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कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)

कोयला, तेल और गैस जलाने से निकलने वाली दीर्घजीवी ग्रीनहाउस गैस। औद्योगिक युग से पहले हवा में इसकी मात्रा लगभग 280 पीपीएम थी, जो आज 420 पीपीएम के पार जा चुकी है।

जलवायु

हवा में ज़रा-सी, असर में भारी

इस गैस का हर अणु कार्बन के एक परमाणु और ऑक्सीजन के दो परमाणुओं से बना है। न इसका कोई रंग है, न कोई गंध। यह वायुमंडल का स्वाभाविक और ज़रूरी हिस्सा है: पेड़-पौधे इसी से अपना शरीर गढ़ते हैं, और अगर हवा में कोई भी ग्रीनहाउस गैस न होती तो धरती की सतह जमाव बिंदु से बहुत नीचे ठिठुर रही होती।

मात्रा में यह लगभग नगण्य है। हवा के आयतन का 99 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा नाइट्रोजन और ऑक्सीजन का है, और कार्बन डाइऑक्साइड शून्य दशमलव शून्य चार प्रतिशत से ज़रा ही ऊपर। असली फ़र्क़ यह है कि वे दोनों धरती की सतह से निकलते अवरक्त विकिरण के लिए लगभग पारदर्शी हैं, और यह नहीं। बाहर जाती गर्मी को यह पकड़कर हर दिशा में दोबारा छोड़ती है, कुछ ज़मीन की ओर भी। इसी रास्ते प्रति दस लाख भागों में गिनी जाने वाली एक गैस मानसूनी मैदानों का तापमान तय करने लगती है।

ख़राब हवा वाले दिन भी इसे आँखें देख नहीं पातीं और गला महसूस नहीं करता। नवंबर में दिल्ली के ऊपर टँगी धुंध कणों का प्रदूषण है, CO2 नहीं। कोयला बिजलीघर, ईंट-भट्ठे, ट्रक और पराली की आग दोनों को साथ-साथ उगलते हैं, पर जलवायु बदलने लायक़ लंबी उम्र सिर्फ़ कार्बन डाइऑक्साइड की है।

कीलिंग वक्र: 280 से 420 पीपीएम का सफ़र

हिसाब पीपीएम (ppm) यानी प्रति दस लाख भाग में रखा जाता है: 420 पीपीएम का अर्थ है हवा के हर दस लाख अणुओं में से लगभग 420 कार्बन डाइऑक्साइड के। कोयला, तेल और गैस जैसे जीवाश्म ईंधनों के बड़े इस्तेमाल से पहले यह गिनती लगभग 280 थी।

ऊँची सटीकता वाली लगातार माप 1958 में हवाई की मौना लोआ वेधशाला पर शुरू हुई। वहाँ का रिकॉर्ड, जिसे कीलिंग वक्र कहते हैं, तब से हर दशक ऊपर ही गया है और हाल के वर्षों में 420 पीपीएम का निशान पार कर चुका है।

इस चढ़ती रेखा पर एक सालाना लहर भी है, मानो धरती साँस ले रही हो। उत्तरी गोलार्ध के बढ़वार वाले महीनों में पौधे कार्बन खींचते हैं और सांद्रता थोड़ी घटती है; उत्तरी सर्दियों में पत्तियाँ सड़ती हैं तो वही कार्बन हवा में लौट आता है। लहर आती-जाती रहती है, पर उसके नीचे की ज़मीन हर साल ऊँची होती जा रही है।

एक बार छोड़ी, सदियों तक टिकी

जलवायु की बागडोर इसी गैस के हाथ में होने के दो कारण हैं।

पहला कारण, लंबी उम्र। इंसान जितना उत्सर्जन करता है, उसका लगभग एक चौथाई महासागर सोख लेते हैं और लगभग उतना ही ज़मीनी पौधे तथा मिट्टी। हर साल के उत्सर्जन का करीब आधा हवा में ही रह जाता है, और उसका कुछ अंश सदियों तक वहीं बना रहता है। आज छोड़ी गई गैस किराये का सौदा नहीं कि कल लौटा दी जाए; यह लंबी देनदारी है।

दूसरा कारण, इसकी डोर किसी और के हाथ में नहीं। वायुमंडल में अपनी मात्रा के हिसाब से जलवाष्प ज़्यादा ताक़तवर ग्रीनहाउस गैस है, पर उसकी डोर तापमान थामे रहता है: हवा जितनी गर्म, उतना जलवाष्प सँभाल पाती है। इसलिए जलवाष्प कोई बदलाव शुरू नहीं करता, पहले से चल रहे बदलाव को और बढ़ा देता है। जिस घुंडी को सचमुच घुमाया जा रहा है, वह कार्बन डाइऑक्साइड है।

जलवायु तंत्र की संवेदनशीलता का मानक पैमाना एक सवाल है: पूर्व-औद्योगिक स्तर से CO2 दोगुनी हो जाए तो धरती आख़िरकार कितनी गर्म होगी? सबसे अच्छा मौजूदा अनुमान लगभग 3°C है, और उसके दोनों ओर वास्तविक अनिश्चितता बनी हुई है।

भट्ठे, कोयला और डीज़ल: दक्षिण एशिया का खाता

कुल उत्सर्जन में भारत चीन और संयुक्त राज्य अमेरिका के बाद तीसरे नंबर पर है, पर एक भारतीय के हिस्से का उत्सर्जन विश्व औसत से काफ़ी नीचे है। यही खाई इस क्षेत्र की हर अंतरराष्ट्रीय जलवायु वार्ता के केंद्र में रहती है। पाकिस्तान और बांग्लादेश का वैश्विक हिस्सा छोटा है और प्रति व्यक्ति योगदान बहुत ही कम, फिर भी इसके नतीजे झेलने में तीनों देश दुनिया के सबसे ज़्यादा जोखिम वाले देशों में गिने जाते हैं।

