वह दिशा जिधर से हवा आ रही है, न कि जिधर जा रही है। दक्षिण एशिया में मौसम बदलने का सबसे साफ़ संकेत यही है: दक्षिण-पश्चिमी हवा यानी मानसून, उत्तर-पश्चिमी हवा यानी सूखा मौसम।
मापनहवा की दिशा का पहला नियम: किधर से, किधर को नहीं
हवा की दिशा बताते समय हमेशा उसका स्रोत बताया जाता है, मंज़िल नहीं। दक्षिण-पश्चिमी हवा दक्षिण-पश्चिम से उठकर उत्तर-पूर्व की ओर बहती है, और उत्तरी हवा उत्तर से दक्षिण की ओर। रोज़ की बातचीत में लोग अक्सर इसका उल्टा समझ बैठते हैं, इसलिए यह फ़र्क़ शुरू में ही पक्का कर लेना ठीक रहेगा।
यह परिपाटी मनमानी नहीं है। हवा अपने साथ वही लेकर चलती है जो उसे रास्ते में मिला — गर्म समुद्र से नमी, रेगिस्तान से धूल, जलते खेतों से धुआँ। “किधर से” पता चलते ही अंदाज़ा लग जाता है कि आने वाली हवा में क्या भरा होगा। भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लोगों के लिए यह जानकारी और भी काम की है, क्योंकि यहाँ रुख़ पलटना ही बताता है कि मानसून आ रहा है, लू चलने वाली है या धुएँ के दिन शुरू होने वाले हैं।
उत्तर से घड़ी की सुई की ओर: डिग्री, दिशा-बिंदु और नक्शे के पंख
दिशा लिखने के दो तरीके चलते हैं। आम पूर्वानुमान में दिशा-बिंदु इस्तेमाल होते हैं — उत्तर, उत्तर-उत्तर-पूर्व, उत्तर-पूर्व, पूर्व-उत्तर-पूर्व, और इसी तरह पूरे घेरे में कुल सोलह बिंदु। पूर्वानुमानों में ये अक्सर अंग्रेज़ी अक्षरों में लिखे जाते हैं: N उत्तर, E पूर्व, S दक्षिण, W पश्चिम, और SW दक्षिण-पश्चिम।
विमानन और तकनीकी आँकड़ों में रुख़ डिग्री में दर्ज होता है, जिन्हें उत्तर से शुरू करके घड़ी की सुई की दिशा में गिना जाता है। उत्तर 0 या 360 है, पूर्व 90, दक्षिण 180 और पश्चिम 270। दो मुख्य दिशाओं के बीच वाली दिशा को उनके बीच की डिग्री मिलती है, इसलिए 225 डिग्री का अर्थ दक्षिण-पश्चिमी हवा है। हवा इतनी धीमी हो, या इतनी तेज़ी से रुख़ बदल रही हो कि कोई एक अंक देना ग़लत लगे, तो विमानन रिपोर्ट उसे “परिवर्तनशील” लिख देती है।
मौसम के नक्शे पर दिशा एक छोटी रेखा से दिखाई जाती है जिसे विंड बार्ब कहते हैं। रेखा हवा के आने की ओर इशारा करती है, और उसकी पूँछ पर लगे पंख रफ़्तार बताते हैं। किसी जगह की बरसों की तस्वीर के लिए विंड रोज़, यानी पवन-आरेख, बनाया जाता है: एक गोल चित्र जिसमें हर दिशा की पंखुड़ी उतनी लंबी होती है जितनी बार उस तरफ़ से हवा आई। किसी जगह की जलवायु एक नज़र में समझनी हो तो इससे तेज़ तरीका नहीं।
पूर्वानुमान सुनाने वाले दो शब्द और बार-बार बोलते हैं। हवा घड़ी की सुई की दिशा में खिसके — मान लीजिए दक्षिण-पूर्व से दक्षिण-पश्चिम — तो उसे “वीयर करना” कहते हैं; उल्टी दिशा में खिसके तो “बैक करना”। दिन भर में रुख़ का इस तरह सरकना अक्सर पहला दिखने वाला संकेत होता है कि कोई मौसमी तंत्र पास आ रहा है या गुज़र रहा है।
