वह पैमाना जिस पर दक्षिण एशिया की हर मौसम एजेंसी तापमान बताती है। पानी 0°C पर जमता है, 100°C पर खौलता है, और लू की हर चेतावनी की सीमा इसी पैमाने के अंकों में तय होती है।
मापनसेल्सियस क्या है?
पानी के दो पड़ाव चुनिए — एक जहाँ वह जमकर बर्फ़ बनता है, दूसरा जहाँ खौलकर भाप — और बीच के फ़ासले को सौ बराबर सीढ़ियों में काट दीजिए। सेल्सियस पैमाना ठीक इसी तरह बना है: जमाव 0°C पर, खौलना 100°C पर, और यह जोड़ी तभी खरी है जब हवा का दबाव समुद्र तल जितना हो। हर सीढ़ी एक डिग्री कहलाती है। धरती के लगभग सभी देश मौसम इसी पैमाने पर बताते हैं, और दक्षिण एशिया में नेपाल व श्रीलंका से लेकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक यही चलता है।
भारत मौसम विज्ञान विभाग (IMD), पाकिस्तान मौसम विभाग और बांग्लादेश मौसम विभाग का हर पूर्वानुमान, हर चेतावनी और हर मौसम केंद्र की रिपोर्ट सेल्सियस में जारी होती है, और मौसम ऑनलाइन का हर अंक भी। चेतावनियों की सीमाएँ तक इसी में लिखी जाती हैं, सो इसे सहजता से पढ़ पाना अंक बदलने का अभ्यास भर नहीं है। इसी समझ से पता चलता है कि कोई बुलेटिन आप पर लागू होता है या नहीं।
नाम स्वीडन के खगोलशास्त्री आंडर्स सेल्सियस से आया, जिन्होंने 1742 में यह पैमाना सुझाया। उनका मूल पैमाना उलटा चलता था — खौलते पानी पर 0 और जमते पानी पर 100 — जिसे जल्द ही पलटकर आज वाला रूप दिया गया। 1948 में इकाई को आधिकारिक नाम “डिग्री सेल्सियस” मिला, और इसने पुराने शब्द “सेंटीग्रेड” की जगह ली। वह पुराना शब्द दुविधा पैदा करता था, क्योंकि यही नाम कोण नापने की एक इकाई का भी था।
केल्विन से बँधा पैमाना: शून्य कहाँ टिका है
आज का नाप-तौल विज्ञान सेल्सियस को पानी के सहारे परिभाषित नहीं करता। अंतरराष्ट्रीय इकाई प्रणाली (SI) में तापमान की मूल इकाई केल्विन है, और डिग्री सेल्सियस उसी से निकाली जाती है:
°C में तापमान = केल्विन में तापमान − 273.15
एक डिग्री सेल्सियस और एक केल्विन का आकार हूबहू बराबर है। पारा 5°C चढ़े या 5 K, बढ़त एक ही है; दोनों पैमानों में फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि गिनती का शून्य कहाँ रखा गया। केल्विन का शून्य परम शून्य कहलाता है — वह हालत जिसमें किसी चीज़ से निकालने के लिए ताप-ऊर्जा बचती ही नहीं। सेल्सियस में यह बिंदु −273.15°C पर पड़ता है, और इससे ठंडा कुछ भी नहीं हो सकता।
2019 के SI संशोधन के बाद से केल्विन किसी पदार्थ से नहीं, बोल्ट्ज़मान स्थिरांक से तय होता है। मौसम की नाप-जोख पर इसका व्यावहारिक असर शून्य है। पटना की किसी छत पर रखा थर्मामीटर जितनी बारीकी पकड़ सकता है, उस बारीकी पर 0°C आज भी वही बिंदु है जहाँ पानी बर्फ़ बनता है।
दोगुना करो, तीस जोड़ो: फ़ारेनहाइट और केल्विन से लेन-देन
फ़ारेनहाइट अब ज़्यादातर अमेरिका और गिने-चुने छोटे इलाक़ों तक सिमट गया है। इस वजह से बदलने का काम ज़्यादातर तभी पड़ता है जब कोई अमेरिकी स्रोत पढ़ रहा हो, या औपनिवेशिक दौर के पुराने रजिस्टर पलट रहा हो।
- सेल्सियस से फ़ारेनहाइट: °F = (°C × 9/5) + 32
- फ़ारेनहाइट से सेल्सियस: °C = (°F − 32) × 5/9
