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भूमध्य रेखा

शून्य अक्षांश पर पृथ्वी को घेरने वाली काल्पनिक रेखा। भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश का कोई हिस्सा इसे नहीं छूता, फिर भी इससे दूरी ही तय करती है कि सूरज कितना ऊँचा चढ़ेगा, दिन कितना लंबा होगा और चक्रवात कैसा बरताव करेंगे।

जलवायु

भूमध्य रेखा क्या है?

ग्लोब पर जो लकीर उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव से ठीक बराबर दूरी पर खिंची है, उसी का नाम भूमध्य रेखा है। इसका अक्षांश शून्य डिग्री है, और यही धरती को उत्तरी और दक्षिणी गोलार्ध में बाँटती है। ज़मीन पर इसका कोई निशान नहीं, फिर भी पृथ्वी का सबसे बड़ा घेरा यही है — लगभग 40,000 किलोमीटर।

मौसम से इसका रिश्ता ज्यामिति का है। यही इकलौता अक्षांश है जहाँ सूरज दोनों विषुवों पर — यानी मार्च के आख़िर और सितंबर के आख़िर में — ठीक सिर के ऊपर से गुज़रता है। दिन और रात भी यहीं साल भर बारह-बारह घंटे के सबसे क़रीब रहते हैं। धूप औसतन सबसे खड़े कोण से उतरती है, सो किरणों का एक पुंज ज़मीन के सबसे छोटे टुकड़े पर फैलता है और हर वर्ग मीटर को सबसे ज़्यादा ऊर्जा मिलती है।

भारत, पाकिस्तान या बांग्लादेश की एक इंच ज़मीन भी इस रेखा को नहीं छूती। पर इस रेखा से आपके शहर की दूरी ही तय करती है कि दोपहर का सूरज कितना ऊँचा चढ़ेगा और साल भर में दिन कितना घटेगा-बढ़ेगा; और हम रेखा के किस ओर बसे हैं, इसी से तय होता है कि बंगाल की खाड़ी का चक्रवात किस दिशा में घूमेगा।

एक आम ग़लतफ़हमी यहीं साफ़ कर लें: भूमध्य रेखा धरती का सबसे गरम हिस्सा नहीं है। वहाँ बादल और उमस छाए रहते हैं, और धूप का बड़ा भाग हवा तपाने के बजाय पानी के वाष्पीकरण में खप जाता है। सबसे ऊँचा तापमान उपोष्णकटिबंधीय रेगिस्तानों में दर्ज होता है — इसीलिए हज़ारों किलोमीटर उत्तर बसे उत्तर-पश्चिम भारत और दक्षिणी पाकिस्तान मई में जितना तपते हैं, उतना कोलंबो या माले कभी नहीं।

कन्याकुमारी से गिलगित-बाल्टिस्तान तक: शून्य अक्षांश से उपमहाद्वीप की दूरी

मालदीव के सबसे दक्षिणी एटॉलों को छोड़कर दक्षिण एशिया उत्तरी गोलार्ध में है, और अक्षांश की बहुत चौड़ी पट्टी में फैला है:

क़रीब तीस डिग्री का यही फैलाव समझाता है कि एक ही देश में तिरुवनंतपुरम भी है, जहाँ ऋतुएँ तापमान से नहीं बारिश से पहचानी जाती हैं, और श्रीनगर भी, जहाँ असली सर्दी उतरती है।

कर्क रेखा लगभग 23.5 डिग्री उत्तर पर है। सूरज ठीक सिर के ऊपर आ सकता है तो इसी अक्षांश तक, आगे नहीं। भारत में यह गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड, पश्चिम बंगाल, त्रिपुरा और मिज़ोरम को काटकर बांग्लादेश के आर-पार निकलती है; ढाका इसके ज़रा उत्तर में है। दिल्ली, लखनऊ, लाहौर और इस्लामाबाद इसके उत्तर में हैं, जहाँ सूरज कभी ठीक सिर पर नहीं पहुँचता।

सूरज की ऊँचाई और दिन की लंबाई: दूरी का असर घड़ी पर

भूमध्य रेखा पर सूर्योदय और सूर्यास्त का समय साल भर लगभग अपनी जगह टिका रहता है। उत्तर की ओर बढ़िए, तो यह झूला चौड़ा होता जाता है। क़रीब 28.6 डिग्री उत्तर पर बसी दिल्ली में जून की संक्रांति के आसपास उजाला लगभग चौदह घंटे रहता है, और दिसंबर के आख़िरी हफ़्तों में सिमटकर क़रीब दस घंटे। कन्याकुमारी में गर्मी और सर्दी के दिन का यही अंतर एक घंटे से भी कम है।

इसीलिए उत्तर भारत और पाकिस्तान में गर्मियों की शामें देर तक खिंचती हैं और सर्दियों की दोपहर जल्दी अँधेरी हो जाती है, जबकि सुदूर दक्षिण में ऐसा कुछ नहीं होता।

कर्क रेखा के दक्षिण में साल में दो दिन ऐसे आते हैं जब दोपहर का सूरज बिलकुल सिर के ऊपर खड़ा होता है और सीधे गड़े खंभे की कोई परछाईं नहीं बनती। इन्हें शून्य छाया दिवस कहते हैं। बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद, मुंबई और कोलकाता के विज्ञान केंद्र इन्हें बाक़ायदा चिह्नित करते हैं।

