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आईटीसीजेड (अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र)

भूमध्य रेखा के पास उठती हवा की वह पट्टी जहाँ उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक हवाएँ टकराती हैं, गहरे बादल बनाती हैं और लगातार बारिश कराती हैं — दक्षिण एशिया का मानसून इसी की चाल से चलता है।

घटनाएँ

आईटीसीजेड क्या है?

भूमध्य रेखा के आसपास एक पट्टी पूरी धरती को घेरे हुए है जिसमें हवा लगातार ऊपर उठती रहती है, गहरे बादल खड़े होते हैं और भारी बारिश गिरती है। मौसम विज्ञान में इसी को अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र, यानी आईटीसीजेड (ITCZ), कहा जाता है। अंग्रेज़ी में इसे अक्षर दर अक्षर “आई-टी-सी-ज़ेड” पढ़ा जाता है, और कई मौसम वैज्ञानिक इसे छोटा करके “इच” भी कह देते हैं।

उष्णकटिबंध में इससे बड़ा कोई दूसरा मौसमी लक्षण नहीं है। धरती पर सबसे ज़्यादा भीगने वाली जगहों में गिने जाने वाले मेघालय के चेरापूंजी और मॉसिनराम इसी के नीचे पड़ते हैं — मॉसिनराम में दर्ज होने वाली 11,872 मिमी सालाना बारिश इसी पट्टी की देन है। दक्षिण एशियाई मानसून का आगे बढ़ना और फिर लौट जाना इसी की चाल से तय होता है। अफ़्रीका, अमेरिका और एशिया में उष्णकटिबंधीय वर्षा की पट्टियाँ किस अक्षांश पर बैठेंगी, यह भी यही तय करती है। और ज़्यादातर उष्णकटिबंधीय चक्रवात आख़िरकार इसी के आसपास जन्म लेते हैं।

जून में जिस दिन खेत पर पहली बारिश आती है और अक्टूबर में जिस दिन आसमान खुलना शुरू होता है, उन दोनों तारीख़ों के पीछे इसी पट्टी की सालाना यात्रा खड़ी है।

पाल वाले जहाज़ों के ज़माने में नाविक इस इलाक़े को “डोलड्रम्स” कहते थे — शांत या बार-बार दिशा बदलती हल्की हवाओं वाला हिस्सा, जहाँ जहाज़ कई-कई दिन फँसे रह जाते थे।

दो गोलार्धों की व्यापारिक हवाएँ जहाँ टकराती हैं

आईटीसीजेड ठीक वहीं बनता है जहाँ उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक हवाएँ आमने-सामने आती हैं। उत्तरी गोलार्ध की व्यापारिक हवाएँ उत्तर-पूर्व से चलती हैं, दक्षिणी गोलार्ध की दक्षिण-पूर्व से। जिस रेखा पर दोनों मिलती हैं, वहाँ हवा के पास आगे बढ़ने की कोई जगह नहीं बचती, इसलिए उसे ऊपर उठना पड़ता है।

ऊपर उठती हवा ठंडी होती जाती है, उसमें घुली जलवाष्प संघनित होकर बूँदों में बदलती है और गहरे संवहनी बादल खड़े हो जाते हैं — वही कपासी वर्षी बादल, जिनसे मूसलाधार पानी गिरता है। अंतरिक्ष से देखने पर यह पूरा ढाँचा भूमध्य रेखा के पास चमकीली बादल-चोटियों की एक लगातार चलती पट्टी जैसा दिखाई देता है, जो पूरे गोले का चक्कर लगाती है।

इस पट्टी का एक दूसरा नाम “तापीय भूमध्य रेखा” भी है — इसलिए, क्योंकि यह उसी अक्षांश के पीछे-पीछे चलती है जहाँ सूरज की गरमी उस समय सबसे तेज़ पड़ रही हो, और वह अक्षांश ऋतुओं के साथ बदलता रहता है।

आईटीसीजेड भारत और दक्षिण एशिया में

पट्टी का सालाना सफ़र एक साफ़ कैलेंडर पर चलता है। मार्च विषुव के समय यह भूमध्य रेखा के पास रहती है। जून संक्रांति तक उत्तर की ओर काफ़ी बढ़ चुकी होती है और भारत के ऊपर लगभग 25°N पर पहुँच जाती है। सितंबर विषुव पर फिर भूमध्य रेखा के पास लौट आती है, और दिसंबर संक्रांति तक दक्षिणी हिंद महासागर के ऊपर जा बैठती है।