- सेल्सियस से केल्विन: K = °C + 273.15
झटपट हिसाब के लिए सेल्सियस के अंक को दोगुना कीजिए और तीस जोड़ दीजिए। इस नुस्ख़े से 40°C बनता है 110°F, जबकि असली जवाब 104°F है। दिन की तस्वीर बनाने को इतना फ़र्क़ चल जाता है; जहाँ कुछ दाँव पर हो, वहाँ पूरा सूत्र लगाइए।
दोनों पैमाने एक ही जगह आपस में मिलते हैं: −40 पर। वहाँ −40°C और −40°F बिल्कुल एक ही तापमान हैं, और याद रखने लायक़ अंक बस यही एक है।
0 से 45 तक: बुलेटिन के वे अंक जिन पर चेतावनी टिकी है
अकेला सेल्सियस अंक अधूरी बात है; उसका मतलब तब खुलता है जब उसे किसी स्थानीय कसौटी के सामने रखा जाए। इस इलाक़े में सचमुच काम आने वाली कसौटियाँ ये हैं।
- 0°C — जमाव। दक्षिण एशिया में यह पहाड़ों और उत्तरी मैदानों का अंक है: हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, कश्मीर, गिलगित-बल्तिस्तान, लद्दाख और सिक्किम। जाड़े की सबसे ठिठुरती रातों में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों में भी पारा यहाँ तक उतर आता है, और तब पाला खेत में खड़ी फ़सल को नुक़सान पहुँचाता है।
- 30°C — पहाड़ी इलाक़ों में IMD की लू-सीमा। मैदान के लिए यह मामूली दिन है; किसी हिल स्टेशन के लिए सचमुच असामान्य बात।
- 37°C — एक अंक, दो मतलब। पहला, इंसानी शरीर का सामान्य भीतरी तापमान; मोटे तौर पर यहीं से हवा शरीर की गर्मी उठाना छोड़कर उल्टे उस पर गर्मी लादने लगती है। दूसरा, तटीय इलाक़ों के लिए IMD की लू-सीमा, जो मैदान से नीचे इसलिए रखी गई है कि समुद्र किनारे की नमी कम तापमान को भी ज़्यादा ख़तरनाक बना देती है।
- 40°C — मैदानों में IMD की लू-दहलीज़। अप्रैल-मई के बुलेटिनों में राजस्थान, मध्य प्रदेश, विदर्भ, पंजाब, सिंध और सिंधु-गंगा की पट्टी के लिए सबसे ज़्यादा यही अंक गूँजता है।
- 45°C और उससे ऊपर — हर लिहाज़ से भीषण गर्मी। IMD के लिए यह वह सीमा भी है जहाँ सिर्फ़ असल अधिकतम तापमान के आधार पर लू मानी जाती है; गंभीर लू की उसकी सीमा 47°C है।
घोषणा सिर्फ़ निरपेक्ष अंक से नहीं होती। IMD सामान्य से विचलन भी गिनता है: इलाक़े के हिसाब से तय सीमा छू लेने के बाद, अधिकतम तापमान स्थानीय सामान्य से लगभग 4.5°C या ज़्यादा ऊपर जाए तो लू घोषित की जा सकती है, और विचलन इससे बड़ा हो तो गंभीर लू। यह नियम इसलिए अहम है कि मई के नागपुर में 38°C कोई ख़बर नहीं, जबकि श्रीनगर में किसी भी महीने का 38°C चौंकाने वाली बात है।
छाँव का पारा बदन का हाल क्यों नहीं बताता
थर्मामीटर छाँव में हवा का तापमान नापता है। हवा इंसान के बदन के साथ क्या सलूक कर रही है, यह उसकी पहुँच से बाहर है — और दक्षिण एशिया में बहुत बार पूरा क़िस्सा इन्हीं दो बातों के बीच के फ़ासले में होता है।
नमी। रेगिस्तान की सूखी हवा में 38°C पर भी पसीना उड़ जाता है और शरीर सँभला रहता है। बंगाल या सिंध के डेल्टा में 33°C पर, जब हवा नमी से लदी हो, पसीना मुश्किल से सूखता है और भीतर की गर्मी ठीक से बाहर नहीं निकल पाती। छोटा अंक बड़ी मुसीबत निकलता है। इसी कारण पूर्वानुमानकर्ता तापमान के साथ ताप सूचकांक और गीला बल्ब तापमान भी बताते हैं।