दबाव, पृथ्वी का घूमना और घाटी की दीवारें: हवा मुड़ती क्यों है
हवा ऊँचे दबाव से कम दबाव की तरफ़ बढ़ती है, पर दबाव की ढलान पर सीधी रेखा में नहीं। पृथ्वी के घूमने से वह मुड़ जाती है — उत्तरी गोलार्ध में दाहिनी ओर — और आख़िरकार समदाब रेखाओं को काटने के बजाय मोटे तौर पर उनके साथ-साथ बहने लगती है।
इस मोड़ से एक बेहद काम का नियम निकलता है, जिसे बायस बैलट का नियम कहा जाता है। उत्तरी गोलार्ध में हवा की ओर पीठ करके खड़े हो जाइए — निम्न दबाव प्रणाली आपके बाएँ हाथ की तरफ़ होगी। चक्रवात के मौसम में तट पर खड़ा कोई भी व्यक्ति सिर्फ़ इसी नियम से मोटा अंदाज़ा लगा सकता है कि तूफ़ान का केंद्र किस ओर है।
ज़मीन के पास घर्षण हवा की चाल धीमी करता है और उसे थोड़ा कम दबाव की ओर मोड़ देता है। सतह पर चलती हवा और एक किलोमीटर ऊपर की हवा का रुख़ इसी कारण अक्सर साफ़ तौर पर अलग होता है।
स्थानीय स्तर पर पहाड़ इन सब नियमों पर भारी पड़ते हैं। घाटी हवा को अपनी लंबाई की दिशा में ही बहने देती है, बड़े पैमाने का प्रवाह चाहे कुछ भी कर रहा हो। हिमाचल प्रदेश, कश्मीर या गिलगित-बल्तिस्तान के मौसम-केंद्र कई बार ऐसा रुख़ दर्ज करते हैं जिसका आसपास के क्षेत्रीय ढर्रे से कोई मेल नहीं बैठता, और वजह यही घाटियाँ होती हैं।
कैलेंडर की तरह पलटती हवा: मानसून, लू और कालबैसाखी
धरती पर शायद ही कोई दूसरा इलाक़ा हो जहाँ हवा का रुख़ कैलेंडर से इतना कसकर बँधा हो। “मानसून” शब्द ख़ुद ऋतु के अर्थ वाले एक शब्द से निकला है, और यह मौसम पहचाना ही हवा के पलटने से जाता है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून, मोटे तौर पर जून से सितंबर। हिंद महासागर की नम हवा भूमध्य रेखा पार करके खिंची चली आती है और उपमहाद्वीप पर दक्षिण-पश्चिम से पहुँचती है। सबसे पहले उसकी टक्कर पश्चिमी घाट से होती है, इसलिए कोंकण और मालाबार तट तर-बतर हो जाते हैं, जबकि ठीक भीतर दक्कन का पठार कहीं ज़्यादा सूखा रहता है। बंगाल की खाड़ी के ऊपर यही प्रवाह मुड़ जाता है और बंगाल, बांग्लादेश तथा पूर्वोत्तर में दक्षिणी से दक्षिण-पूर्वी हवा बनकर पहुँचता है। यही रुख़ उसे मेघालय की खासी और गारो पहाड़ियों पर चढ़ने को मजबूर करता है।
उत्तर-पूर्व मानसून, मोटे तौर पर अक्टूबर से दिसंबर। अब बहाव उल्टा हो जाता है। महाद्वीप के भीतर की सूखी हवा उत्तर-पूर्व से बाहर निकलती है, लेकिन बंगाल की खाड़ी पार करते-करते नमी बटोर लेती है। तमिलनाडु और श्रीलंका को उनका मुख्य बरसाती मौसम यही हवा देती है, और तटीय आंध्र प्रदेश को साल भर की बारिश का लगभग एक-तिहाई। चेन्नई के सबसे गीले महीने भरी गर्मी में नहीं, देर शरद में पड़ते हैं — उसकी वजह यही उल्टा रुख़ है।