हर शहर की तारीख़ें अलग हैं: दक्षिण में ये दिन पहले आते हैं, उत्तर में बाद में, और ठीक कर्क रेखा पर दोनों तारीख़ें मिलकर एक हो जाती हैं।

रेखा लाँघकर आने वाली हवा: केरल के मानसून की जड़

भूमध्य रेखा और दक्षिण एशियाई मौसम के बीच सबसे दूरगामी कड़ी अंतःउष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (आईटीसीजेड) है — वह पट्टी जहाँ दोनों गोलार्धों की व्यापारिक हवाएँ मिलकर ऊपर उठती हैं और धरती की प्रमुख उष्णकटिबंधीय वर्षा-पट्टी बनाती हैं।

यह पट्टी एक जगह नहीं ठहरती; सबसे तेज़ तपिश जिस अक्षांश पर हो, उसी का पीछा करती है। जनवरी में इसका ठिकाना भूमध्य रेखा के पास या उससे दक्षिण में होता है, और जुलाई तक यह भारतीय उपमहाद्वीप के ऊपर काफ़ी उत्तर तक खिसक आती है। उत्तर की ओर इसी सफ़र का नाम मानसून है।

असल कारीगरी उस हवा की है जो सचमुच रेखा पार करती है। दक्षिणी गोलार्ध की व्यापारिक हवाएँ दक्षिण-पूर्व से बहती हैं। उत्तरी गोलार्ध में दाख़िल होते ही कोरिओलिस विक्षेप का रुख़ पलट जाता है और यही हवा दाईं ओर मुड़ने लगती है। दक्षिण-पूर्वी धारा इस तरह दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी धारा बन जाती है, जो केरल और पश्चिमी घाट पर पहुँचती है। पूर्वी अफ़्रीका के तट के साथ यह मोड़ देने वाली, निचले स्तर पर सिमटी हवा-धारा सोमाली जेट कहलाती है।

मोड़ का यह बिंदु न होता, तो दक्षिण-पश्चिम मानसून उस रूप में होता ही नहीं जिसे दक्षिण एशिया पहचानता है।

चक्रवात भूमध्य रेखा से क्यों कतराते हैं: पाँच डिग्री की हद

पृथ्वी के घूमने से चलती हवा पर पड़ने वाला आभासी विक्षेप कोरिओलिस बल कहलाता है। भूमध्य रेखा पर यह शून्य है और अक्षांश के साथ मज़बूत होता जाता है। उष्णकटिबंधीय कम दबाव इसी के सहारे घूमता भँवर बनता है; इसके बिना भीतर की ओर बहती हवा घूमने के बजाय कम दबाव को सीधे भर देती है और वह मिट जाता है।

नतीजा यह कि भूमध्य रेखा के लगभग पाँच डिग्री के भीतर उष्णकटिबंधीय चक्रवात शायद ही कभी बनते हैं। बंगाल की खाड़ी और अरब सागर इस सीमा से आराम से उत्तर में हैं। ओडिशा, पश्चिम बंगाल, बांग्लादेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, गुजरात और सिंध के तट इसीलिए चक्रवातों की ज़द में हैं, जबकि मालदीव उन इलाक़ों में नहीं गिना जाता जहाँ चक्रवात ज़मीन से टकराते हैं।

घुमाव की दिशा भी यही बल तय करता है। उत्तरी गोलार्ध में वह हवा को दाईं ओर धकेलता है, इसलिए बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का हर चक्रवात घड़ी की सुइयों से उलटी दिशा में घूमता है — 1999 का ओडिशा महाचक्रवात, 2020 का अम्फान, और उसके बाद का हर तंत्र। दक्षिणी गोलार्ध के तूफ़ान उलटी तरफ़ चक्कर काटते हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या भूमध्य रेखा भारत से होकर गुज़रती है? नहीं। मुख्य भूमि का सबसे दक्षिणी बिंदु इससे लगभग 8 डिग्री उत्तर में है, और निकोबार द्वीपों का दक्षिणी सिरा भी 7 डिग्री उत्तर से बस ज़रा ही नीचे तक पहुँचता है। दक्षिण एशिया में सिर्फ़ दक्षिणी मालदीव रेखा पार करता है।

तो क्या भूमध्य रेखा पर सबसे ज़्यादा गर्मी पड़ती है? नहीं। सौर विकिरण वहाँ औसतन सबसे ज़्यादा है, पर घने बादल और ऊँची आर्द्रता पारा थामे रखते हैं। मई-जून में भीतरी पाकिस्तान और उत्तर-पश्चिम भारत जैसे सूखे इलाक़े कहीं ज़्यादा तपते हैं।

क्या दक्षिणी गोलार्ध में सिंक का पानी उलटा घूमकर निकलता है? नहीं। सिंक या बाथटब जितने छोटे पैमाने पर कोरिओलिस बल बेहद कमज़ोर है; पानी का घुमाव बर्तन की बनावट और पानी डालने के ढंग से तय होता है।

मेरे शहर के मौसम पर अक्षांश का असर कैसे देखूँ? अक्षांश तय करता है कि दिन कितना लंबा होगा, सूरज कितना ऊँचा चढ़ेगा और ऋतुएँ कितनी तीखी होंगी। दक्षिण से उत्तर की ओर कुछ शहरों के पूर्वानुमान साथ-साथ खोलिए — तिरुवनंतपुरम, चेन्नई, कोलकाता, ढाका, दिल्ली और श्रीनगर। एक ही देश में जलवायु का पूरा दायरा दिख जाएगा।

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