यही मौसमी झूला दक्षिण एशियाई मानसून की बुनियाद है। जून में पट्टी भारत के ऊपर उत्तर की ओर आती है तो दक्षिण-पश्चिम मानसून शुरू हो जाता है; अक्टूबर में वह दक्षिण लौटती है तो मानसून ख़त्म हो जाता है।

उपमहाद्वीप के ऊपर यह पट्टी इतनी अलग शक्ल ले लेती है कि उसका अपना अलग नाम चल पड़ा — मानसून ट्रफ़। यह कम दबाव की एक पट्टी है जो राजस्थान से बंगाल की खाड़ी तक फैली रहती है और उत्तर की शुष्क महाद्वीपीय हवा तथा दक्षिण की नम समुद्री हवा के बीच की सीमा खींचती है।

मानसून ट्रफ़ ठीक किस जगह बैठी है, यह रोज़ बदलता है, और बारिश के सबसे भरोसेमंद संकेतों में इसकी गिनती होती है:

भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD) और दूसरी एजेंसियों के पूर्वानुमानकर्ता इसी वजह से ट्रफ़ की स्थिति रोज़ाना जाँचते हैं — आने वाले दिनों की बारिश का अंदाज़ा काफ़ी हद तक इसी एक लकीर पर टिका होता है।

मानसून का “ब्रेक”: पट्टी सरकते ही बदलती ज़मीन

मानसून का “ब्रेक” मौसम के बीचोबीच आने वाला वह दौर है जब ट्रफ़ खिसककर हिमालय के पैर तक पहुँच जाती है। मध्य भारत के खेत अचानक बिना पानी के रह जाते हैं, आसमान खुल जाता है और बुवाई-रोपाई का पूरा हिसाब गड़बड़ा जाता है। ठीक उन्हीं दिनों उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, नेपाल और सिक्किम की तलहटी पर पानी टूट पड़ता है।

पहाड़ों में इसका नतीजा अक्सर अचानक आने वाली बाढ़ और भूस्खलन के रूप में सामने आता है — सड़कें बंद, नदियाँ उफान पर और नीचे बसे गाँवों पर सीधा ख़तरा। एक ही हफ़्ते में देश के दो हिस्सों की तस्वीर पूरी तरह उलटी हो सकती है: एक तरफ़ सूखते खेत, दूसरी तरफ़ बहते पहाड़।

इसीलिए ट्रफ़ की जगह सिर्फ़ मौसम वैज्ञानिकों की दिलचस्पी का विषय नहीं है। आपके ज़िले के ऊपर से यह पट्टी गुज़र रही है या नहीं, इसी से तय होता है कि अगले कुछ दिन सिंचाई का पंप चलाना पड़ेगा या खेत से भरा पानी निकालना पड़ेगा।

चक्रवात इसी पट्टी के किनारे क्यों जन्म लेते हैं

ज़्यादातर उष्णकटिबंधीय चक्रवात आईटीसीजेड के ऊपर या उससे ठीक बाहर पैदा होते हैं, क्योंकि चक्रवात बनने की शर्तें और इस पट्टी की स्थितियाँ लगभग एक-दूसरे पर बैठ जाती हैं:

ये चारों चीज़ें आईटीसीजेड एक साथ और भरपूर मात्रा में देता है। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के चक्रवात आम तौर पर इसी पट्टी से जुड़कर बनते हैं, और ऋतु के साथ पट्टी जैसे-जैसे खिसकती है, चक्रवात बनने की पसंदीदा जगह भी उसी के साथ सरकती जाती है।

हर महासागर के ऊपर इसका मिज़ाज अलग है

अटलांटिक और प्रशांत महासागर के ऊपर यह साल के ज़्यादातर हिस्से में 5 से 10°N के बीच एक पतली-सी पट्टी बनी रहती है। दक्षिण एशिया और हिंद महासागर की कहानी इससे बिल्कुल अलग है — यहाँ पट्टी चौड़ी है और जुलाई के 25°N से जनवरी के 5°S तक लंबा झूला झूलती है; यही झूला मानसून बनाता है।