लू। मई और जून में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, उत्तर प्रदेश और पाकिस्तानी पंजाब के ऊपर झुलसाती, सूखी पश्चिमी से उत्तर-पश्चिमी हवा चलती है। इसकी पूरी कहानी इसकी दिशा में छिपी है: रेगिस्तान और तपे हुए मैदान से होकर आने के कारण यह गर्मी तो ढोती है, नमी नहीं, और इसमें खुले में काम करना ख़तरनाक हो जाता है।
नॉरवेस्टर। मानसून से पहले के महीनों में बंगाल, बिहार, झारखंड और बांग्लादेश पर उत्तर-पश्चिम से उग्र झंझावात-रेखाएँ टूटती हैं, जिन्हें बंगाली में कालबैसाखी और बांग्लादेश में काल बैशाखी कहा जाता है। अंग्रेज़ी नाम “नॉरवेस्टर” का अर्थ ही “उत्तर-पश्चिमी” है — इस आँधी की पहचान उसकी दिशा से गढ़ी गई है।
पश्चिमी विक्षोभ। सर्दियों भर मध्य अक्षांशों के मौसमी तंत्र पाकिस्तान और उत्तर भारत के ऊपर पश्चिम से पूर्व की ओर सरकते हैं, मैदानों में बारिश और पहाड़ों पर बर्फ़ लाते हुए। किसी विक्षोभ से ठीक पहले नम पूर्वी हवा का आ जाना पंजाब या कश्मीर के पूर्वानुमान में अक्सर पहला इशारा होता है कि मौसम करवट लेने वाला है।
तट की दोपहर: हर रोज़ पलटने वाली समुद्री हवा
बड़े मौसमी उलटफेर के भीतर तटीय शहर हर दिन अपना छोटा उलटफेर चलाते हैं। दोपहर में समुद्र की ओर से हवा भीतर बहने लगती है, और शहर का मिज़ाज बदल जाता है।
मुंबई में यह हवा अरब सागर से, यानी पश्चिम से आती है; चेन्नई में बंगाल की खाड़ी से, यानी पूर्व से। दोनों शहरों में समुद्री हवा का पहुँचना वह घड़ी है जब तपती दोपहर सहने लायक बनती है। गर्म दिनों में यही हवा एक और काम कर जाती है: भीतरी इलाक़े की हवा से जहाँ उसकी टक्कर होती है, वहाँ गरज के साथ तूफान भड़क सकते हैं।
इसे फ़ोन पर पकड़ना आसान है, बस अक्षर पहचानने हैं। मुंबई में दोपहर को दिशा के अक्षर पश्चिम की ओर घूमें — W या उसके आसपास — और चेन्नई में पूर्व की ओर, E या उसके आसपास, तो समझिए समुद्र की हवा शहर में दाख़िल हो चुकी है। राहत उसी के साथ आती है, और गर्म दिन हो तो आसमान पर नज़र रखने की वजह भी।
धुआँ, लहर और छिड़काव: जहाँ रफ़्तार से बड़ा सवाल रुख़ है
हवा की गुणवत्ता। दिल्ली के सबसे बुरे प्रदूषण के दौर असल में हवा की दिशा की कहानी हैं। अक्टूबर और नवंबर में धीमी उत्तर-पश्चिमी हवा पंजाब और हरियाणा में जलती पराली का धुआँ मैदान के साथ-साथ बहाकर सीधे दिल्ली तक ले आती है, और शांत, स्थिर वायुमंडल उसे वहीं टिकाए रखता है। रुख़ बदल जाए तो हवा किसी भी स्थानीय उपाय से तेज़ साफ़ हो सकती है। थार और अरब प्रायद्वीप की धूल भी इसी तरह गुजरात, सिंध और राजस्थान के ऊपर पहुँचती है।