इलाक़े के स्रोतों की अपनी पहचान है:

भारत ने 2021 में ग्लासगो के COP26 सम्मेलन में 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किया, और साथ में बड़े पैमाने पर सौर तथा पवन ऊर्जा की राह पकड़ी।

लू, भारी बौछारें और खारा होता डेल्टा

बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड कोई नया मौसम नहीं गढ़ती; वह पहले से मौजूद मौसम के पासे में वज़न भर देती है।

गर्मी। उत्तरी मैदानों की मानसून-पूर्व गर्मी सामान्य साल में भी ख़तरनाक होती है। आधार-तापमान ऊँचा हो तो वायुमंडल का वही ढाँचा ज़्यादा तीखी, ज़्यादा लंबी और बार-बार लौटने वाली लू बनाता है। ऐसे दिन भी बढ़ते हैं जिनमें नमी के कारण पसीना शरीर को ठंडा ही नहीं कर पाता।

बारिश की तीव्रता। गर्म हवा ज़्यादा नमी थाम लेती है। मानसून की मौसमी कुल बारिश हवाओं के बड़े चक्र से तय होती है और उसका अंदाज़ा लगाना कठिन है, मगर बारिश का कम लेकिन भारी बौछारों में गिरना, बीच में सूखे अंतरालों के साथ, गर्म वायुमंडल का सीधा नतीजा है। शहरों को डुबोने वाला ढर्रा यही है।

समुद्र का स्तर। गर्म होता पानी फैलता है और ज़मीन पर जमी बर्फ़ पिघलती है। बंगाल डेल्टा हो या सिंधु डेल्टा, धीरे-धीरे उठता आधार-स्तर साधारण चक्रवात की तूफानी लहर को भी नुक़सानदेह बना देता है, और खारा पानी खेतों तथा पीने के पानी में और भीतर तक घुसता जाता है।

AQI वाला प्रदूषण और CO2: स्रोत एक, नुक़सान अलग

इन दोनों को अक्सर एक समझ लिया जाता है। वायु गुणवत्ता सूचकांक कणीय पदार्थ, ओजोन, नाइट्रोजन डाइऑक्साइड, सल्फ़र डाइऑक्साइड और कार्बन मोनोऑक्साइड से बनता है, यानी उन प्रदूषकों से जो शहरों में पाई जाने वाली सांद्रता पर फेफड़ों को नुक़सान पहुँचाते हैं। खुली हवा की कार्बन डाइऑक्साइड इस अर्थ में सेहत का ख़तरा नहीं; 420 पीपीएम से किसी को दमा नहीं होता। नाम मिलते-जुलते हैं, पर कार्बन मोनोऑक्साइड सूचकांक में गिनी जाती है और कार्बन डाइऑक्साइड नहीं।

दोनों की कड़ी उनका स्रोत है। इसीलिए कोयला घटाना, ईंट-भट्ठों को साफ़ करना और माल ढुलाई को डीज़ल से हटाना दोहरा फ़ायदा देता है: लाहौर या ढाका की हवा कुछ ही दिनों में साफ़, और दशकों में धीमा तापन।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

इस समय हवा में कितनी कार्बन डाइऑक्साइड है? 420 पीपीएम से कुछ ज़्यादा, और हर साल दो-एक पीपीएम की बढ़त के साथ। संदर्भ-माप पृष्ठभूमि-निगरानी केंद्रों के वैश्विक जाल से आती है, जिसमें सबसे पुराना लगातार चलता केंद्र मौना लोआ है।

420 तो छोटी-सी संख्या है, फिर परेशानी क्या है? असर मात्रा से नहीं, क्षमता से तय होता है। हवा की मुख्य गैसें अवरक्त विकिरण को आर-पार जाने देती हैं, कार्बन डाइऑक्साइड उसे रोक लेती है। औद्योगिक युग से पहले स्तर 280 पीपीएम था, यानी आज की सांद्रता उसके डेढ़ गुने से ऊपर है।

क्या मेरे शहर के AQI में CO2 गिनी जाती है? नहीं। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में यह सूचकांक कणीय पदार्थ और प्रतिक्रियाशील गैसों से निकाला जाता है। शहरों के निगरानी केंद्र कार्बन डाइऑक्साइड नापते ही नहीं।

उत्सर्जन घटाने से क्या गर्मी जल्दी कम हो जाएगी? शुद्ध-शून्य पर पहुँचने के कुछ समय बाद सतह का तापमान बढ़ना थम जाता है, पर नीचे नहीं लौटता। जोड़ी जा चुकी गैस लंबे समय तक टिकी रहती है और समुद्र सदियों तक उठता रहता है। व्यावहारिक लक्ष्य हालत को और बिगड़ने से रोकना है।

अपने शहर की गर्मी और बारिश का असली बरताव कहाँ देखूँ? कार्बन डाइऑक्साइड को कोई शहर-स्टेशन नहीं नापता, पर उसका नतीजा रोज़ के मौसम में दर्ज होता है। हर शहर के पन्ने पर अभी का हाल, अगले कई दिनों का पूर्वानुमान और हवा की गुणवत्ता एक ही जगह मिलती है, और यही इस सारी बात का व्यावहारिक सिरा है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, ढाका, लाहौर या चेन्नई से शुरुआत कीजिए।

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