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बैरोमीटर

वह यंत्र जो अपने ऊपर टिकी हवा का भार नापता है। मौसम का अंदाज़ा लगाने में अकेली रीडिंग से ज़्यादा काम की बात यह है कि सुई किस ओर और कितनी तेज़ी से खिसक रही है।

पूर्वानुमान

बैरोमीटर क्या है?

बैरोमीटर वायुमंडलीय दबाव नापने वाला यंत्र है — यानी उस पूरी हवा का वज़न, जो यंत्र के ठीक ऊपर से लेकर आसमान की आख़िरी परत तक लदी हुई है। समुद्र तल पर हवा का यह स्तंभ लगभग 1013.25 hPa का ज़ोर लगाता है, और मौसम वैज्ञानिक इसी को मानक दबाव कहते हैं। एक हेक्टोपास्कल ठीक एक मिलीबार के बराबर है, सो भारत और पाकिस्तान के जिन पुराने यंत्रों पर मिलीबार छपा है, वे आज के यंत्रों वाले ही अंक दिखाते हैं।

थर्मामीटर बताता है कि इस घड़ी क्या हो रहा है। बैरोमीटर उससे एक क़दम आगे की बात करता है, क्योंकि आसमान का हाल बदलने से पहले दबाव बदल जाता है। इसी वजह से इसे मौसम का सबसे पुराना ऐसा यंत्र माना जाता है जो सचमुच आगे की बात बता सके। एवांजेलिस्टा टॉरिसेली ने पहला बैरोमीटर 1643 में बनाया था, और पढ़ने की विधि तब से जस की तस है: अंक लिखिए, तीन घंटे बाद दोबारा लिखिए, और दोनों का अंतर देखिए।

आज यह यंत्र तीन रूपों में मिलता है — दीवार पर टँगा सुई वाला डायल, जहाज़ों और विमानों पर रखा एनेरॉयड, और अब फ़ोन के भीतर लगी एक नन्ही चिप, जो चुपचाप दबाव दर्ज करती रहती है।

पारा, धातु की डिबिया और सिलिकॉन: तीन बनावटें

पारे वाला बैरोमीटर सबसे पहला डिज़ाइन है। एक सिरे से बंद काँच की नली में पारा भरकर उसे उलटा, पारे की खुली कटोरी में खड़ा किया जाता है। कटोरी पर दबती हवा नली के पारे को थामे रहती है, और समुद्र तल पर यह स्तंभ लगभग 760 मिलीमीटर ऊँचा टिकता है। ये यंत्र सटीक थे और एक सदी तक सरकारी वेधशालाओं का मानक रहे, मगर काँच नाज़ुक है, वज़न भारी है और पारे पर अब कड़ी रोक है — इसलिए रोज़ के काम से इन्हें लगभग विदा कर दिया गया है।

एनेरॉयड बैरोमीटर का अर्थ ही है “बिना द्रव का”। इसमें धातु की एक छोटी, सील की हुई डिबिया होती है जिसके भीतर से ज़्यादातर हवा खींच ली गई है। बाहर का दबाव बदलते ही डिबिया ज़रा-सी पिचकती या फूलती है, और लीवरों की एक कड़ी इस बारीक हरकत को बड़ा करके डायल की सुई तक पहुँचाती है। दीवार पर टँगा सुई वाला बैरोमीटर यही है। इसे बीच-बीच में दोबारा मिलाना पड़ता है, पर उठाकर ले जाने पर यह टूटता नहीं — इसी मज़बूती ने इसे जहाज़ों, विमानों और दूर-दराज़ के मौसम केंद्रों तक पहुँचाया।

MEMS संवेदक आज का उत्तर है। कुछ ही मिलीमीटर चौड़ी यह दबाव-चिप ज़्यादातर नए स्मार्टफ़ोन, स्मार्टवॉच और घरेलू मौसम स्टेशनों में बैठी मिलती है। भौतिकी वही है जो एनेरॉयड की, बस सिलिकॉन के एक टुकड़े पर सिमट गई है। फ़ोन वाला बैरोमीटर समय के साथ थोड़ा भटकता है, और जेब या बंद गाड़ी उसकी रीडिंग बिगाड़ देती है; फिर भी कुछ घंटों का रुझान दर्ज करने के लिए वह काफ़ी है।

सुई की चाल: तीन घंटे की प्रवृत्ति

बैरोमीटर से मिलने वाली सबसे काम की जानकारी प्रवृत्ति कहलाती है: पिछले तीन घंटों में दबाव कितना बदला, और किस दिशा में। आधिकारिक सिनॉप्टिक रिपोर्टें सौ साल से भी ज़्यादा समय से इसे एक कूट संख्या के रूप में दर्ज करती आई हैं। दुनिया के अधिकांश हिस्सों में इसका पारंपरिक अर्थ कुछ यूँ निकाला जाता है:

गंभीर संकेत वह है जिसमें दबाव कुछ घंटों तक लगातार और खड़ी ढलान से गिरता जाए। ऐसी गिरावट बताती है कि आसपास कोई निम्न दबाव गहरा रहा है।

मानसून की द्रोणी, चक्रवात के महीने और पहाड़ी कस्बे

कुछ क्षेत्रीय बातें यहाँ बैरोमीटर के व्यवहार को यूरोप या उत्तरी अमेरिका से अलग कर देती हैं।

मानसून गुज़रता हुआ मोर्चा नहीं, जमकर बैठा निम्न दबाव है। मानसून स्थापित होने के बाद सिंधु-गंगा के मैदान के आर-पार निम्न दबाव की एक स्थायी द्रोणी पसरी रहती है। बारिश दिन पर दिन आती है, पर दबाव मुश्किल से हिलता है। पूरे जुलाई “बारिश” वाले निशान पर अटकी सुई ख़राब नहीं है; वह कल का नहीं, पूरी ऋतु का हाल सुना रही है। मानसून के मुख्य महीनों में “गिरती सुई” वाला पुराना नियम कुछ ख़ास नहीं बताता।

चक्रवात के मौसम में यह यंत्र सबसे ज़्यादा काम आता है। मानसून से पहले, मोटे तौर पर अप्रैल से जून, और उसके बाद, मोटे तौर पर अक्टूबर से दिसंबर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के तंत्र बहुत तेज़ी से ताक़त पकड़ते हैं और दबाव का ढाल खड़ा हो जाता है। ओडिशा, पश्चिम बंगाल, तटीय आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, बांग्लादेश, गुजरात, और सिंध व बलूचिस्तान के तट, सभी इसका असर महसूस करते हैं। IMD इन तंत्रों की श्रेणी दबाव से नहीं, लगातार चलती हवा की गति से तय करता है; हवा 34 नॉट छू ले तो तंत्र चक्रवाती तूफ़ान कहलाता है। फिर भी किसी आम व्यक्ति के पास यंत्र से मिलने वाली सबसे साफ़ चेतावनी यही है कि उसके अपने ठिकाने पर दबाव गहराई तक और तेज़ी से गिर रहा है।

उष्णकटिबंध में दबाव की रोज़ाना लहर बड़ी है। मौसम बदले बिना भी दबाव दिन में दो बार अपने-आप चढ़ता-उतरता है: स्थानीय समय के अनुसार यह लगभग सुबह 10 बजे और रात 10 बजे सबसे ऊँचा रहता है, और तड़के 4 बजे और दोपहर बाद 4 बजे के आसपास सबसे नीचा। यह अर्ध-दैनिक ज्वार उष्णकटिबंध में सबसे प्रबल और ऊँचे अक्षांशों पर कमज़ोर है, पर चेन्नई, कोलंबो या कराची में इतना बड़ा हो सकता है कि असली रुझान उसके नीचे दब जाए। इसलिए दोपहर बाद की रीडिंग को उसी सुबह से नहीं, पिछले दिन की दोपहर बाद वाली रीडिंग से मिलाइए।

ऊँचाई हर दूसरी बात पर भारी है। ज़मीन के पास हर 8 मीटर ऊपर जाने पर लगभग 1 hPa दबाव कम हो जाता है। शिमला, श्रीनगर, गंगटोक, स्कर्दू और लेह के केंद्र इसी वजह से बारहों महीने समुद्र तल के मानों से बहुत नीचे का दबाव दर्ज करते हैं। पूर्वानुमान के नक्शे हर रीडिंग को माध्य समुद्र तल दबाव में बदलकर इस उलझन से निकलते हैं, ताकि पहाड़ी कस्बा और बंदरगाह एक ही नक्शे पर आमने-सामने रखे जा सकें।

नाव, तट और सफ़र: गिरती सुई का रोज़मर्रा का मोल

जहाज़ का अफ़सर और तट का मछुआरा बैरोमीटर एक ही कारण से देखते हैं: कुछ घंटों तक बिना रुके गिरता दबाव बताता है कि पास ही कोई निम्न दबाव तेज़ हो रहा है। दबाव आसमान से पहले बदलता है, इसलिए हो सकता है कि सुई नीचे खिसकना शुरू कर दे और आसमान अभी पहले जैसा ही दिखे।