चक्रवात और तूफानी लहर। बंगाल की खाड़ी का कोई तूफ़ान पानी को ओडिशा तट पर धकेलेगा, सुंदरबन पर या बांग्लादेशी डेल्टा पर — यह ज़मीन से टकराते समय तट की ओर बहती हवा की दिशा पर टिका है। तूफानी लहर तब उठती है जब हवा पानी को किनारे पर ढेर करती जाती है, इसलिए वह किस कोण से आ रही है, यह उतना ही अहम है जितनी उसकी ताक़त।
खेत, नाव और कारख़ाने का पड़ोस। किसान कीटनाशक का छिड़काव हवा का रुख़ देखकर करते हैं, ताकि दवा बहकर कहीं और न चली जाए। मछुआरे समुद्र में उतरने से पहले रुख़ पढ़ते हैं। किसी औद्योगिक इलाक़े से हवा के बहाव की सीध में रहने वाला परिवार बिना किसी के सिखाए अपने मोहल्ले का पवन-आरेख जान जाता है।
हवाई अड्डे। विमान हवा के सामने मुँह करके उड़ान भरते और उतरते हैं। रनवे का नंबर भी उसकी चुंबकीय दिशा को दस से भाग देकर रखा जाता है, यानी इस क्षेत्र के हर हवाई अड्डे की बनावट में हवा की दिशा पहले से गुँथी हुई है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
“पश्चिमी हवा” पश्चिम की ओर जाती है या पश्चिम से आती है? पश्चिम से आती है। हवा का नाम हमेशा उसके स्रोत पर रखा जाता है, गंतव्य पर कभी नहीं; पश्चिमी हवा असल में पूर्व की ओर बहती है।
पूर्वानुमान में 270 डिग्री लिखा हो तो हवा किधर से आ रही है? ठीक पश्चिम से। डिग्री उत्तर से घड़ी की सुई की दिशा में गिनी जाती हैं: 0 या 360 उत्तर, 90 पूर्व, 180 दक्षिण और 270 पश्चिम।
भारत में मौसम बदलते ही हवा पूरी तरह उलट क्यों जाती है? क्योंकि मानसून अपने आप में हवा का पलटना है। गर्मियों में तपता भूभाग दक्षिण-पश्चिम के महासागर से नम हवा अपनी ओर खींचता है; सर्दियों में ठंडा महाद्वीप सूखी हवा को उत्तर-पूर्व की ओर से बाहर धकेलता है।
दिल्ली के प्रदूषण में हवा की दिशा की क्या भूमिका है? देर शरद में धीमी उत्तर-पश्चिमी हवा पंजाब और हरियाणा के खेतों में जलाए गए अवशेषों का धुआँ दिल्ली के इलाक़े में ले आती है, जहाँ स्थिर हवा उसे क़ैद कर लेती है। रुख़ बदलते ही, या हवा के तेज़ होते ही, यह धुआँ बिखर जाता है।
अपने शहर में हवा किधर से आ रही है, यह कहाँ देखूँ? मौसम ऑनलाइन के हर शहर के पन्ने पर अभी चल रही हवा की रफ़्तार के साथ उसकी दिशा भी लिखी रहती है, अंग्रेज़ी के दिशा-अक्षरों में, जैसे SW या NNE। ध्यान रहे: ये अक्षर बताते हैं कि हवा किधर से आ रही है, जबकि उनके बग़ल का छोटा तीर उस ओर मुड़ा होता है जिधर हवा जा रही है। यह इसी पल की एक रीडिंग है, घंटेवार सिलसिला नहीं, इसलिए रुख़ का पलटना पकड़ना हो तो पन्ना दिन में दो बार खोलिए: मुंबई या चेन्नई को सुबह और फिर दोपहर बाद देखेंगे, तो समुद्री हवा का आना ख़ुद दिख जाएगा। मौसम के हिसाब से अक्टूबर-नवंबर के उत्तर-पश्चिमी बहाव के लिए दिल्ली, मानसून से पहले की कालबैसाखी के लिए कोलकाता, सिंध पर धूल लाने वाली हवा के लिए कराची, और बांग्लादेश तक दक्षिण-पूर्व से पहुँचने वाली मानसूनी हवा के लिए चटगाँव का पन्ना देखें।