हवा। चलती हवा पसीना जल्दी सुखाती है और गर्मी बहा ले जाती है, सो बयार वाला 42°C और ठहरी हवा वाला 42°C दो अलग दिन हैं। झुलसाती सूखी हवा उल्टा भी कर सकती है: पसीना जितनी गर्मी हटाता है, वह उससे तेज़ नई गर्मी उड़ेल देती है।
धूप और सतह। छाँव वाली रीडिंग भरी दोपहर डामर की सड़क पर खड़े आदमी का हाल नहीं बताती, और शहर का आधिकारिक अंक अक्सर उसी शहर की घनी, बिना छाँव वाली बस्ती से ठंडा होता है।
रात का न्यूनतम। दिन का तीखा अधिकतम भी झेला जा सकता है, अगर रात थोड़ी राहत दे दे। गर्मी से मौतें तब बढ़ती हैं जब लगातार कई रातों तक न्यूनतम तापमान ऊँचा टिका रहे और शरीर को उबरने की मोहलत न मिले। उमस भरी लू के दिनों में शहरी ताप द्वीप ठीक यही हालत बना देता है।
पहाड़ की रसोई में पानी 100 पर क्यों नहीं खौलता
100°C पर पानी के खौलने वाली बात समुद्र तल के मानक दबाव पर ही खरी है। ऊपर चढ़ने के साथ वायुमंडलीय दबाव घटता जाता है, और कम दबाव में पानी 100°C से नीचे ही उबाल पकड़ लेता है। शिमला, गंगटोक और स्कर्दू में पानी 100°C से पहले ही खौलने लगता है, और ऊँचे दर्रों पर उससे भी पहले।
यह किताबी बारीकी रोज़ की थाली तक पहुँचती है। जो पानी पकाने लायक़ गर्म हो ही न पाए, उसमें चावल और दाल ढंग से नहीं पकते। हिमालय की हर रसोई में प्रेशर कुकर इसी कारण दिखता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
दक्षिण एशिया में फ़ारेनहाइट की जगह सेल्सियस क्यों चलता है? मौसम विज्ञान का अंतरराष्ट्रीय मानक सेल्सियस है, और भारत, पाकिस्तान व बांग्लादेश अपनी हर रिपोर्ट और चेतावनी इसी में जारी करते हैं। फ़ारेनहाइट का रोज़ाना इस्तेमाल अब सिर्फ़ अमेरिका और कुछ छोटे इलाक़ों में बचा है।
सेल्सियस को फ़ारेनहाइट में जल्दी कैसे बदलें? ठीक अंक चाहिए तो 9/5 से गुणा करके 32 जोड़िए। कच्चे अंदाज़े के लिए दोगुना करके तीस जोड़ दीजिए — दिन का अनुमान लगाने को काफ़ी, पर इलाज या इंजीनियरिंग के किसी फ़ैसले के लिए नाकाफ़ी।
भारत में कितने डिग्री सेल्सियस को लू माना जाता है? IMD इलाक़े के हिसाब से अलग-अलग सीमाएँ रखता है: मैदानों में लगभग 40°C, तट पर 37°C और पहाड़ों में 30°C। साथ ही अधिकतम तापमान स्थानीय सामान्य से लगभग 4.5°C या ज़्यादा ऊपर होना चाहिए; अधिकतम 45°C या उससे ऊपर पहुँच जाए तो यह शर्त ज़रूरी नहीं रहती। गंभीर लू की कसौटियाँ IMD इससे भी ऊपर रखता है।
क्या एक डिग्री सेल्सियस और एक केल्विन बराबर हैं? अंतर के रूप में हाँ, इसलिए 3°C की बढ़त 3 K की बढ़त ही है। अलग सिर्फ़ शून्य का ठिकाना है: 0 K परम शून्य है, यानी −273.15°C।
बुलेटिन की 40 वाली सीमा को अपने शहर के अंक से कैसे मिलाऊँ? शहर के पन्ने पर मौजूदा तापमान के साथ दिन का अधिकतम, न्यूनतम और अनुभव तापमान भी सेल्सियस में लिखा रहता है। लू की कसौटी अधिकतम पर लगती है, इसलिए मिलान उसी अंक से कीजिए, और रात के न्यूनतम पर अलग से नज़र रखिए, क्योंकि ऊपर बताया गया ख़तरा वहीं छिपा रहता है। अभ्यास के लिए दिल्ली, पटना, नागपुर और तिरुवनंतपुरम के पन्ने खोलिए। नागपुर के पन्ने पर ऊपर वाली बात भी याद रखिए: वहाँ मई का 38°C कोई ख़बर नहीं, इसलिए अंक को हमेशा स्थानीय सामान्य के सामने रखकर पढ़िए।