अफ़्रीका के ऊपर यह जुलाई में 20°N तक जाती है और जनवरी में 10°S तक लौट आती है, जिससे साहेल की बारिश और पश्चिम अफ़्रीकी मानसून तय होते हैं। दक्षिण अमेरिका में यह अमेज़न के ऊपर से गुज़रती है और वहाँ की वर्षा का ढाँचा बनाती है। प्रशांत महासागर के ऊपर यह कभी-कभी दो समानांतर पट्टियों में बँट जाती है — इसी को “डबल आईटीसीजेड” कहते हैं, और यह मार्च-अप्रैल में पूर्वी प्रशांत के ऊपर सबसे साफ़ दिखाई देता है।

गरम होती धरती में यह पट्टी किधर जाएगी

जलवायु मॉडल इस पट्टी में बारीक लेकिन अहम बदलावों की ओर इशारा करते हैं। जो इलाक़े पहले से भीगे हुए हैं, वहाँ मानसूनी बारिश और तेज़ होने का अनुमान है। उष्णकटिबंधीय पट्टी के चौड़ा होने की संभावना भी जताई गई है — हैडली परिसंचरण चौड़ा हो सकता है, जबकि ख़ुद आईटीसीजेड सिकुड़कर संकरा हो सकता है। बारिश ख़ुद ज़्यादा तीखी होगी, पर दो दौरों के बीच सूखे दिनों की लंबाई बढ़ जाएगी। इसी पट्टी के सहारे बनने वाले चक्रवात भी और प्रचंड हो सकते हैं।

दक्षिण एशिया के लिए इसका अर्थ सीधा है: कुल बारिश शायद बढ़ जाए, और वह भी कम दिनों में, कहीं ज़्यादा ज़ोर से बरसकर। नतीजा यह कि एक ही मौसम में बाढ़ और सूखा, दोनों का ख़तरा साथ-साथ बढ़ जाता है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आईटीसीजेड में इतनी बारिश क्यों होती है? ऊपर उठती हवा के पास अपनी नमी रोके रखने का कोई रास्ता नहीं बचता — ठंडी होते ही वह संघनित होकर बरस जाती है। धरती की सबसे लगातार और सबसे भारी बारिशों में से कुछ इसी पट्टी में होती हैं। मेघालय के चेरापूंजी और मॉसिनराम, जो सक्रिय मानसूनी आईटीसीजेड के ठीक नीचे पड़ते हैं, सालाना 11,000 से 12,000 मिमी पानी पाते हैं — यह पूरे ग्रह पर सबसे ऊँचे सालाना आँकड़ों में गिना जाता है।

क्या आईटीसीजेड और भूमध्य रेखा एक ही चीज़ हैं? नहीं। भूमध्य रेखा 0° अक्षांश पर खिंची एक तय भौगोलिक लकीर है, जबकि आईटीसीजेड ऋतुओं के साथ खिसकता रहता है। सालाना औसत के हिसाब से यह आम तौर पर भूमध्य रेखा के उत्तर में, लगभग 5°N पर बैठता है — ठीक 0° पर नहीं।

मानसून का “ब्रेक” किसे कहते हैं? ब्रेक तब आता है जब आईटीसीजेड, यानी मानसून ट्रफ़, खिसककर हिमालय के पैर तक पहुँच जाती है। मध्य भारत अचानक सूखा पड़ जाता है और उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, नेपाल तथा सिक्किम की तलहटी में बेहद भारी बारिश होती है, जिससे अक्सर अचानक बाढ़ और भूस्खलन की नौबत आ जाती है।

यह पट्टी कितनी चौड़ी होती है? खुले समुद्र के ऊपर आम तौर पर 200 से 500 किलोमीटर, और मानसून के चरम पर महाद्वीपों के ऊपर 1,000 किलोमीटर तक। किनारा तेज़ कटा हुआ नहीं होता, बल्कि धीरे-धीरे बदलने वाला संक्रमण क्षेत्र होता है।

मानसून ट्रफ़ की स्थिति और अपने शहर का मौसम कहाँ देखूँ? IMD रोज़ाना मानसून बुलेटिन जारी करता है, जिसमें उस दिन ट्रफ़ कहाँ है, यह दिया रहता है। मौसम ऑनलाइन पर हर शहर की ताज़ा बारिश और पूर्वानुमान मिलते हैं, जिनसे अंदाज़ा लग जाता है कि आप ट्रफ़ के किस तरफ़ बैठे हैं — पटना, कोलकाता, भोपाल, मुंबई और दिल्ली।

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