तटीय परिवारों के लिए इसका सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि वे चेतावनी को हल्के में न लें। चक्रवात के महीनों में तटीय चेतावनी आए और घर का डायल या फ़ोन की चिप भी तेज़ी से नीचे जाती दिखे, तो दोनों एक ही बात कह रहे हैं, और उस चेतावनी को गंभीरता से लेने की यह एक ठोस वजह है। उलटे, जुलाई में “बारिश” पर टिकी सुई देखकर रोज़ घबराने की ज़रूरत नहीं।

सफ़र में फ़ोन का संवेदक धोखा भी दे सकता है। ज़मीन के पास हर 8 मीटर ऊपर जाने पर दबाव लगभग 1 hPa घटता है, इसलिए पहाड़ी रास्ते पर ऊपर चढ़ते हुए फ़ोन का अंक गिरता दिखेगा — यह मौसम का नहीं, ऊँचाई का असर है। बंद गाड़ी और विमान का दबाव-नियंत्रित केबिन भी रीडिंग पर असर डालते हैं, इसलिए रास्ते में दर्ज हुए रुझान को मौसम का संकेत मानने से पहले सावधान रहिए।

एक सुई कहाँ तक देख सकती है

हर बैरोमीटर हज़ारों किलोमीटर में फैले दबाव-क्षेत्र का बस एक बिंदु है। वह यह फ़र्क़ नहीं कर सकता कि गिरता दबाव चालीस किलोमीटर दूर से निकलता कोई छोटा, गरज वाला निम्न दबाव है या आपके तट की ओर बढ़ता चक्रवात। कितनी बारिश होगी, यह बताना भी उसके बस का नहीं। और मानसून में, जैसा ऊपर कहा गया, साल के सबसे गीले हफ़्ते में भी उसकी सुई मुश्किल से हिल सकती है।

आज का पूर्वानुमान दबाव को कई कड़ियों में से एक मानकर चलता है — सतही प्रेक्षण, रेडियोसॉन्ड, उपग्रह चित्र, रडार और संख्यात्मक मॉडल, सब मिलकर तस्वीर बनाते हैं। आपका अपना बैरोमीटर तब सबसे काम का है जब वह उस रुझान की फ़ौरन, स्थानीय पुष्टि करे जिसके बारे में आप पहले ही पढ़ चुके हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

बैरोमीटर की सामान्य रीडिंग कितनी मानी जाती है? समुद्र तल पर लगभग 1013 hPa। दक्षिण एशिया में सतह पर मोटे तौर पर 1000 से 1025 hPa के बीच का कोई भी अंक अपने-आप में कुछ ख़ास नहीं बताता; असली सवाल यह है कि अंक चढ़ रहा है या उतर रहा है।

क्या दबाव गिरने का मतलब हर बार बारिश है? नहीं। गिरता दबाव किसी आते हुए विक्षोभ की ख़बर देता है, जो अक्सर बारिश लाता है, पर हमेशा नहीं। जमे हुए मानसून में तो भारी बारिश बार-बार तब भी होती है जब दबाव लगभग जस का तस बना रहता है।

मेरे फ़ोन का बैरोमीटर कितना सही है? चिप बारीक बदलाव ठीक पकड़ती है, पर उसे किसी पक्के मानक से ठीक से मिलाया नहीं जाता, इसलिए पूरा अंक कुछ हटकर हो सकता है। कुछ घंटों का बदलाव देखने के लिए वह फिर भी काम का है, बशर्ते फ़ोन बंद गाड़ी या विमान के केबिन में न पड़ा हो।

नक्शे स्टेशन की असली रीडिंग की जगह समुद्र तल का दबाव क्यों दिखाते हैं? स्टेशन का कच्चा दबाव ज़्यादातर उसकी ऊँचाई बताता है, मौसम नहीं। हर केंद्र को समुद्र तल पर लाने से ज़मीन का असर हट जाता है — तभी कराची और स्कर्दू, दोनों को समेटने वाला नक्शा पढ़ने लायक़ बनता है।

घर में यंत्र न हो, तो अपने शहर का रुझान कैसे पढ़ूँ? मौसम ऑनलाइन हर शहर के पृष्ठ पर सतही दबाव दिखाता है, इसलिए वही पुराना तरीक़ा वहाँ भी चलता है: अंक नोट कीजिए, तीन घंटे बाद पृष्ठ दोबारा खोलिए और देखिए कि अंक किधर खिसका। चेन्नई या कराची में दोपहर बाद का अंक पिछले दिन की दोपहर बाद से ही मिलाइए, वरना रोज़ की लहर ही रुझान जैसी लगने लगेगी। विशाखापत्तनम, कोलकाता और ढाका के पृष्ठ भी सतही दबाव दिखाते हैं। शिमला का अंक समुद्र तल के मान से हमेशा बहुत नीचे दिखेगा; वह ऊँचाई है, गड़बड़ी नहीं।

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