्साइड के स्रोत हैं। मीथेन वायुमंडल में कम समय टिकती है, इसलिए उसके उत्सर्जन में कटौती का फ़ायदा एक इंसानी उम्र के भीतर दिख जाता है।
धुंध का पर्दा: जो गर्मी अभी दिख नहीं रही
दक्षिण एशिया की तस्वीर वैश्विक से ज़्यादा उलझी है, क्योंकि जिन कामों से ये गैसें निकलती हैं, उन्हीं से भारी मात्रा में एरोसोल भी निकलते हैं — सल्फ़ेट कण, धूल और काला कार्बन यानी कालिख। सूखे मौसम में सिंधु-गंगा के मैदान पर टिकी धुंध इन्हीं की बनी है।
ये कण ज़मीन तक पहुँचने वाली धूप काटते हैं। कालिख ऊपर की हवा को गर्म करती है और नीचे सतह पर छाया डालती है। नतीजा यह रहा कि ग्रीनहाउस गर्माहट का एक हिस्सा ढका रह गया, और काफ़ी शोध के मुताबिक़ ज़मीन और समुद्र के तापमान का वह अंतर भी कमज़ोर पड़ा जो गर्मियों के मानसून को खींच लाता है।
हवा साफ़ करना सेहत के लिए बेशक अच्छा है, पर इससे यह पर्दा कुछ हद तक उठ जाता है। नीचे छिपी गर्माहट कहीं नहीं जाती; वह बस ज़्यादा साफ़ दिखने लगती है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या ग्रीनहाउस प्रभाव अपने-आप में नुक़सानदेह है? नहीं। प्राकृतिक प्रभाव धरती को लगभग 33°C ज़्यादा गर्म रखता है, और उसी के सहारे यहाँ खेती संभव है। नुक़सान इंसानों की जोड़ी गई गैसों से आई अतिरिक्त गर्माहट का है।
भाप सबसे ताक़तवर ग्रीनहाउस गैस है, तो उँगली कार्बन डाइऑक्साइड पर क्यों? भाप की मात्रा तापमान तय करता है, उत्सर्जन नहीं, और वह कुछ ही दिनों में बारिश बनकर निकल जाती है। कार्बन डाइऑक्साइड सदियों टिकती है और वही तापमान तय करती है जिससे हवा में भाप की मात्रा बनती है।
लू में रात का तापमान इतना अहम क्यों है? यह प्रभाव सूरज ढलने के बाद भी चलता है और रात की ठंडक धीमी कर देता है। शरीर को ज़रूरी विश्राम नहीं मिलता, इसलिए उमस भरी गर्म रातों वाली लू उससे ज़्यादा ख़तरनाक होती है, जितनी वह दिन के अधिकतम तापमान को देखकर लगती है।
शहर के आँकड़ों में ग्रीनहाउस असर की छाप कहाँ पढ़ूँ? हर शहर के पन्ने पर मौजूदा हालात और पूर्वानुमान के साथ रात का न्यूनतम तापमान भी मिलता है — जैसे दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता, कोच्चि या बीकानेर, जहाँ रेगिस्तान में दिन और रात के तापमान का फ़र्क़ सबसे नाटकीय रूप में दिखता है। गर्मियों में दिन के अधिकतम के साथ-साथ उसी न्यूनतम पर भी नज़र रखिए: जिन रातों में पारा मुश्किल से नीचे उतरता है, शरीर की थकान भी उन्हीं में नहीं उतरती।